गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ...     ... 
जब श्रीराम माता सीता को खोजते शोकाकुल दशा में बन बन भटक रहे थे उसी समय भगवान शंकर ने उन्हे देखा । शंकरजी भगवान का दर्शन पाकर कृतकृत्य हो गये मानो उनके मनोरथ पूरे हो गये । परंतु भगवान शोकाकुल दशा में थे इसलिये  वह दूर से ही उन्हे प्रणाम करके अपने मार्ग चले गये । आगे अपने पथ पर चलते जा रहे थे परंतु जब जब भगवान का दर्शन ध्यान में आ रहा था हर्ष से पुलकित हो किलकारी उठती थी । शंकर जी कि यह दशा देख माता पार्वती के मस्तिष्क में संदेह जाग्रित हुआ । वह तर्क करने लगी कि पतिदेव शंकरजी को सभी प्रणाम करते है श्रेष्ठ मानते है परंतु यह क्या स्थिति हुई कि शंकरजी ने उन राजकुमारों को प्रणाम किया और जब जब उनका स्मरण इन्हे हो रहा है हर्ष से पुलकित हो जा रहे हैं । क्या परम्ब्रम्ह मनुष्य शरीर में हो सकते हैं ? ऐसा तो वेदों में भी नहीं वर्णित है । उनके तर्क से भगवान विष्णू भी नही हो सकते मनुष्य शरीर में । फिर विचार आता था कि भगवान शंकर पूर्ण ज्ञाता है यह सकल संसार जानता है इनसे तो इस प्रकार की भूल नहीं हो सकती । इस प्रकार अंतविहीन संसय में डूब गयी ।  
सम्भु समय तेहि रामहिं देखा । उपजा हियँ अति हरष विसेषा ॥
भरि लोचन छविसिंधु निहारी । कुसमय जान न कीन्ह चिन्हारी ॥
जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेहुँ मनोज नसावन ॥
चले जात सिव सती समेता । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥
सती सो दसा सभु कै देखी । उर उपजा संदेहु विसेषी ॥
संकरु जगतबंधु जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥
तिन्ह नृप सुतहिं कीन्ह प्रणामा । कहि सच्चिदानंद परधामा ॥
भये मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीत उर रहति न रोकी ॥
ब्रम्ह जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद ।
सो कि देह धरि होई नर जाहि न जानत बेद ॥
बिष्नु जो सुरहित नर तनु धारी । सोउ सर्बग्य यथा त्रिपुरारी ॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी । ग्यानधाम श्रीपति असुरारी ॥
सम्भु गिरा पुनि मृषा न होई । सिव सर्वग्य जान सबु कोई ॥
शेष अगले अंक में ...   ...   ...    

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण     
  सतत ...   ...   ...   ...

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ...     ... 
उसी समय भगवान ने सूर्यवंशी राजा रघु के कुल में अवतार लिया था और पिता की आज्ञा का पालन करते हुये दण्डक बन में बनबास करते बिचर रहे थे । यह बात भगवान शंकर, विष्णु, ब्रम्हा को तो पता थी परंतु माता पार्वती नहीं जानती थी। उधर बनबास काल में राक्षस रावण ने छल करके माता सीता को जब वे अकेले थी  उनके आश्रम से हर ले गया । भगवान राम जब आश्रम वापस आये और माता सीता को अनुपस्थित पाकर उनके वियोग में विह्वल हो गये । दोनों भाई शोकाकुल दशा में बन बन भटक रहे थे माता सीता की खोज़ में ।  
तेहि अवसर भंजन महिभारा । हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥
पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥
हृदय बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होई ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोई ॥
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोई ।
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची ॥
रावन मरन मनुज कर जाचा । प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा ॥ 
जौ नहिं जाँहु रहै पछतावा । करत विचार न बनत बनावा ॥
एहि विधि भए सोचबस ईसा । तेहि समय जाय दससीसा ॥
लीन्ह नीच मारीचहिं संगा । भयहु तुरत सोइ कपट कुरंगा ॥
करि छल मूढ हरी बैदेही । प्रभु प्रभाव तस बिदित न तेही ॥
मृग बधि बंधु सहित हरि आए । आश्रमु देखि नयन जल छाये ॥
बिरह विकल नर इव रघुराई । खोजत बिपिन फिरत द्वौ भाई ॥
कबहूँ जोग बियोग न जाके । देखा प्रगट बिरह दुख ताके ॥
अति विचित्र रघुपति चरित जानहि परम सुजान ।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कुछ आन ॥
शेष आगे के अंक में ...   ...   ... 

