शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । यात्रा को सतत रखते हुये, परम ब्रम्ह स्वत: अस्तित्व है जबकि प्रकृति ब्रम्ह पर आश्रित है । ब्रम्ह को मनुष्य उपलब्ध ज्ञानेंद्रियों से जान नहीं सकता । इस प्रकार दो विशिष्ट स्थितियाँ (1) ब्रम्ह की अग्राह्यता ( inconceivability ) (2) उपरोक्तानुसार एक पक्षीय निर्भरता को माया कहा जाता है । माया की उपरोक्त ब्याख्या विद्वान डा सर्वपल्ली राधा कृष्णन ने अपनी पुस्तक commentary on Shrimad Bhagwad Geeta में किया है ।
यहाँ यह उल्लेख विषय से असंगत नही होगा कि आगे की ज्ञान यात्रा में यथा अवसर आदि महात्माओं, महर्षियों, विद्वानों द्वारा व्यक्त अनुभव का उल्लेख किया जाता रहेगा तथा वर्तमान में जनसाधारण में प्रचुरता से व्यवहृत ग्रंथ (1) श्रीमद भागवद गीता (2) तुलसी कृत राम चरित्र मानस के उद्धहरण भी प्रयोग किये जायेगे। पूर्वज विद्वानों के अनुभव से मार्गदर्शन को यदि प्रश्नवाचक कहा जाता है तो यह अपने वर्तमान अस्तित्व को ही प्रश्नवाचक कहने के तुल्य होगा । यह सृष्टि की प्रगति ही इसी श्रृखला से गतिमान है कि एक पीढी की प्रगति उपलब्धि को अगली पीढी आगे लेकर चल रही है । उपरोक्त उद्घृत ग्रंथो के उद्धहरणों के प्रयोग जहाँ चर्चा की प्रमाणितता का चिन्हप्रतीक होंगी वहीं दूसरी ओर संगत विषय को समझना सुगम हो जाया करेगा ।  
प्रकृत अवयव के पाँच तत्वों (1) क्षिति (2) जल (3) अग्नि (4) आकाश (5) वायु को समस्त रूप सृजन की प्रक्रिया के लिये प्रकृति ने आधार के रूप में प्रयोग किया है । इन्ही पाँच तत्वों के प्रयोग से समस्त रूप प्रकृति में प्रकृति ने सृजित किये है । प्रकृति के उपरोक्त पाँच घटकों को तत्व कहने से कंचिद विज्ञान ज्ञाता पाठकों को असंतोष हो सकता है क्योंकि विज्ञान की परिभाषा के अनुसार उपरोक्त पाँचो तत्व की श्रेणी में वर्गीकृत करने योग्य नहीं है । परंतु मेरा विनम्र अनुरोध है कि धर्मदर्शन के विचार क्रम में, प्रकृति के समस्त रूप सृजन में उपरोक्त पाँचों घटकों को आधारभूत अवयव के रूप में प्रयोग किया है प्रकृति ने, इसलिये इन्हे तत्व कहना समुचित है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण

सतत ...   ...  ... 

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