शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

धर्म प्रशस्थ करता है जीवन जीने का पथ । जीवन एक एकाकी मनुष्य का । जीवन एक समुदाय का । जीवन पूरे मानव समाज का । भारतीय धर्म दर्शन में दो शब्द विख्यात हैं । पाप और पुण्य । पाप वह कर्म है जिससे अगले बंदे को कष्ट पहुँचे पीडा हो । पुण्य वह कर्म है जिससे अगले बंदे को सुख मिले । कितनी सरल पहचान बतायी गयी । कोई भी कभी भी कहीं भी अपने कर्म का परीक्षण स्वयँ करे । उपरोक्त परिभाषा के अनुसार । उसका कर्म जो उसने किया किस श्रेणी का था । पाप अथवा पुण्य । यदि उस कर्म विषेस से अगले बंदे को कष्ट मिला है तो वह पाप था । यदि उस कर्म विषेस से अगले बंदे को सुख मिला है तो वह पुण्य था । इस प्रकार कोई भी कहीं भी किसी समय भी अपने किये गये कर्म का परीक्षण स्वयँ कर देख सकता है । फिर आगे धर्म दर्शन बताता है कि पुण्य करो और पाप मत करो । यह मानक भी कितना सरल है । क्या करे या क्या ना करें । पुण्य करें और पाप ना करें । वह कर्म करें जिससे अगले बंदे को सुख मिले । वह कर्म ना करें जिससे अगले बंदे को कष्ट पहुँचे । कितना उदार विश्व बंधुत्व का पथ । यदि समाज में कंचिद प्रत्येक मनुष्य इस मानक को अपने जीवन जीने का आदर्श बना ले तो कल्पना करें कि किस स्तर का सद्भाव समाज में व्याप्त होगा । धर्म दर्शन मार्ग बताता है । उसे अपनाना मनुष्य का अपना विवेक है । धर्म दर्शन किसी को बाध्य नहीं करता । कोई यदि अपने उत्थान को चेष्टारत होवे तो उसे स्वयँ अपने कर्मों को परीक्षित करते अपने को सुधारते आगे बढने का पथ है । पुण्य करो और पाप मत करो । जिस कार्य से अगले बंदे को सुख मिले उसे और अधिक करने की चेष्टा की जाय । जिस कर्म से अगले बंदे को कष्ट पहुँचे उन्हे ना किया जाय । दूसरे की समीक्षा की अपेक्षा अपने को सुधारना अधिक अपने वश का होता है । दूसरे की समीक्षा पता नहीं प्रभावी होगी या नहीं परंतु अपने को सुधारने का प्रयत्न शत प्रतिशत सफल होगा । 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

कर्म की उत्पत्ति होती है प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया द्वारा । कंचिद पुरुष आत्मा और प्रकृति दोनो ही अपने उत्पत्ति के मौलिक स्वरूप और गुणा धर्म के अनुसार वर्ताव करें तो सृजित होने वाला कर्म आदर्श स्वरूप में होगा । परंतु विकृत आत्मा और विकृति प्रकृति एक दूसरे के साथ परस्पर करते हैं तो परिणामत: सृजित होता है दूषित कर्म । कर्म के दूषित होने के कुप्रभाव से प्रगट होने वाली कुप्रवृत्तियाँ एवँ प्रदूषण उत्पन्न करता है कलह दुराग्रह वैमनस्य एवँ अन्य अनेक । जब मनुष्य त्रस्त हो जाता है उपरोक्त कुवृत्तियों से खोजता है निवारण । निवारण के विचार क्रम में पुरुष आत्मा जो कि प्रकृतीय इंद्रियों की ज्ञान सीमा से परे होता है को सीधे उपायों द्वारा सुधारना सम्भव नहीं होता । इसलिये इस पुरुष आत्मा के सुधार के प्रयत्न भी सुलभ प्रकृति के माध्यम से ही करना होता है । शरीर प्रकृति के संयमित नियंत्रित आचरण द्वारा । इस आचरण में सम्मलित होते हैं समस्त छोटे बडे कर्म । समय से सोना जगना । समय से सभी शरीर के पोषण के कार्य । समस्त वृत्ति से सम्बंधित कार्य । समस्त सामाजिक दायित्व के कार्य । सभी उपरोक्त को अति संयमित व नियंत्रित विधि द्वारा । इस नियंत्रण के प्रभाव से पुरुष आत्मा अप्रत्यक्ष होते हुये भी प्रभाव को ग्रहण करता है । यह मूल आधार होता है समस्त सुधारत्मक प्रयत्नों के लिये । यदि देखा जाय तो विघटन का भी यही आधार होता है । इसलिये चाहे विघटन को सीमित करने का विचार प्रश्नगत होवे या सुधार का प्रयत्न विचाराधीन होवे दोनों ही परिपेक्ष्य में नियंत्रण ही उभयनिष्ठ यंत्र होता है । नियंत्रण द्वारा ही उत्थान सम्भव होता है । 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मनुष्य शरीर में इंद्रियाँ तथा मस्तिष्क सभी कर्म करने के लिये उद्यत होते है परंतु जब तक आत्मा इनके प्रयत्नों को सफल बनाने के लिये सम्मलित नहीं होती तब तक कोई कर्म सम्भव नहीं होता है । प्रत्येक इंद्रिय को कार्य में प्रवृत्त होने के लिये निमित्त अलग अलग होते है । मस्तिष्क को कार्य में प्रवृत्त होने के लिये निमित्त भिन्न होता है । परंतु उपरोक्त समस्त भिन्नता के रहते एक उभयनिष्ठ सत्य आत्मा का सम्मलित होना प्रत्येक में विद्यमान रहता है । इस प्रकार सद्वृत्तियों में और दुर्वृत्तियों में आत्मा सम्मलित होती है । आत्मा के इसी भागीदारी के कारण विवेक का विषेस महत्व हो जाता है । विवेक वह मानसिक क्षमता होती है जिससे उचित अनुचित का भेद प्रगट होता है । उचित को अपनाया जाय और अनुचित को त्यागा जाय । यह मस्तिष्क का क्षेत्र है । इसीलिये कर्म के विचार में मस्तिष्क का विषेस महत्व होता है । प्रकृति के प्रति मोंह आत्मा का सहज़ बंधन होता है । इस मोंह से उबरना विवेक के बल से सम्भव होता है । मोंह और विरक्ति यह दो परस्पर विलोम वृत्तियाँ है । मोंह बंधन है । विरक्ति मुक्ति है । विरक्ति संसार से नहीं । विरक्ति आसक्ति से चाहिये । सुंदर व्यंजन यदि प्रकृति आपको सुलभ कराती है अवश्य भोग करिये । परंतु उस सुंदर व्यंजन को पुन: भोग की इच्छा मस्तिष्क में ना धारण करिये । यही इच्छा बंधनकारी होती है । सुंदर व्यंजन मिला परंतु पुन: मिले यह कामना ही बंधन है । यह बंधन जब मस्तिष्क अपना लेगा तो दूसरा भोग उपलब्ध होने पर भी उसका स्वाद संतोष प्रदान नहीं कर सकेगा क्योंकि उस व्यंजन के स्वाद की इच्छा बाधा के रूप में उपस्थित है । जो इस व्यंजन के स्वाद के मोंह को त्यागेगा वह संतोष के सुख का आनंद पायेगा । यह एक रस्साकशी है । इसका स्थल होता है मस्तिष्क । जो है जो नहीं है के बीच । जो व्यक्ति जो है उसमें संतुष्ट रहेगा उसे जो नहीं है का कष्ट नहीं सतायेगा । जो व्यक्ति उसकी कामना करेगा जो नहीं है उसे जो है उसका सुख भी नहीं मिलेगा । योग की अवस्था आपको प्रदान करती है वह निधि जिसके प्रभाव से आप जो है उसमें संतुष्ट रहने के अभ्यासी बनते है । जो नहीं है का संताप योगी को नहीं सताता है । योगी इच्छाओं के बंधन से मुक्त होता है । इसलिये दु:ख की क्षाया योगी के समीप नहीं रहती । इच्छाओं का नियंत्रण दु:खों का नियंत्रण है । जब तक मोंह का साथ रहेगा तब तक सुख एक कल्पना रहेगी । जिस पल मोंह को त्याग देंगे सुख शांति आपकी धरोहर बन जावेगी ।  

