इस प्रकृति निर्मित मनुष्य की शरीर की
रचना की सहज प्रवृत्ति प्रकृति के आदेशों को ग्रहण करने एवं तदनुसार क्रियांवन
प्रेरित करने की होती है । विडम्बना यह कि कर्म सम्पादन इसके अपने वश में नहीं
होता । नित्यकर्ता आत्मा के सम्मलित हुये बिना कर्म सम्भव नहीं होता । आत्मा ही
प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति आत्मा में जनित
होती है । आसक्त आत्मा का कर्म क्रियांवन दोषपूर्ण होता है । विडम्बना का
चर्मोत्कर्ष यह कि आत्मा प्रकृति के नियंत्रण में नहीं होती । आत्मा की आसक्ति के
कारण जनित दोषों का निवारण प्रयत्न किया जाता है अनुशासित प्रकृति के माध्यम से ।
मस्तिष्क प्रकृतीय रचना का सबसे संवेदनशील, विज्ञानयुक्त, सक्षम अंग होता है । इन्ही कारणों से धर्मदर्शन में
सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क की कार्य दक्षता को विकसित करने के उद्देष्य से समस्त
सुझाव दिये गये है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण नें जो बताया कि
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणि सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
कर्ता तो प्रकृति हैं परंतु रचनागत विडम्बना जैसा कि उपरोक्त प्रस्तर में
व्यक्त किया गया है कि आसक्त आत्मा प्रकृति के इस कर्ता स्वरूप को स्वीकारता नहीं
। प्रकृति निर्मित शरीर जिसकी सहज़ प्रवृत्ति प्रकृति के आदेश ग्रहण करने एवं
तद्नुसार कर्म प्रेरित करने की है वह स्वच्छंद ऐसा कर नहीं सकती । कारण कर्मों का
नित्यकर्ता आत्मा अपनी आसक्ति के कारणों प्रकृति के क्रियांवन आसेशों की उपेक्षा
के लिये कटिबद्ध होता है । इसी कारण उपरोक्त श्लोक के उत्तरार्ध में कहा कि य:
पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति जो आत्मा ऐसा देखती है वह मानों कर्ता को देख
रही होती है । परंतु आसक्त आत्मा ऐसा नहीं देखती । आसक्त आत्मा को तो चाहिये
आसक्ति की पूर्ति । गुणों का भोग । वह यदि प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारे तो
उसका भोग भाव कैसे पूर्ण होगा । प्रकृति तो आत्मा को अपने गुणों का भोग करने हेतु
कर्म पोषण का तो आदेश देगी नहीं । इस प्रकार प्रकृति अपने को असहाय और आत्मा अपने
को असहाय । प्रकृति को चाहिये ब्रम्ह के द्वारा आदेशित कार्यों का पालन । आत्मा को
चाहिये अपने आसक्ति की पूर्ति । प्रकृतीय गुणों का भोग । स्वादिष्ट व्यंजन का भोग
। मधुर संगीत का श्रवण । लुभावने मनमोहक दृष्यों को देखना । मादक वातावरण में जीवन
यापन । इसलिये आत्मा प्रकृति के कर्तापन को कैसे स्वीकारे । उसे त्यागना पडेगा
अपने भोगों को । वह आत्मा त्यागेगी नहीं । उसे चाहिये ही चाहिये । यह यथास्थिति हर
प्रत्येक मनुष्य में एक ही स्वरूप में विद्यमान है । इसी स्थिति के विद्यमान होने
के कारण हमारे समस्त दोष है । दोष हैं तो दु:ख उनकी छाया के रूप में है । निवारण
का उपाय एक ही है । प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारना । प्रकृति के कर्ता
स्वरूप को जो आत्मा स्वीकरेगी उस आत्मा का कर्म पोषण दोषमुक्त होगा ।
प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारना ही
मस्तिष्क की योग की अवस्था है । मस्तिष्क की वह अवस्था जिसपर कार्य के परिणाम का
प्रभाव नहीं पडेगा । कार्य की कर्ता प्रकृति है का प्रगट व्यव्हारिक स्वरूप योगावस्था
। योगावस्था में किये गये कार्य पाप और पुण्य सृजित करने वाले नहीं होते ।
योगावस्था में किये गये कार्य प्रकृति के कर्ता स्वरूप के तारतम्य में होते है ।
इसलिये पाप और पुण्य सृजित करने वाले कर्मों की श्रेणी के नहीं होते । स्वामी
प्रकृति के आदेशों का पालन सेवक आत्मा का धर्म है इसलिये कर्मदोष से मुक्त होता है
\
प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारना ।
योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य करना । दोनो एक दूसरे के पर्याय हैं । प्रकृति
का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही मस्तिष्क की योगावस्था है । योगावस्था लक्ष्य
करने पर प्रकृति का कर्ता स्वरूप धारण करना प्रथम प्रयत्न है । प्रकृति का कर्ता
स्वरूप की ग्राह्यता ही उपलब्धि है योगावस्था ।
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