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण       सतत ...   ...   ...   ...

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

सतत् ...   ...   ...
इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा जो कि अपरिवर्तनशील ब्रम्ह का अंश है, विश्व के प्रयोजन की दृष्टि से नित्य कर्ता है, जो कि नित्य वस्तु रूप के जो कि परिवर्तनशील प्रकृति का अंश है, के सब रूपों का आधार है के सम्मुख होता है, जबकि कर्म सृजनशील संवेग है, गति विधि का मूल तत्व । यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
इस स्थल पर पहुँच कर जब मनुष्य शरीर के अवयव अंशो का परिचय प्रगट हो गया है एक दृष्टांत प्रस्तुत कर रहें हैं जिसमें तीनो अवयव अर्थात आत्मा, प्रकृति, कर्म का परस्पर क्रिया पद्धति विदित होगी । वैसे तो हर व्यक्ति प्रतिपल जीवन यापन में इस अनुभव से गुज़र रहा है परंतु ज्यादातर लोग इसे महसूस नहीं करते । उदाहरण भगवान शंकर माता पार्वती व अवतार पुरूष भगवान राम के परस्पर प्रसंग का है, व जैसा कि तुलसी कृत राम चरित्र मानस में वर्णित है ।
एक बार त्रेता युग में भगवान शंकर माता पार्वती के साथ अगस्त ऋषि के आश्रम में गये । मुनि अगस्त ने उन दोनों का यथा देवता पूजन किया । मुनि अगस्त ने भगवान राम की कथा सुनाई । भगवान राम शिवजी के ईष्टदेव थे । इसलिये शिव भगवान बहुत प्रसन्न हुये । ऋषि अगस्त ने भगवान शंकर से भगवान की भक्ति पूँछी । भगवान शंकर ने ऋषि को योग्य पात्र पाते हुये उन्हे भक्ति सुनाई। इस प्रकार भगवान की चर्चा करते सुनते कुछ दिन भगवान शंकर मुनि अगस्त के आश्रम में निवास किये । फिर मुनि अगस्त से विदा मांग कर भगवान शंकर माता पार्वती के संग अपने धाम कैलाश पर्वत के लिये चल पडे ।
एक बार त्रेता युग माहीं । सम्भु गए कुम्भज रिषि पाहीं ॥
संग सती जगजननि भवानी । पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी ॥
राम कथा मुनिबर्ज बखानी । सुनि महेस परम सुख मानी ॥
ऋषि पूछी हरिभगति सुहाई । कही सम्भु अधिकारी पाई ॥
कहत सुनत रघुपति गुण गाथा । कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा ॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी । चले भवन सँग दच्छकुमारी ॥
सतत् ...   ...   ...   
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण    
सतत ...   ...   ...   