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

कर्म की उत्पत्ति प्रकृति और पुरुष के परस्पर क्रिया द्वारा । परस्पर क्रिया के सम्बंध में ब्रम्ह की अपेक्षा । अपेक्षा के विरुद्ध परस्पर क्रिया के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाला त्रुटि पूर्ण कर्म । इन त्रुटिपूर्ण कर्मों के सुधार के लिये उपाय । उपाय के रूप में कर्म पथ । कर्म करने की विधा द्वारा कर्म की त्रुटि का सुधार । कर्म पथ का आधार यंत्र योग । योग की अवस्था प्राप्त करने का उपाय । इन समस्त चर्चाओं को विगत अंकों में अंकित किया गया । अब इन समस्त विस्तार को सारांश करने के प्रयत्न में- 
कर्म में त्रुटि की उत्पत्ति होती है कर्ता आत्मा की प्रकृति के गुणों में तथा प्रकृति के घटको का स्वामित्व की कामना के कारण । आत्मा प्रकृति द्वारा जाना नहीं जा सकता । फिर भी प्रकृति जो कि नित्य कर्ता होती है को आत्मा की सहायता प्राप्त कर कार्य करने होते है । इस उपलब्धि के लिये प्रकृति जो कुछ भी यत्न कर सकती है वह अपने ही निर्मित मस्तिष्क के माध्यम से ही सम्भव हो सकता है । इन कारणों से योग में जो कुछ भी उपलब्धि है वह मस्तिष्क के ही विकसित कर्म सम्पादन क्षमता द्वारा ही सम्भव होती है । संयमित नियंत्रित मस्तिष्क । मस्तिष्क जिसमें अपने पूर्वाग्रह ना हो । मस्तिष्क जो कि प्रकृति के आदेशों को ग्रहण करने के लिये पूर्ण रूप से सदैव खुला रहे । मस्तिष्क जो कि प्रकृति के आदेशों को यथा अपेक्षा सम्पादित करने के लिये निष्ठा से युक्त हो । मस्तिष्क जिसमें प्रकृति के स्वरूप की स्वच्छ छवि हो । ऐसा मस्तिष्क जो कर्म सम्पादित करेगा उस कर्म की`गुणवत्ता उत्कृष्ठ होगी । कहने के लिये सुधार मस्तिष्क का हुआ । परंतु वास्तविकता में सुधार आत्मा का हुआ । यह है योग का निहित विज्ञान । यह विलक्षण उपलब्धि योग द्वारा ही सम्भव हो सकती है ।
जो मनुष्य अपने कर्म के परिणाम की चिंता ना कर आत्मा के सुधार के लिये प्रयत्नशील होता है वही एक समय ब्रम्ह की चिर दिव्य शांति आनंद को पाता है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । आत्मा को प्रकृति से निर्लिप्त होना सहज़ अपेक्षा होती है । परंतु प्रकृतीय मोंह में लिप्त आत्मा आम सहज़ विद्यमान स्वरूप है । यही भेद समझने का विषय है । इस भेद को समझ सही अपेक्षित स्वरूप पाना योग्य प्रयत्न होगा ।
प्रकृति के मध्य आत्मा स्थापित है । वह रहेगा सदैव प्रकृति में ही । रहना एक दशा है । उसमें लिप्त होना दूसरी दशा है । रहने की मनाही नहीं है । मनाही लिप्त होने की है ।

