शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

नित्य कर्ता आत्मा और आत्मा के भ्रम का श्रोत प्रकृति एक दूसरे के साथ जिस प्रकार व्यवहार करते हैं उसी का प्रगट स्वरूप होती है कर्म की गुणवत्ता । आत्मा नित्य ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । प्रकृति की समस्त रचनायें काल से ग्रसित होती है । नित्य ब्रम्ह का अंश आत्मा अज़र है अमर है । प्रकृति गुणों से युक्त है । आत्मा प्रकृति के गुणों की भोक्ता होती है । आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया के काल में उपरोक्त वर्णित सभी तथ्य प्रभावकारी भूमिका निभाते है । गुणवत्ता पूर्ण कर्म की उपलब्धि के लिये आत्मा और प्रकृति की नियंत्रित परस्पर की आवश्यकता होती है । यही अनुशाशित परस्पर की उपलब्धि के लिये पथ निर्दिष्ट किया गया योग । योग जीवन को अनुशासित बनाने का पथ है । एक सत्यनिष्ठ नागरिक के अनुशासित आचरण का पथ योग ।
मर्यादित आचरण उत्थान का पथ है । गुणवत्तापूर्ण कर्म ही सर्वोच्च उपलब्धि है । कर्म की गुणवत्ता नित्य आत्मा और प्रकृति की नियंत्रित अनुशासित परस्पर द्वारा ही उपलब्ध होगी । आत्मा यदि प्रकृति के गुणों के मोंह से ग्रसित रहेगा तो कर्म की गुणवत्ता का नाश होना ही होना है । आत्मा अलौकिक ब्रम्ह का अंश है । प्रकृतीय शरीर को उपलब्ध ज्ञानेंद्रियों से जाना नहीं जा सकता । इसपर जो भी अनुशासन आरोपित करना लक्ष्य किया जाना है उसे प्रकृतीय शरीर के द्वारा ही उपलब्ध करना है । प्रकृतीय शरीर के समस्त अंगों में मस्तिष्क ही सर्वाधिक संवेदनशील विज्ञान्युक्त सक्षम अंग है । इसके अनुशासन के माध्यम से उपलब्धि लक्षित की जाती है अलौकिक आत्मा के अनुशासित आचरण की । योग ।

  अनुशासित मस्तिष्क ही योग का लक्ष्य है । अनुशासित मस्तिष्क द्वारा सम्पादित कर्म ही त्रुटिरहित कर्म होंगे । गुणवत्तापूर्ण कर्म ही उत्थान है । कर्म का स्वरूप नित्य आत्मा और अनित्य प्रकृति की परस्पर का प्रगट रूप है । अनुशासित व नियंत्रित परस्पर ही कर्म की  गुणवत्ता का आधार है ।    

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