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

सतत् ....  ....   .... 
इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । मनुष्य शरीर की रचना में प्रयुक्त दोनो ही अवयव प्रकृति और आत्मा का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करने के उपरांत अब श्रीमद भागवद् गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस रचना को बताया है
अक्षरँ ब्रम्ह परमं स्वभावोअध्यात्म्मुच्यते ।
भूत्भावोद्भवकरो   विसर्ग :  कर्मसज्ञित: ॥
 ब्रम्ह अपरिवर्तंशील स्वत: अस्तित्व है जिसपर वह सभी वस्तुयें जो जीती हैं गति करती हैं और जिनका अस्तित्व हैं - वह आधारित हैं । आत्मा ब्रम्ह का अंश है जो कि प्रकृति में विद्यमान है । कर्म वह सृजनशील संवेग है, जिससे जीवन के रूप उद्घृत होते हैं । सृष्टि का समूचा विकास कर्म से है । कर्म का उद्भव ब्रम्ह से है, इसलिये कोई कारण नहीं कि आत्मा उसमें भाग ना ले । आत्मा जो कि अपरिवर्तनशील ब्रम्ह का अंश है, विश्व के प्रयोजन की दृष्टि से नित्य कर्ता है, जो कि नित्य वस्तु रूप के जो कि परिवर्तनशील प्रकृति का अंश है, के सब रूपों का आधार है के सम्मुख होता है, जबकि कर्म सृजनशील संवेग है, गति विधि का मूल तत्व । यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । कर्ता और वस्तु रूप की परस्पर क्रिया ही सृष्टि का केंद्रीय आदर्श है, ब्रम्ह की अभिव्यक्ति हैं, जो कि कर्ता और प्रकृति के भेद से परे है ।
ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप आत्मा, प्रकृति व कर्म । जितना ही यह आत्मसात हो सकेगा उतना ही आगे की चर्चा हृदयस्त हो सकेगी । ब्रम्ह ने अपने को प्रकृति के रूप में प्रगट किया । कर्म के रूप में ब्रम्ह ने अपने को प्रगट करके संदेश दिया है हर प्रकृति रूप को जीने का । तीनो ही महत्वपूर्ण हैं । उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है तीनों के भेद को अंतर को आत्मसात करना । ब्रम्ह अपरिवर्तनशील स्वत: अस्तित्व है, प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है परवर्तनशील है, कर्म सृजनशील संवेग है ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया ही सृष्टि का स्वरूप है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
सतत ...   ...  ... 