जो सर्वस्व त्यागता है । वह पाता है ज्ञान । मोंह को त्यागना है । प्रकृति को नहीं । ज्ञान पाना ही शांति पाना है । शांति ही आनंद है । जो प्रकृति के कर्ता स्वरूप को जान सकेगा वही ज्ञानी कहायेगा । जो आत्मा मात्र प्रकृति के आदेशों को कर्म में रूपांतित करेगा वही ब्रम्ह का सही आदर्श प्रतिनिधित्व करेगा । श्रीकृष्ण श्रीराम ब्रम्ह के प्रतीक थे । उनके कर्मों की गुणवत्ता त्रुटि रहित थी । उनकी आत्मा प्रकृति के आदेशों की यथा आदेश क्रिया रूप में रूपांतरित करने वाली थी । 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की शांति दशा । यह एकमात्र ऐसी दशा है जिससे कर्म की गुणवत्ता का विकास होता है । शांत मस्तिष्क ही वह आदर्श दशा है जिसे प्राप्त करने के लिये समस्त प्रयत्न किये जाने योग्य प्रयत्न होते हैं । मस्तिष्क में उठने वाले आवेग ही समस्त त्रुटिपूर्ण कर्मों को जन्म देने वाले होते हैं । कर्म फल प्राप्त करने के आवेग । अनुकूल कर्म फल ना मिलने की दशा में क्रोध के आवेग । संचित धन के छिन जाने के भय का आवेग । यह समस्त आवेग मस्तिष्क को अशांत करने वाले होते हैं । अशांत मस्तिष्क की कार्य गुणवत्ता प्रश्नवाचक होती है । योगावस्था में कार्य करने का अभ्यास पर्याय होता है शांत मस्तिष्क । सतत अभ्यास प्रदान करता है सतत शांत मस्तिष्क । शांत मस्तिष्क से किये गये कर्म की गुणवत्ता त्रुटि रहित होगी । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
मस्तिष्क की ऐसी दशा जिसमें सुख, दु:ख, लाभ हाँनि, विजय पराजय सभी में वह अविचलित रहे । शांति का समुंद्र । जिस प्रकार समुंद्र में नदियाँ लगातार जल लाकर गिराती रहती है परंतु उसका जल स्तर अपरिवर्तित रहता है । उसी प्रकार मस्तिष्क की शांति दशा समुंद्र के समान होनी चाहिये कि काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता रूपी नदियाँ कितना भी प्रवाह लावें परंतु उसकी शांति का स्तर अप्रभावित रहे । ऐसे मस्तिष्क के नियंत्रण में किये गये कार्य त्रुटियों से मुक्त होंगे ।

योग के अभ्यास द्वारा सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी शांत मस्तिष्क । चिर आनंद की दशा का भोग करना है तो बनाना होगा मस्तिष्क की शांत दशा । मस्तिष्क की शांत दशा पाने के लिये समस्त कर्मों को योग की अवस्था में करने का अभ्यास करना ही एकमात्र उपाय है । कर्मों की कर्ता प्रकृति है । हम प्रकृति के एक सूक्ष्म घटक हैं । प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों को करना हमारा कर्तव्य है । कार्य के परिणाम से कंचिद मेरा कोई सरोकार नहीं है । मस्तिष्क में इन सत्यों को धारण कर कार्य करने के अभ्यास द्वारा मिलेगी शांत मस्तिष्क की दशा । 

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

निराशीर्यतचित्तात्मा    त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वनाप्नोति किल्विषम् ॥
जो मनुष्य अपने मस्तिष्क को इच्छांओं से मुक्त रखते हुये और समस्त इंद्रीय वासनाओं से मुक्त रहते हुये अपने शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सके उसके कर्म में कोई त्रुटि नहीं होगी । यह कथन एक सत्य स्वरूप का निरूपण है । यह स्वरूप योग की अवस्था को पाने का पथ भी है । इसे बताने के बाद योगेश्वर श्री कृष्ण ने आगे बताया
शक्नोतीहैव च: सोढुं  प्राक्शरीर्विमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: ॥
इसी शरीर के रहते जो मनुष्य काम और क्रोध के प्रभाव से मस्तिष्क में उठने वाले आवेग को नियंत्रित कर मुक्त हो सकता है वही सुखी इंसान होगा ।
इसी शरीर के रहते के उल्लेख का अभिप्राय पुनर्जन्म के सिद्धांत को पुष्ट करते हुये तथा धर्मक्षेत्र के विद्वानों में प्रचलित मत जिसके अनुसार कर्म सिद्धि पाने के लिये कई कई जन्मों तक प्रयत्न करना पडता है, का खण्डन करते हुये, योगेश्वर कहते हैं कि इसी वर्तमान जन्म में ही जीवन जीते सुख की स्थिति पायी जा सकती है । इसे पाने के लिये वाँक्षना क्या बतायी ? काम पर विजय करके । इच्छाओं पर विजय द्वारा । क्रोध से मुक्ति पाकर । क्रोध का जन्म ही होता है काम की पूर्ति ना होने की दशा में । इसलिये यदि काम ही नहीं होगा तो क्रोध का उद्भव ही नहीं होगा । इसलिये मूल नियंत्रण काम का ही अपेक्षित होता है । परंतु उपरोक्त कथन में क्रोध का अंकन फिर अलग से क्यों आवश्यक हुआ ? यह प्रयत्नों को विफल बनाने के विचार से हुआ । सही कर्म करने का अभ्यास अर्थात योग की अवस्था में कर्म करने के प्रयत्न में बाधा उत्पन्न होती है काम और क्रोध द्वारा । काम आया मस्तिष्क में परिणामत: योग का प्रयत्न खण्डित हुआ फल होगा क्रोध । एक दशा है काम के अपूर्ण होने से दूसरी दशा है योग का प्रयत्न खण्डित होने से । यद्यपि कि योग का प्रयत्न काम की श्रेणी में नहीं होता फिर भी लक्ष्य के श्रेणी में तो रहता ही है । लक्ष्य खण्डित होने का फल भी क्रोध ही होगा । इसलिये योगेश्वर ने काम और क्रोध दोनों से मुक्त होने की दशा बतायी । 
पुन: विचारनीय है शब्द सुख । दु:ख की स्थिति उत्पन्न होती है मस्तिष्क की अशांति द्वारा । अशांति हो रहा है कुछ और मस्तिष्क चाह रहा है कुछ भिन्न । परिणाम मस्तिष्क की अशांत स्थिति । इसी आधार पर प्रत्येक स्तर पर इच्छाओं को अशांति का मूल बताया गया है । जो हो रहा है । जो प्रकृति कर रही है । तद्नुसार जो प्रकृति की अपेक्षा है उसी तारतम्य में कर्म करने से कोई अशांति जन्म नहीं लेगी । अशांति की अनुपस्थिति ही शांति की उपस्थिति है । प्रकाश और अंधकार दोनों एक साथ नहीं रहेगे । प्रकाश है तो अंधकार को कोई अस्तित्व सम्भव नहीं । अशांति की अनुपस्थिति ही शांति की उपस्थिति है।

प्रश्न उपस्थित होता है कि इच्छा का नियंत्रण अथवा शमन । यह पूर्णतया मनुष्य के अपने वश के क्षेत्र का विषय है । यह सत्य है कि आम प्रचलित जीवन में हर प्रत्येक मनुष्य इच्छा के अधीन ही समस्त कर्म कर रहा होता है । परंतु कंचिद यह जीवन जीने का अनिवार्य मार्ग नहीं है । इसलिये इच्छाओं को अंकुश करने, इच्छाओं को नियंत्रित करने, इच्छाओं को शून्य स्थिति तक पहुँचाने की स्थिति कोई भी हासिल कर सकता है परंतु प्रयत्नों द्वारा । क्योंकि आम पद्धति इच्छाओं की पूर्ति की प्रचलित है  

