नित्य कर्ता आत्मा और आत्मा के भ्रम का
श्रोत प्रकृति एक दूसरे के साथ जिस प्रकार व्यवहार करते हैं उसी का प्रगट स्वरूप
होती है कर्म की गुणवत्ता । आत्मा नित्य ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की
रचना है । प्रकृति की समस्त रचनायें काल से ग्रसित होती है । नित्य ब्रम्ह का अंश
आत्मा अज़र है अमर है । प्रकृति गुणों से युक्त है । आत्मा प्रकृति के गुणों की
भोक्ता होती है । आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया के काल में उपरोक्त वर्णित
सभी तथ्य प्रभावकारी भूमिका निभाते है । गुणवत्ता पूर्ण कर्म की उपलब्धि के लिये
आत्मा और प्रकृति की नियंत्रित परस्पर की आवश्यकता होती है । यही अनुशाशित परस्पर
की उपलब्धि के लिये पथ निर्दिष्ट किया गया योग । योग जीवन को अनुशासित बनाने का पथ
है । एक सत्यनिष्ठ नागरिक के अनुशासित आचरण का पथ योग ।
मर्यादित आचरण उत्थान का पथ है ।
गुणवत्तापूर्ण कर्म ही सर्वोच्च उपलब्धि है । कर्म की गुणवत्ता नित्य आत्मा और
प्रकृति की नियंत्रित अनुशासित परस्पर द्वारा ही उपलब्ध होगी । आत्मा यदि प्रकृति
के गुणों के मोंह से ग्रसित रहेगा तो कर्म की गुणवत्ता का नाश होना ही होना है ।
आत्मा अलौकिक ब्रम्ह का अंश है । प्रकृतीय शरीर को उपलब्ध ज्ञानेंद्रियों से जाना
नहीं जा सकता । इसपर जो भी अनुशासन आरोपित करना लक्ष्य किया जाना है उसे प्रकृतीय
शरीर के द्वारा ही उपलब्ध करना है । प्रकृतीय शरीर के समस्त अंगों में मस्तिष्क ही
सर्वाधिक संवेदनशील विज्ञान्युक्त सक्षम अंग है । इसके अनुशासन के माध्यम से
उपलब्धि लक्षित की जाती है अलौकिक आत्मा के अनुशासित आचरण की । योग ।
अनुशासित मस्तिष्क
ही योग का लक्ष्य है । अनुशासित मस्तिष्क द्वारा सम्पादित कर्म ही त्रुटिरहित कर्म
होंगे । गुणवत्तापूर्ण कर्म ही उत्थान है । कर्म का स्वरूप नित्य आत्मा और अनित्य
प्रकृति की परस्पर का प्रगट रूप है । अनुशासित व नियंत्रित परस्पर ही कर्म की गुणवत्ता का आधार है ।
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