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं जानी जा सकती है परंतु आपकी पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ अर्थात नाक, कान, आँख, जिह्वा, व स्पर्ष जो भी बाह्य संसार का ज्ञान शरीर में ले आती हैं उनका भोक्ता आत्मा होती है । इस बात का अभिप्राय यह हुआ कि यदि आपने कोई खाने की चीज़ खाई तो उसका स्वाद आत्मा ने ग्रहण किया । इसी प्रकार कोई गंध पाने के लिये आपने सूँघा तो उसकी गंध का ज्ञान आत्मा ने ही ग्रहण किया । इसी प्रकार अन्य तीन ज्ञानेंद्रियों के लिये भी । इस बात का सार यह हुआ कि प्रकृति के गुणों की भोक्ता आत्मा है । जो कुछ भी आप खाते है या सूँघते है या स्पर्ष करते हैं वह समस्त प्रकृति सृजित ही वस्तुएँ होती हैं । इसलिये उन वस्तुओं में जो गुण निहित होते है यथा स्वाद या गंध वह उन्हे प्रकृति से ही मिले होते हैं । चूँकि उन गुणों का ज्ञान बोध आत्मा ग्रहण करती है इसी अभिप्राय से यह कहा जाता है कि आत्मा प्रकृति के गुणों की भोक्ता होती है ।
उपरोक्त लक्षण के सहारे अब आप अपने अंदर विराजमान आत्मा को पहचानने व उसकी स्थिति शरीर में कहाँ है चिन्हित करने का प्रयत्न करिये । शरीर में कोई दूसरा अवयव नहीं है जो प्रकृति के गुणों का भोग कर सके इसलिये गुणों का जो भी अनुभव आपको मिले वह ज्ञान सीधा आपको आत्मा से ही मिलेगा ।
उपरोक्त अनुभव से आगे आत्मा प्रकृति के गुणों में आसक्ति या विरक्ति जनित करती है । इस बात का अर्थ हुआ कि अगर आत्मा को कोई स्वाद अच्छा लगा तो वह दोबारा उस स्वाद को पाने की इच्छा करती है । इसका विलोम भी सही है कि यदि कोई स्वाद आत्मा को अरुचिकर लगा तो वह उसका तिरस्कार करना चाहेगी । इस प्रकार अपनी आत्मा को पहचानने और उसकी स्थिति शरीर में चिन्हित करने में आत्मा के इस स्वभाव का भी उपयोग करिये ।
जैसा कि मैंने शुरू में ही आग्रह किया था की ज्ञान यात्रा मात्र सिद्धांतिक ज्ञान से नहीं सतत क्रिया सम्पादन से सम्पन्न करने से फलदायी होगी । इसक्रम में यह पुन: निवेदन है कि जिस भजन से यात्रा शुरू की गई है उसे सतत प्रतिदिन यथा सम्भव करते यात्रा आगे बढाते रहिये । इसी विचार से प्रतिदिन थोडा थोडा ही यात्रा आगे बढाई जा रही है कि साथ साथ अभ्यास सम्भव हो सके । परंतु स्मरण रहे कि जितने अभ्यास शुरू किये जाँय उन्हे प्रतिदिन ज़ारी रखते हुये अगला अभ्यास ग्रहण किया जाय ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । जहाँ तक दृष्टि जाती है जितने भी रूप दीखते है सब प्रकृति है । प्रकृति की व्यापकता की सीमा नहीं है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है, ब्रम्ह की आज्ञाकारी है, मर्यादित आचरण इसका सहज स्वरूप है । मानो अलौकिक ब्रम्ह ने अपने को लौकिक प्रकृति के रूप में प्रदर्शित किया है । प्रकृति की कार्यशैली अति वैज्ञानिक है । इसकी समस्त रचनाये पाँच तत्वों क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर से सृजित हुई है और प्रत्येक रचना का आयुर्बल होता है जिसके पूरे होने पर वह रचना पुन: उन्ही पाँच तत्वों में विलीन हो जाती है । इस कथन की पुष्टि में समस्त वनस्पतियों, एवं जीवों को देखिये सब आयुर्बल पूरे होने पर उसी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं । इतना ही नहीं प्रत्येक बनस्पति व जीव में प्रकृति ने उन्हें अपनी वंश परम्परा चलाने की क्षमता भी प्रदान की है जो कि सृष्टि क्रम सतत चलते रहने का ज्ञोतक है ।  
प्रकृति अत्यंत बलशाली है । वायु के तूफान, तनसुई, ज्वालामुखी, जंगल की दावाग्नि इनकी विभीषका एवं इनमें निहित शक्ति से समस्त मानव समाज परिचित है । इसकी व्यवस्था अति व्यापक आयाम की है । जल वृष्टि, हिमपात, नदियों में जल संचार इसकी व्यापक व्यवस्थाओ के उदाहरण है ।
प्रकृति गुणों से युक्त है । गंध, स्वाद, ध्वनि, प्राकृतिक दृष्य, सुहावने/अतिकारी मौसम सभी प्रकृति की लीला के परिचायक हैं । परंतु इतनी उपलब्धियों के बाद भी प्रकृति पंगु होती है क्योंकि इसमें सम्पादन क्षमता नहीं होती है । परम् ब्रम्ह ने प्रकृति में सब कुछ उपरोक्त विवरण अनुसार क्षमताए दिया है परंतु इसमें सम्पादन क्षमता न देकर इसे अपने नियंत्रण में रखने का उपाय रखा है ।
मनुष्य शरीर की रचना के प्रसंग में, प्रकृति की उपरोत उपलब्ध क्षमताओं की चर्चा के उपरांत, अब मनुष्य शरीर में ब्रम्ह के अंश आत्मा का विचार करें । आत्मा भी ब्रम्ह का अंश होने के कारण मनुष्य को प्रकृति निर्मित इंद्रियों की ज्ञान क्षमता के परे होता है । 
सतत ...  ...  ... 