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि यदि इच्छायें मस्तिष्क में नहीं होवें और मनुष्य मस्तिष्क को नियंत्रित रख कर शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सके तो उस मनुष्य के कार्य में कोई त्रुटि नहीं होगी ।
निराशीर्यतचित्तात्मा    त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वनाप्नोति किल्विषम् ॥
शरीर को यंत्र के रूप में प्रयोग करना । शरीर द्वारा कर्म करने के लिये इसमें ज्ञानेंद्रिया सम्मलित हैं । इन ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से प्रकृतीय गुणों का प्रवेष होता है । इन प्रकृतीय गुणों में लिप्त हुये बिना इन इंद्रियों को एक कर्म करने के यंत्र के रूप में प्रयोग करना । इस प्रकार शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग करना ।
मस्तिष्क के संचय प्रभाग में किसी इच्छा का कोई भण्डारण ना होवे । आत्मा किसी प्रकृतीय गुण के भोग की इच्छा ना संजोये होवे । यह दोनों ही स्थितियाँ मस्तिष्क के कार्य संचालन दक्षता को प्रभावित करती हैं । इसलिये योगेश्वर ने कहा कि इन दोनो से मुक्त मस्तिष्क । कार्य का समस्त संचालन व नियंत्रण मस्तिष्क से ही होता है । इसलिये मस्तिष्क की दशा ही सर्वप्रधान महत्वपूर्ण होती है ।
परिग्रह जो इंद्रियों के प्रकृतीय हुणों के भोग के प्रति आत्मा में आसक्ति सृजित करने वाली होती हैं से मुक्त आत्मा । इन आसक्तियों का त्याग कर । कर्म संचालन व नियंत्रण केंद्र मस्तिष्क व्याधियों से विकारों से मुक्त । ऐसा मस्तिष्क शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सकेगा । ऐसे मस्तिष्क द्वारा संचालित कर्म त्रुटि मुक्त होगा ।
योग की दशा में कार्य करना । यह भी मस्तिष्क की एक विशिष्ट दशा का ही वृत्तांत बताया गया था । मस्तिष्क की योग की दशा पाने के उपाय के रूप में वर्तमान श्लोक में विस्तार बताये गये । निराशीर्यतचित्तात्मा    त्यक्तसर्वपरिग्रह मस्तिष्क विकारों तथा व्याधियों से मुक्त । ऐसा मस्तिष्क शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सकेगा । इस प्रकार शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग का परिणाम होगा कि कर्म त्रुटि से मुक्त होंगे ।

श्रीमद् भागवद् गीता में ब्रम्ह का ज्ञान तथा उसे पाने का पथ दोनों ही वर्णित है । ब्रम्ह ने अपने अंश को आत्मा के रूप में हम प्रत्येक में विद्यमान किया है । इस आत्मा की अनुभूति कर्म करने की विधा के द्वारा करने का उपाय योग । योग की स्थिति पाने का पथ निराशीर्यतचित्तात्मा    त्यक्तसर्वपरिग्रह की मस्तिष्क की स्थिति । आत्मा की अपनी शरीर में उपस्थिति का बोध ही ब्रम्ह को पाना है । कर्म में त्रुटि प्रगट करती है आत्मा की आसक्ति प्रकृति के गुणों के प्रति । इन त्रुटियों से मुक्ति शाश्वत आत्मा की उपस्थिति का भान करायेगा । ब्रम्ह को खोजने कहीं जाना नहीं है । वह हम सभी के अंदर विद्यमान है । उसे पहचानने के लिये उसपर आच्छादित विकारों और उसे ग्रसित किये व्याधियों को हटाना होगा । विकारों और व्याधियों से ग्रसित आत्मा त्रुटिपूर्ण कर्मों को प्रगट करती हैं । त्रुटिपूर्ण कर्म विकारों और व्याधियों को और बढाती हैं । इसलिये शाश्वत आत्मा के दर्शन के लिये अपने कर्म की त्रुटियों को सुधारना होगा । उपाय उपरोक्त वर्णित पथ द्वारा सम्भव होगा । 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इच्छा की पूर्ति में किये जाने वाले कार्य के परिणाम के प्रति मोह होना एक स्वाभाविक प्रतिफल होता है । इसके विपरीत प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य को करने की दशा में कर्ता के मस्तिष्क में कार्य के परिणाम के प्रति सन्यास भाव स्वाभाविक क्रम होता है । कार्य के परिणाम से मोह बंधन है । कार्य के परिणाम से सन्यास मुक्ति है । बंधन जन्म देता है दु:खों को । मुक्ति जन्म देती है शांति को । जो मनुष्य मुक्त रहते जीवन जीयेगा वह दु:खो की काली छाया से मुक्त होगा । दिव्य शांति का आनंद कार्य परिणाम से सन्यास से मिलेगा । दु:ख और कलह मिलता है कार्य के परिणाम से मोह करके ।
योगावस्था में कार्य करना मुक्ति दिलायेगा । मुक्ति इच्छाओं से । मुक्ति वासनाओं से । प्रकृति के प्रति मोह से । आसक्त आत्मा त्रुटि पूर्ण कर्म करायेगी । त्रुटिपूर्ण कर्म पैदा करेंगे जीवन में अशांति । कार्य वही होंगे । कार्य करने के समय मस्तिष्क की यथास्थिति के अनुसार अंतर पैदा होता है । यदि कार्य काल में कार्य के परिणाम से मोंह विद्यमान रहेगा मस्तिष्क में तो अशांति के पथ पर यात्रा होगी । यदि कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम के प्रति सन्यास विराजमान रहेगा तो यात्रा शांति के लिये होगी । कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम से मोंह की स्थिति अथवा सन्यास की स्थिति का होना निर्भर करेगा कार्य के चयन पर, कार्य करने के कारण पर, कार्य के प्रति भाव पर । यदि कार्य किसी इच्छा की पूर्ति में किया जा रहा है तो कार्य के परिणाम से मोंह अवश्य रहेगा, कार्य करने का कारण इच्छा की पूर्ति होगी, कार्य काल में मस्तिष्क में कर्तापन का भाव रहेगा । यदि कार्य प्रकृति द्वारा प्रेरित है तो कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम से कोई मोंह नहीं रहेगा, कार्य करने का निमित्त कार्य ही होगा, कार्य काल में मस्तिष्क में सेवा भाव रहेगा ।
कार्य करने के लिये ही जन्म हुआ है । कार्य के चयन और कार्य के निमित्त तथा कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के प्रति भाव को नियंत्रित रखने से शांति और आनंद की स्थिति मिलेगी । गलत कार्य चयन तथा कार्य के परिणाम से मोंह तथा कार्य के प्रति मस्तिष्क में कर्तापन का भाव दु:ख और अशांति उत्पन्न करेगा । इस सत्य को जो जानेगा । इस सत्य को अपने कार्य में जो चरितार्थ करेगा । वही आनंदित जीवन का भोग करेगा ।

संसार की समस्त परिस्थितियाँ एक ही रहेंगी । मात्र मस्तिष्क की उपरोक्तानुसार भिन्न स्थितियाँ सुख और दु:ख की दो परस्पर विपरीत स्थितियाँ उत्पन्न करेंगी । कार्य वही रहेंगे । मात्र उसे करने के काल में मस्तिष्क में विद्यमान कार्य के परिणाम के प्रति मोंह अथवा सन्यास की दो भिन्न  स्थितियों से कर्ता व्यक्ति हासिल करेगा दु:ख या आनंद । 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण
                      स्त्वमस्य विश्वस्य परँ निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परँ च धाम
                          त्वया  ततँ  विश्वमनंतरूप ॥
  
वायुर्वमोअग्निर्वरूण:   शशान्क
                           प्रजापतिस्त्वं  प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेअस्तु सहस्त्रकृत्व: -  
                          पुनश्च भूयोअपि नमो नम्स्ते ॥
विशाल विस्तृत प्रकृति ही समस्त रूपों की जननी है । समस्त सृष्टि की उद्गम श्रोत है । समस्त नियंत्रण प्रकृति के अधीन हैं । प्रकृति ही समस्त क्रियाँओं की कर्ता है । इसकी कार्य शैली और कार्य करने का विज्ञान इतना अद्भुद है कि कोई भी इसके नियंत्रण का उलंघन नहीं कर सकता है । जो मनुष्य इस प्रकृति के कर्ता रूप को मस्तिष्क में धारण कर कार्य को प्रकृति की सेवा के रूप में करता है वही कर्मयोगी है । कर्मयोगी को कार्य के परिणाम से कोई सम्बंध नहीं रह जाता है ।
प्रकृति ही समस्त संसार में विस्तरित स्वरूपों का उद्गम श्रोत है । प्रकृति ही समस्त स्वरूपों का पालन श्रोत है । प्रकृति ही समस्त रूपों का संहार श्रोत भी है । सभी स्वरूप प्रकृति में ही विलीन भी हो जाते हैं ।
कार्य के परिणाम से मोह रखते कार्य करने की प्रवृत्ति को त्याग कार्यों की कर्ता प्रकृति है और प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य प्रकृति की सेवा के भाव से करना ही मोह से मुक्ति है ।
जो मनुष्य कार्य को परिणाम की आकाँक्षा से करने की अपेक्षा कार्य को आत्मा की मोह से मुक्ति की कामना से करता है वही दिव्य शांति की स्थिति को पाता है ।

अनुभवी महात्माओं का मत है कि कर्म का सही स्वरूप कर्मयोग का अभ्यास हो जाने पर भी उसे प्रकृति की कृपा की वंदना करते ही रहना चाहिये । इस कथन का आधार यह है कि प्रयत्न काल में पथ से विचलित करने वाली प्रवृत्तियाँ सतत कार्य करती रहती हैं । इसलिये प्रयत्नों की सार्थकता के लिये प्रकृति की कृपा की वंदना करते ही रहना चाहिये । प्रकृति की कृपा सहायक ही होगी । 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

प्रकृति का व्यापक विस्तृत स्वरूप जिसमें नियंत्रण क्षमता पालन क्षमता सृजन क्षमता निहित है । इस स्वरूप का बोध होने पर एकाकी जीव की सूक्ष्म सीमित क्षमता अपरिहार्य रूप से ग्राह्य हो जाती है । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रिय शिष्य अर्जुन को योग और प्रकृति के कर्ता स्वरूप को बताया । परंतु अर्जुन को उसका सही रूप समझ में नहीं आया । इस स्थिति को व्यक्त करते हुये अर्जुन ने योगेश्वर से विनय किया कि कृपया हमें दिब्य रूप का दर्शन कराइये । योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि दिव्य रूप को तुम इन आँखों से नही देख सकोगे । इसलिये मैं तुम्हे दिव्य आँखे देता हूँ जिससे तुम दिव्य रूप को देख सकोगे । दिव्य चक्छु से अर्जुन ने प्रकृति का जो दिव्य रूप देखा उसका वृतांत कवि ने निम्नवत् व्यक्त किया
त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण
                      स्त्वमस्य विश्वस्य परँ निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परँ च धाम
                          त्वया  ततँ  विश्वमनंतरूप ॥

   
वायुर्वमोअग्निर्वरूण:   शशान्क
                           प्रजापतिस्त्वं  प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेअस्तु सहस्त्र्कृत्व: -
                          पुनश्क भूयोअपि नमो नम्स्ते ॥
अर्जुन ने जो दिव्यरूप देखा तो उसका वृतांत व्यक्त करते कहता है आप ही समस्त विष्व का आधार हो, आपही अनंत काल से सर्वभौम शासक हो, आपका ही वर्णन चारो वेदों में किया गया है, समस्त संसार में फैले हुये समस्त रूप आप ही हो प्रभू ।
वायु आपही हो, काल आपही हो, चंद्रमा आपही हो, सृजना कर्ता ब्रम्हा आपही हो, समस्त रूपों के मूल आपही हो, मैं आपके हज़ारों रूपों को बारम्बार प्रणाम करता हूँ ।