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण 

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । यात्रा को सतत रखते हुये, परम ब्रम्ह स्वत: अस्तित्व है जबकि प्रकृति ब्रम्ह पर आश्रित है । ब्रम्ह को मनुष्य उपलब्ध ज्ञानेंद्रियों से जान नहीं सकता । इस प्रकार दो विशिष्ट स्थितियाँ (1) ब्रम्ह की अग्राह्यता ( inconceivability ) (2) उपरोक्तानुसार एक पक्षीय निर्भरता को माया कहा जाता है । माया की उपरोक्त ब्याख्या विद्वान डा सर्वपल्ली राधा कृष्णन ने अपनी पुस्तक commentary on Shrimad Bhagwad Geeta में किया है ।
यहाँ यह उल्लेख विषय से असंगत नही होगा कि आगे की ज्ञान यात्रा में यथा अवसर आदि महात्माओं, महर्षियों, विद्वानों द्वारा व्यक्त अनुभव का उल्लेख किया जाता रहेगा तथा वर्तमान में जनसाधारण में प्रचुरता से व्यवहृत ग्रंथ (1) श्रीमद भागवद गीता (2) तुलसी कृत राम चरित्र मानस के उद्धहरण भी प्रयोग किये जायेगे। पूर्वज विद्वानों के अनुभव से मार्गदर्शन को यदि प्रश्नवाचक कहा जाता है तो यह अपने वर्तमान अस्तित्व को ही प्रश्नवाचक कहने के तुल्य होगा । यह सृष्टि की प्रगति ही इसी श्रृखला से गतिमान है कि एक पीढी की प्रगति उपलब्धि को अगली पीढी आगे लेकर चल रही है । उपरोक्त उद्घृत ग्रंथो के उद्धहरणों के प्रयोग जहाँ चर्चा की प्रमाणितता का चिन्हप्रतीक होंगी वहीं दूसरी ओर संगत विषय को समझना सुगम हो जाया करेगा ।  
प्रकृत अवयव के पाँच तत्वों (1) क्षिति (2) जल (3) अग्नि (4) आकाश (5) वायु को समस्त रूप सृजन की प्रक्रिया के लिये प्रकृति ने आधार के रूप में प्रयोग किया है । इन्ही पाँच तत्वों के प्रयोग से समस्त रूप प्रकृति में प्रकृति ने सृजित किये है । प्रकृति के उपरोक्त पाँच घटकों को तत्व कहने से कंचिद विज्ञान ज्ञाता पाठकों को असंतोष हो सकता है क्योंकि विज्ञान की परिभाषा के अनुसार उपरोक्त पाँचो तत्व की श्रेणी में वर्गीकृत करने योग्य नहीं है । परंतु मेरा विनम्र अनुरोध है कि धर्मदर्शन के विचार क्रम में, प्रकृति के समस्त रूप सृजन में उपरोक्त पाँचों घटकों को आधारभूत अवयव के रूप में प्रयोग किया है प्रकृति ने, इसलिये इन्हे तत्व कहना समुचित है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण

सतत ...   ...  ... 

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । इस ज्ञान यात्रा पर अग्रसर होने पर सबसे पहले इस शरीर की रचना जानना आवश्यक है जिसके माध्यम से यह ज्ञान यात्रा करनी है । श्रीमद भागवद गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस शरीर की रचना प्रकृति और पुरूष दो के सन्योग से की गई है । प्रकृति जहाँ तक आपकी ज्ञान सीमा है वह समस्त प्रकृति है । पुरूष को भगवान श्रीकृष्ण ने अपना अंश बताया है । प्रकृति गुणों से युक्त है, नश्वर है, परिवर्तंशील है । ब्रम्ह चिर है दिब्य है शांत है परम आनंद है । कितना विचित्र समायोजन है । यही विचित्र समायोजन उपस्थित करता है मनुष्य के जीवन में सुखों और दु:खों का समिश्रित अनुभव ।
जैसा पूर्व के लेख में आग्रह किया गया था ज्ञान प्राप्ति के साधक जिज्ञासुओं से कि यह मात्र सिद्धांतिक जानकारी की यात्रा नहीं अपितु कर्म पथ से समस्त क्रियाओं का अभ्यास करते हुये दिब्य ज्ञान को पाना है । ज्ञान प्राप्ति पर हर यात्री उस चिर दिब्य ब्रम्ह के परम आनंद को प्राप्त होगा । इसलिये विनम्र अनुरोध है कि पूर्व में सुझाये गये भजन
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
को जितना सम्भव हो सतत अभ्यास करते रहें । प्रतिदिन थोडे अंश को ही इस विचार से प्रगट किया जा रहा है कि आप सहज से आत्मसात करते हुये हृदय में इस सृष्टि के कण कण में ब्याप्त ब्रम्ह नारायण स्वरूप को स्थापित कर सकें ।