वास्तविकता का ज्ञान होने पर मनुष्य को अपने अस्तित्व की सूक्ष्मता का बोध होता है । और जब यह अहसास हो जाता है कि प्रकृति कितनी व्यापक है और एकाकी मनुष्य उसके सामने कितना सूक्ष्म अस्तित्व है तो अहंकार का दमन होता है । प्रकृति के स्वरूप का जब तक बोध नहीं रहता है तभी तक अहंकार छाया रहता है । मनुष्य को लगता है कि सब कुछ हम ही हैं । जब कि यह मात्र भ्रांति होती है । सब कुछ प्रकृति ही है । जो कुछ भी हो रहा है सब प्रकृति ही कर रही है । 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इस कर्म प्रधान संसार में कर्म की गुणवत्ता ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण एकाकी अवयव है जिसके आधार पर जीवन की सफलता निर्भर होती है । सफलता दोनों ही विचारों से । भौतिक जगत में प्रचलित इच्छाओं पर आधारित मानको के मूल्याँकन से भी । आध्यात्मिक विचारों पर आधारित मूल्याँकन से भी । इसलिये त्रुटि विहीन कर्म का विषेस महत्व होता है । आध्यात्मिक विचार की श्रंखला में त्रुटि रहित कर्म शांति प्रदान करेगा । लौकिक जगत में प्रचलित इच्छाजनित कर्मों के त्रुटि रहित होने पर अधिक भौतिक उपलब्धियाँ सुलभ कराने वाला होगा । यद्यपि कि ये भौतिक उपलब्धियाँ अशांति प्रशस्थ करने वाली होंगी परंतु इच्छाओं की पुष्टि होने से कर्ता की इच्छाओं की तुष्टि मिलेगी । आध्यात्मिक पक्ष पर अपनी चर्चा को केंद्रित रखते हुये, त्रुटि जैसा कि पूर्व के अंकों में उल्लेख किया गया था, इच्छा की पूर्ति में किया जाने वाले कर्म को त्रुटिपूर्ण कहा गया । उचित कर्म क्या है प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म । प्रकृति ने ही जन्म दिया है । इस जन्म देने में प्रकृति का मंतब्य यही था कि हम प्रकृति का कार्य करें । इस अपेक्षा के विरुद्ध स्वयं अपनी इच्छा का कार्य करना तर्क के आधार पर भी गलत प्रमाणित होता है । कोई कम्पनी अथवा संस्था कोई कार्मिक रखता है तो कार्मिक का सहज़ धर्म होगा कि वह उस कम्पनी अथवा संस्था के संविधान के अनुरूप कार्य करे । यदि कार्मिक उस कम्पनी अथवा संस्था के संविधान की परवाह ना करे और स्वयँ अपने इच्छा से कार्य करे तो उसका इस प्रकार किये गये कर्म को वह कम्पनी अथवा संस्था बर्दाश्त नहीं करेगी । ठीक इसी आधार पर प्रकृति के बंदे यदि प्रकृति के नियमों का उलंघन करते है तो प्रकृति के कोप के पात्र बनेंगे ही ।
त्रुटिपूर्ण कर्मों से बचने का एकाकी उपाय है योग की अवस्था में कर्मों को करना । मस्तिष्क की योग की अवस्था पाने के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप को धारण करना है । प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही पाप और पुण्य सृजित करने वाले कर्मों से मुक्ति पाना है । पाप और पुण्य की श्रेणी के कर्मों से मुक्ति ही पर्याय है त्रुटि रहित कर्म । कर्मों की त्रुटि का एकाकी कारण होती है इच्छा ।

सात्विक तामसिक और राजस यह तीन आवरण हैं जिनकी आड में छिपकर बंदा अपनी इच्छा की पूर्ति का कार्य करता है । यह तीनों वृत्तियाँ बंधनकारी है । मोक्षदायक होता है सन्यास । सन्यास संसार से नहीं । सन्यास किये जाने वाले कर्म के परिणाम स्वरूप पैदा होने वाले कर्म के फल से सन्यास । यह सन्यास जननी होती है योगावस्था की । योगावस्था आधार है त्रुटि रहित कर्म हेतु । उपरोक्तानुसार दो अलग अलग पथ है । सात्विक तामसिक और राजस के पथ पर चलते इच्छाओं के लोक में यात्रा करते सुख दु:ख के आँचल में जीवन यापन करें । अथवा सन्यासी बन सुख दु:ख से मुक्त शांत आनंदमय जीवन का भोग करें । 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

प्रकृति का दायित्व है कर्म करना । कर्ता है ब्रम्ह का अंश आत्मा । इसलिये प्रकृति यदि कंचिद आत्मा को प्रेरित ना कर सकी तो कर्म सम्भव नहीं होगा । प्रकृति आत्मा को कर्म में संलग्नकरने के लिये एक तरफ अपने गुणों का प्रयोग करती है तो दूसरी ओर आत्मा की आसक्ति का लाभ उठाते हुये उसे कार्य में संलग्न करने का पथ अपनाती है । इन्ही सत्यों के आधार पर भारतीय धर्म दर्शन में समस्त आचरण सम्बंधित पथ निर्दिष्ट किये गये हैं । आत्मा को ब्रम्ह ने प्रकृति के मध्य रखा ही इसीलिये है कि वह प्रकृति के कार्य दायित्व को पूरा करावे । इसलिये बिना अलग से उल्लेख किये यह अनिवार्य वाँक्षना होती है आत्मा के कर्तब्य की कि वह प्रकृति द्वारा निर्देशित कार्यों को ही करे । यह अत्यंत विचित्र स्थिति होती है कि प्रकृति आत्मा को अपने गुणों के सहारे ही कार्य में संलग्न भी करती है और यही गुणों में आसक्ति ही आत्मा को प्रकृति के निर्देशों के विपरीत कार्य करने का पथ भी बनता है । इसलिये मनुष्य शरीर की प्रकृति को अति संयमित और नियंत्रित रखना अत्यधिक महत्वपूर्ण योगदान करने वाला प्रमाणित होता है । शरीर की संयमित प्रकृति ही आधार बनती है आत्मा के संयमित आचरण के लिये । शरीर की संयमित प्रकृति का अर्थ है शरीर के प्रत्येक अवयव का नियंत्रित उपयोग । जिह्वा विशिष्ट स्वाद की कामना प्रेरित ना करे । नाक विशिष्ट गंध की कामना प्रेरित ना करे । इसी प्रकार अन्य इंद्रियाँ भी । इस स्थिति को पाने के लिये सोना जगना खाना पीना सभी कुछ संयमित और नियंत्रित करना होगा । जब तक बिना विचारे व्यसनों में संलग्न रहेगा कोई तब तक संयम उसके लिये एक कल्पना मात्र रहेगी । संयमित प्रकृति पर्याय है संयमित जीवन शैली का । व्यापक विस्तृत प्रकृति शरीर की प्रकृति को नियंत्रित करती है । शरीर की प्रकृति का संयम बाह्य प्रकृति के नियंत्रित प्रभाव का आधार बनेगा । गुणों के भोग की वृत्ति नियंत्रित होगी । यह सारी उपलब्धि किसी बाह्य श्रोत अथवा शक्ति से सम्भव नहीं होगी । यह उत्थान सदैव अपने प्रयत्नों से सम्भव होगा । 

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत दिवस के लेख के क्रम में
निराशीर्यत्चित्तात्मा     त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥ 
शरीर को प्रकृति ने बनाया है कर्म करने के लिये । कर्म की प्रेरणा प्रकृति से ही ग्रहण करना अपेक्षित होता है । व्यवहारिक जगत में प्रचलित रूप में कर्म की प्रेरणा इच्छा से ग्रहण करने का अभ्यास प्रत्येक मनुष्य का है । उपरोक्त श्लोक में इसी प्रचलित भ्रांति के निवारण की बात कही गयी है । इच्छाओं का जन्म होता है आसक्ति से । इसीलिये कहा कि सभी इंद्रियों की आसक्ति को त्याग कर । इस त्याग की उपलब्धि क्या होगी ? इस शरीर में कर्म करने के लिये जो भी प्रकृति के आदेश आयेगें शरीर उन्हे आदेश की अपेक्षानुसार करेगी । मस्तिष्क में इच्छाओं की उपस्थिति से प्रकृति के प्राप्त आदेश को यथाआदेश कर्म करने की प्रवृत्ति क्षीण होती है । इसी स्थिति को अधिक स्पष्ट करने के लिये श्लोक के उत्तरार्ध में कहा कि शरीर को एक कर्म करने के यंत्र के रूप में प्रयुक्त किया जाय । जिस प्रकार यंत्र एक निश्चित विधि से कार्य करता है उसी प्रकार शरीर भी कर्म करे । यंत्र को चलाने वाला कौन है इस बात से उसके कर्म में अंतर नहीं होता उसी प्रकार शरीर के कार्य में भी होना चाहिये । प्रकृति कर्ता है । यदि उसके आदेश को शरीर उसी रूप में कर्म में पर्णित कर रही है तो यथा अपेक्षा है । यदि प्रकृति के आदेशों में इच्छा को मिश्रित किया गया तो त्रुटि है ।
उपरोक्त अपेक्षा यंत्र की उच्च efficiency की कार्य गुणवत्ता को प्राप्त करने के उद्देष्य से है । efficiency  शब्द विज्ञान में किसी यंत्र में input  और output  के अनुपात को व्यक्त करने के लिये किया जाता है । उपरोक्त श्लोक में जो अपेक्षा व्यक्त की गई है वह ठीक यही है कि प्रकृति का आदेश जिस भी स्वरूप में input  होवे उसी रूप में बिना किसी विकृति के शरीर उसका कर्म output  प्रगट करे । 100% efficiency |  यद्यपि की विज्ञान निर्मित कोई यंत्र 100% efficiency  का नहीं होता है । परंतु यह शरीर प्रकृति निर्मित यंत्र है और यदि योगावस्था में कार्य किये जाँय तो 100% efficiency मिलती है ।

उपरोक्त कथन का और अधिक स्पष्ट स्वरूप अनुभव करने के लिये पारा का दृष्टांत प्रस्तुत है । पारा को किसी भी पात्र में रखा जाय और बाद में उसे उस पात्र में से निकाल दिया जाय । जितना पारा उस पात्र में रखा गया था वह पूरा पूरा वापस मिल जावेगा । पारा ना ही उस पात्र जिसमें उसे रखा गया था का कुछ लेकर वापस आयेगा और ना ही अपना कुछ भाग उस पात्र में छोडकर आयेगा । इसी पारे के चरित्र के अनुसार जो शरीर प्रकृति के आदेशों का अनुसरण करेगी वही सही आचरण होगा । प्रकृति के आदेशों का यथाआदेश पालन उसमें इच्छाओं का आरोपण रंचमात्र भी नहीं । ऐसा एक ही दशा में सम्भव होगा जब व्यक्ति इंद्रियों की भोग आसक्ति से मुक्त होगा ।   

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

मनुष्य की शरीर की रचना । शरीर की रचना में प्रकृति का विज्ञान । शरीर के अंगों के नियंत्रण की क्षमता मस्तिष्क में निहित । मस्तिष्क में व्याप्त विचारों का कार्य की गुणवत्ता पर प्रभाव । इन सभी को विस्तार पूर्वक बताने के उपरांत योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक निचोड स्थिति बताते हुये कहते हैं कि
जो व्यक्ति प्रकृतीय गुणों के प्रति मोंह को त्याग कर सभी प्रकार की इच्छाओं को नियंत्रित करके शरीर को यंत्रवत कार्य में संलग्न करता हैं उसके कर्म में कोई त्रुटि नहीं होती । शरीर की उत्पत्ति कार्य करने के निमित्त से ही हुई है । परंतु कार्य के फल के साथ जो मस्तिष्क में व्याप्त मोंह है वही कर्म दोष उत्पन्न करने वाला होता है । जो व्यक्ति इस सत्य को जानकर और मस्तिष्क की इच्छा व मोंह को त्याग कर कार्य करता है उसके कर्म में दोष नहीं होता ।
निराशीर्यत्चित्तात्मा     त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥  

शरीर को कार्य करने के लिये एक यंत्र के स्वरूप में जो भी व्यक्ति प्रयोग कर सकेगा उस व्यक्ति के कार्य में कोई त्रुटि नहीं होगी । 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक के क्रम को सतत् रखते हुये
योगेश्वर श्री कृष्ण ने प्रकृति की नियंत्रण क्षमता को बताया
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि  मत्स्थानीत्युपधारय  ॥
पुन: प्रकृति की क्रिया शैली में किस प्रकार उसमें निहित नियंत्रण क्षमता का प्रयोग सम्भव होता है को बताया
स्वभावजेन   कौंतेय  निबद्ध:  स्वेन  कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोअपि तत् ॥    
उपरोक्त उद्घृत दृष्टांतों से प्रगट किये गये योगेश्वर श्रीकृष्ण के विचारों को आत्मसात कर महात्माओं ने यही योग्य निष्कर्श निकाला कि इस संसार में जीवन जीने के लिये योग्य मत यही है कि प्रकृति की प्रभुता की कृपा क्षाया में जीवन जीया जाय । किसी भी दशा में प्रकृति की अपेक्षाओं का अथवा प्रकृति के संचरित व्यवस्था का विरोध करने वाला कोई कृत ना किया जाय । यही सज्ञान पूर्वक करने के लिये योगावस्था में कार्य करने का पथ सुझाया गया । योगावस्था वह दशा जिसमें मस्तिष्क पर कार्य के परिणाम से प्रभाव ना पडे । ना ही मस्तिष्क अनुकूल कार्य परिणाम से हर्षित होवे । ना ही विपरीत कार्य परिणाम से दु:खी होवे । योगावस्था जिसमें कार्य ही कार्य को करने का निमित्त होवे । योगावस्था जिसमें कार्य के परिणाम की अपेक्षा के बगैर कार्य को किया जाय । ऐसा करना प्रकृति के प्रति निष्ठावान होना है । ऐसा करना प्रकृति के प्रति आज्ञाकारी होना है । जो व्यक्ति प्रकृति के प्रति निष्ठावान होगा प्रकृति के प्रति आज्ञाकारी होगा प्रकृति उसके ऊपर कृपालु होगी । उसके कृत पावन होंगे । कार्यों को करते वह दिव्य शांति की अनुभूति करेगा । चिर दिव्य आनंद की स्थिति का भोग करेगा ।
उपरोक्त के प्रतिकूल यदि प्रकृति की अपेक्षाओं की उपेक्षा कर स्वयं अपनी इच्छा की पूर्ति के निमित्त कार्य करना प्रकृति के कोप का पात्र बनना होगा । प्रकृति के कोप को झेलना जीवन को कष्टमय बनाना होगा । जीवन अशांत होवेगा । भय उद्वेग आक्रोश की स्थितियाँ सदैव सम्मुख रहेंगी । जीवन कष्टों का पर्याय बन जावेगा ।

कंचिद यदि प्रारम्भ में अपने सज्ञान के सहारे यह सम्भव ना हो सके कि योगावस्था में कार्य कर सकें तो ऐसी दशा में प्रकृति की कृपा के लिये प्रकृति की ही वंदना करना योग्य मत होगा । प्रकृति निष्ठावान व्यक्ति के ऊपर सदैव कृपालु होती है । प्रकृति की कृपा होने की दशा में प्रत्येक असम्भव प्रयत्न सम्भव साध्य बन जाते हैं । 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि  मत्स्थानीत्युपधारय  ॥
प्रकृति ने समस्त रचना क्षिति, जल, गगन, पावक, और वायु नामक पाँच घटको के द्वारा की है । इनमें वायु ही जीवन का आधार होती है समस्त जीव श्रेणी के जीवन का । इस वायु में जीवन पोषण क्षमता भी है और प्रचण्ड शक्ति भी निहित होती है । वायु की शक्ति को नियंत्रित करने का सामर्थ्य किसी में नहीं है । ऐसी प्रचण्ड शक्ति पुँज वायु स्वतंत्र रूप से समस्त सृष्टि में विचरण करती है । परंतु जब प्रश्न विचारणीय होता है प्रकृति की क्षमताओं का तो पाया जाता है कि प्रकृति ने प्रचण्ड शक्ति युक्त वायु को भी सीमित किया है आकाश space द्वारा । वायु की समस्त क्षमता आकाश की सीमा में ही प्रभावी है । आकाश के परे नहीं । यह परिचायक है प्रकृति की क्षमता का ।
प्रकृति की उपरोक्त क्षमता को देवी देवता भी नतमस्तक हो स्वीकारते है । भगवान शंकर कहते हैं विधि विपरीत भलाई नाही विधि अर्थात प्रकृति, विपरीत अर्थात प्रकृति के नियोजन के विपरीत, प्रकृति ने जो भी व्यवस्था प्रचारित की है उसके विपरीत आचरण करने वाले का भला अंजाम नहीं होगा । योगावस्था में कार्य करने का जो सुझाव है वह इसी सत्य का क्रिया रूप है । प्रकृति  की अपेक्षा के अनुरूप कार्य । प्रकृति द्वारा आदेशित कार्य ।
शक्तिशाली प्रकृति के नियोजन के विरुद्धकार्य किसी भी दशा में सफल नहीं हो सकता । प्रकृति कर्ता के मस्तिष्क में व्याप्त मोंह को काबू कर लेगी और उसे वाध्य होकर प्रकृति के नीयत किये गये कर्म को करना होगा । इसी सत्य को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रकार बताया 
स्वभाव्जेन   कौंतेय  निबद्ध:  स्वेन  कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोअपि तत् ॥     

मस्तिष्क में व्याप्त मोह के प्रभाव से हे अर्जुन तुम मेरे कहे से प्रकृति के द्वारा आदेशित कर्म को नही कर रहे हो परंतु प्रकृति तुम्हारे मस्तिष्क के मोंह को अतिक्रमित कर लेगी और तुम बाध्य होकर अपनी इच्छा के विपरीत कर्म करोगे । 

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

प्रकृति का व्यापक स्वरूप । जीव की सूक्ष्म दशा । इन्हे बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते है
यथाकाश्स्थितो नित्यं वायु: सर्वत्र्गो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारया ॥   
जिस प्रकार वायु सर्वत्र विचरण के लिये स्वतंत्र होते हुये भी आकाश space  के अंदर सीमित रहती है । उसी प्रकार समस्त जीव मेरे अंदर सीमित दशा में स्थिति है ।

वायु प्राण का आधार है । प्रकृति के समस्त व्यापक विस्तार में जीव निवास करते हैं । उन समस्त जीवों के प्राणों को आधार प्रदान करने के लिये वायु को प्रकृति के समस्त विस्तार में स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करने की छूट प्रकृति ने प्रदान की है । परंतु इतनी स्वतंत्रता स्वीकृत करने के बावज़ूद भी प्रकृति ने वायु को आकाश की सीमा में सीमित किया है । इस दृष्टांत के अवलम्ब से योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जीव कोटि की सीमित दशा तथा उसे कार्य करने की स्वतंत्रता को व्यक्त किया है । दृष्टांत जो दृष्टि से देखे जा सकते हैं । दृष्टि से देखा हुआ मस्तिष्क के स्मृति भण्डार में चिर रहता है । विस्मृत नहीं होता । इसलिये अपेक्षा की जाती है कि दृष्टांत विस्मृत नहीं होगा । इस वर्तमान दृष्टांत में योगेश्वर प्रकृति के व्यापक स्वरूप और प्रकृति का जीव के कर्मों के नियंत्रण की क्षमता को व्यक्त करने के उद्देष्य से वायु जो प्रचण्ड शक्ति की धारक होती है को आकाश की सीमाओं में निहित बता कर प्रकृति की व्यापक शक्ति और नियंत्रण सामर्थ्य को व्यक्त किया है ।