ज्ञान की मंजिल पर पहुँचने पर दिब्य आनंद को आप ब्यक्त करेगें और वर्तमान लेखक श्रोता के रूप में आपके आनंद वर्णन का अमृत ग्रहण करेगा । 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । परम ब्रम्ह को जानना ही ज्ञान है । परम ब्रम्ह को जानने का पथ भी ज्ञान कहा जाता है । ज्ञान मात्र सिद्धांत के रूप में जानने से नहीं  अपितु  कर्म सम्पादन द्वारा  अर्जित हो सकेगा । जिस प्रकार सूर्य को देखने के लिये किसी अन्य प्रकाश श्रोत की आवश्यकता नहीं होती है उसी प्रकार ज्ञान पाने के लिये किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है । कर्म जो नित्य प्रतिदिन  सम्पादित  कर रहे हैं, चाहे वह वृत्ति के निमित्त है अथवा  पारिवारिक  दायित्व  के निमित्त है  अथवा  शरीर के पोषण के लिये है अथवा सामाजिक दायित्व से सम्बंधित है, उन्ही कर्मों की सम्पादन  पद्धति और सम्पादन के निमित्त मानसिकता की गुणवत्ता में परिवर्तन  करने से होगा ।   ज्ञान  अर्जित  करने के लिये अलग से कोई  विषेस कर्म करने की वाँक्षना नहीं होगी । 
उपलब्धि साधक की निष्ठा के अनुपात में ही सम्भव हो सकती है । धर्म दर्शन के ग्रंथों में हृदय शब्द का अर्थ मस्तिष्क में धारणाओं को ग्रहण करने का केंद्र ( conceptual center of mind) के अर्थ में किया जाता है । ज्ञान  यात्रा हृदयस्त कर सम्पादित करने के लिये दृढप्रतिज्ञ निष्ठावन साधक सफलता अवश्यमेव पाते हैं । 
सतत ...  ...  ...   

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण 
इस सृष्टि में ज्ञेय केवल परम ब्रम्ह है । परम ब्रम्ह को जानना ही ज्ञान है । परम ब्रम्ह को जानने के लिये जो पथ अपनाये जाते है उन्हे भी ज्ञान ही कहा जाता है । 
ज्ञान पाने के लिये स्वयं साधक को यत्न करने होंगे । ज्ञान प्राप्त हो जाने पर परम आनंद की स्थिति का भोग भी साधक ही कर सकेगा । 
ज्ञान पाने के जिज्ञासु की साधना का प्रारम्भिक द्वार है - भजन 
परम ब्रम्ह समस्त सृष्टि के कण कण में व्याप्त है - नारायण 
यात्रा प्रारम्भ करें अवष्य परम पद तक पहुँचेगे - यह विश्वास रखें 
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण 
परम्ब्रम्ह पूर्णतया लोकातीत स्वत: अस्तित्व  है । उसे प्रकृति निर्मित इंद्रियों से जाना नहीं जा सकता है । तर्को से उसका अस्तित्व समझा नहीं जा सकता । उसे अनुभव करने का मात्र एक उपाय है - उसकी कृपा । उसकी कृपा पाने के लिये पथ है उसका भजन । 
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण 
नारायण 
व्यक्त करता है  
परमब्रम्ह कण कण में व्याप्त है  
हम सभी के अंदर परमब्रम्ह विराजमान है । मात्र हम  उसकी उपस्थिति से परिचित नहीं हैं । उसे अपने अंदर पहचानने के लिये सतत उसी परम्ब्रम्ह से विनय करना होगा । 
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण 

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण 
महर्षि अगस्त ने बताया 
यद्यपि ब्रम्ह अखण्ड अनंता । अनुभव गम्य भजहिं तेंहि संता ॥ 
श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण