शनिवार, 30 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

 इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
भक्ति के संक्षिप्त परिचय के उपरांत अब एक दृष्टि ब्रम्ह के कर्म संविधान पर । ब्रम्ह के कर्म संविधान में प्राविधान किया गया कि सृष्टि में हो रहे कर्मों की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति है रचना है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है । ब्रम्ह का अंश होने के कारण वह ब्रम्ह की रचना प्रकृति का ज्ञाता होता है । स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्श निकाला जा सकता है कि रचनाकार रचना से श्रेष्ठ है । इस प्रकार आत्मा प्रकृति से श्रेष्ठ है । नित्य जगत में व्यवहारिक कर्ता है । कर्म संविधान के प्राविधान के अनुसार सृष्टि के समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इस प्रकार आत्मा का कर्तापन प्रकृति के अधीन हुआ । श्रेष्ट आत्मा को अधीन रहना है अपनी उत्पक़्त्ति प्रकृति के । कितनी अद्भुद संरचना है । यही मूल है समस्त सृष्टि में व्याप्त कलह अशांति का । समस्त व्यग्रता का मूल । परंतु सत्य ।
अब दृष्टि डालिये कर्म सम्पादन काल पर । संविधान के अनुसार प्रकृति कर्ता है । प्रकृति सदैव सजग है कि उसे अपने किसी भी कार्य को सम्पादित करने के लिये अपने से श्रेष्ट आत्मा का सहारा अवश्यमेव चाहिये । इसलिये उसे यान केन प्रकारेण आत्मा को अपने कार्य को सम्पादित करने के लिये तत्पर करना ही करना है । अन्यथा वह ब्रम्ह के निर्देशानुसार कार्य पूर्ण न कर सकेगी और ब्रम्ह के कोप का भाजन बनेगी । वह निष्ठावान है इसलिये वह ब्रम्ह के कार्य के लिये हर सम्भव प्रकार से आत्मा को कार्य में संलग्न करने में सफल रहती है ।
उपरोक्त के विपरीत श्रेष्ट आत्मा अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में लिप्त होता है । प्रकृति के गुणों का भोक्ता होने के कारण गुणों में आसक्ति जनित कर क्षीण दशा को प्राप्त होता है । जितना ही यह आसक्ति और अहंकार प्रबल होती है उतना ही प्रकृति को आसान पडता है आत्मा से कार्य कराना । क्षीण आत्मा प्रकृति के सम्मुख एक गुलाम की भाँति होता है । अपनी समस्त प्रभुता को भुला वह प्रकृति के सम्मुख एक भिखारी की भाँति लोलुप प्रस्तुत होता है ।
यह ब्रम्ह का अद्भुद विज्ञानयुक्त कार्य संविधान और प्रकृति एवं पुरुष मिश्रित सृष्टि की रचना है । इसी में आनंत काल से मनुष्य सुख दु:ख भोगते चला आया है, चलता जा रहा है, और चलता ही रहेगा । मनुष्य के सामने कोई विकल्प है ही नहीं । परंतु यदि मनुष्य अपने को पहचान सके, ब्रम्ह को जान सके, और कर्म करना सीख सके तो वह ब्रम्ह का प्रतिनिधि है इसलिये ब्रम्ह की गरिमा का जीवन यापन कर सकेगा ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप आत्मा का कर्म सम्पादन यदि है तो ब्रम्ह की व्यवस्था यथा नियोजित चलती रहेगी । परंतु यदि किन्ही कारणों से आत्मा का कर्म सम्पादन ब्रम्ह के कर्म संविधान के प्रतिकूल होता है तो ब्रम्ह की व्यवस्था कुप्रभावित होती है । ऐसी दशा में आत्मा के कर्म सम्पादन को सुधारने की स्थिति हो जाती है । इसी कर्म सुधार के विचार क्रम में सरलतम पथ के रूप में भक्ति को सुझाया गया है । यह सृष्टि कर्म प्रधान है । कर्म ही मानक होता है प्रत्येक मूल्यांकन हेतु । जिस मनुष्य का कर्म सही है वह ही सही कहा जावेगा । जिस मनुष्य का कर्म दोषपूर्ण होगा वह प्रत्येक मूल्यांकन में गलत ही प्रमाणित होगा । त्रुटिपूर्ण कर्म का ज्ञान होने पर उसे सुधारना ही उपाय रह जाता है उत्थान के लिये । त्रुटि का श्रोत जनित होता है सदैव प्रकृतीय माध्यमसे ही । इस निमित्त सुधार के लिये प्रकृति के प्रति सम्मानजनक भाव का निवेष अनिवार्य है । प्रकृति की कृपा के लिये निष्चय ही समर्पित होना होगा । यही भक्ति पथ है ।
शरीर के दो घटक आत्मा और प्रकृति । आत्मा तो पूर्णतया अलौकिक है । इसलिये इसे प्रकृति निर्मित शरीर से जाना नही जा सकता । परंतु प्रकृति ज्ञेय है । प्रकृति को जितना जान सकेंगे उतना ही सही आचरण सम्भव होगा । मनुष्य शरीर प्रकृति निर्मित है । प्रकृति के मध्य कार्यरत है । प्रकृति ही कार्य प्रेरक है । प्रकृति ही कार्य नियंत्र्क है । प्रकृति ही विकृति जनित करने का माध्यम है । प्रकृति ही न्याय निर्धारित करती है । सही संतुलित कार्य सम्पादन के लिये प्रकृति के प्रति निष्ठा व आदर भाव और प्रकृति की कृपा पर निर्भरता ही सरलतम पथ है । यही भक्ति मार्ग है ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
ज्ञान यात्रा के वर्तमान विचार स्थल भक्ति के सम्बंध में पूर्व में व्यक्त विवरण के क्रम में यह उल्लेख महत्वपूर्ण है कि प्रकृति ब्रम्ह की व्यापक व्यवस्था है । प्रकृति के माध्यम से ब्रम्ह ने समस्त सृष्टि की रचना की है, सृष्टि का नित्य प्रतिदिन संचालन कर रहे हैं, और प्रकृतीय घटको की आयु पूर्ण होने पर उनके निर्मित स्वरूप को समाप्त कर पुन: प्रकृति के घटको नामत: क्षिति, जल, गगन, पावक व समीर में विलीन करते हैं । मनुष्य का अस्तित्व इस व्यापक प्रकृतीय व्यवस्था में अति लघु है । मनुष्य इस प्रकृतीय व्यवस्था का मात्र  नाम मात्र का अंश है । इसलिये किसी भी मनुष्य को प्रकृति की व्यवस्था में हस्तक्षेप, अथवा विघ्न, अथवा विचलन, अथवा गतिरोध उत्पन्न करने का अधिकार नहीं है । मनुष्य मात्र उतना ही संचालन प्रवृत्ति करने को अधिकृत है जितना प्रकृति उसपर आरोपित करती है । इसीलिये मनुष्य की अपनी इच्छाओं अथवा आसक्ति के कार्यों को वर्जित किया गया है धर्मदर्शन शास्त्रों में । इसके विपरीत आत्मा की सहज प्रवृत्ति होती है प्रकृतीय गुणों में आसक्ति सृजित करने की. आसक्ति सृजित होने पर उन्हे पाने की इच्छा यह नित्य प्रतिदिन हर एक मनुष्य के साथ घटित हो रहा है । इसी दुर्बलता के अधीन हम सभी नित्य-प्रतिदिन ब्रम्ह के कर्म संविधान अर्थात प्रकृति कर्ता है को स्वीकार नहीं कर पाते हैं और इच्छा जनित कार्यों को लक्ष्य कर सारी शक्ति और उर्जा निवेषित करते रहते हैं ।
उपरोक्त कथित ब्याधि को पहचानने की चेष्टा और उसे निवारण करने के लिये ब्रम्ह के प्रकृतीय स्वरूप की ही बंदना करें क्योंकि समस्त ब्याधि का सृजन प्रकृति से ही उत्पन्न होता है, प्रकृति की महिमा से ही होता है । यह प्रकृति में ब्रम्ह द्वारा पिरोया अद्भुद विज्ञान है । इससे मुक्ति प्रभु की कृपा से ही सम्भव होगी । उन्ही का शरण ग्रहण करें । उन्ही पर समर्पित हो जाँय । यही भक्ति है ।

     प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

बुधवार, 27 नवंबर 2013

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण भक्ति । कर्म संस्कार को शोधकर त्रुटिपूर्ण से ब्रम्ह संविधान के अनुकूल आचरण बनाने का उपाय । इस भक्ति के लिये आवश्यक गुणों (1) आराध्य के प्रति आदर भाव (2) आराध्य को समर्पण की चर्चा के उपरांत आदिकालीन विद्वान महात्माओं का मत । अधिकतर महात्माओं ने आराध्य और आराधक के मध्य स्वामी और सेवक के भाव को पुष्ट किया है । आराध्य स्वामी होता है और आराधक सेवक होता है । मनुष्य शरीर के अवयव प्रकृति और आत्मा के संदर्ब में प्रकृति स्वामी और आत्मा सेवक का भाव ही विधि सम्मत है । यह ब्रम्ह संविधान के अनुकूल है । जबकि मनुष्य शरीर में उपलब्ध घटक प्रकृति और आत्मा में संसार के कर्मों की दृष्टि से आत्मा नित्य कर्ता होता है । परंतु यही विशिष्ट स्थिति ही समझना ही विषेस महत्व का है । नित्य कर्ता आत्मा ही है परंतु प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है । व्यवस्था कार्य करती है । आत्मा कर्ता है । मात्र व्यवस्था के अंग के रूप में । सेवक के रूप में । यह हृदयस्थ होना ही भक्ति है ।  

     प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

 इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
परम् ब्रम्ह का अंश आत्मा और उसकी उत्पत्ति प्रकृति तथा इन दोनो की परस्पर क्रिया द्वारा उद्भव हुआ कर्म यह तीनों ही ब्रम्ह की पहेलियाँ हैं । यही तीनों ही सकल विश्व का स्वरूप हैं । आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृति का ज्ञाता होता है । फिरभी ब्रम्ह का अद्भुद विज्ञान की आत्मा प्रकृति के गुणों में आसक्ति कर बैठता है । फलत: आत्मा के कर्म दूषित हो जाते हैं । वह ब्रम्ह के कर्म संविधान का हठात उलंघन करने लगता है । यही मूल होता है सुख और दु:ख की अनुभूति का । जब इसके निवारण का प्रश्न आता है तो विद्वान ज्ञाता ने सुझाया सरलतम भक्ति पथ । पथ तो और भी है । परंतु भक्ति पथ से चल कर ब्रम्ह की चिर दिब्य शांति की अनुभूति तक पहुँचना सभी अन्य पथो की अपेक्षा सरल है । यद्यपि कि यह सरल और कठिन की चर्चा मात्र यात्राकाल में साधनाकाल में प्रभावी होती है । गंतब्य मंजिल पर पहुँचने पर अनुभूति होने वाली दिब्य शांति एक ही होती है । यह दिब्य सुखानुभूति ऐसा मधुर स्वाद है जो पथिक होकर चलने वाले को मंजिल पर पहुँचने पर ही मिलता है । मात्र किसी के बताने से अथवा कहीं लिखा हुआ पढने से नहीं मिल सकता । भक्ति पथ अथवा अन्य ज्ञान पाने के पथ से यात्रा करने पर परम् ब्रम्ह की अनुभूति का रस एक ही होगा मात्र अंतर साधनाकाल में सुलभ सुगमता अथवा दुर्गमता का भेद होगा । ब्रम्ह जो पूर्णतया अलौकिक स्वत: अस्तित्व है वह रहेगा तो सदैव भिन्न ही परंतु जितना ही सम्मानजनक भाव संजोकर यात्री यात्रा करेगा उतना ही उसकी दिब्य शांति की अनुभूति का स्वाद ग्रहण कर सकेगा ।

     प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

सोमवार, 25 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
ब्रम्ह के कर्म संविधान के पालन की चर्चा के क्रम में सरलतम पथ के रूप में भक्ति पथ को अंगीकार करने की अनुशंसा करते हुये भक्ति पथ की वाँक्षित अनिवार्य वाँक्षनाओं से अवगत होना आवश्यक है । प्रथम वाँक्षना होती है साधक के मन अर्थात मस्तिष्क में आराध्य के प्रति आदरपूर्ण भाव का निवेश । यह अत्यंत आवश्यक है कि साधक मनुष्य अपने आराध्य के प्रति अति आदर जनक भाव धारण करता है । इसके आभाव में वह चाहते हुये भी कर्म संविधान के अनुसार कार्य आचरण नहीं सम्पन्न कर सकेगा । आदरपूर्ण भाव के विद्यमान रहने पर ही वह कार्य को सेवा भाव से कर सकेगा । इस वाँक्षना का कोई अपवाद नहीं है ।
दूसरी अनिवार्य वाँक्षना होती है समर्पण । साधक को आराध्य के प्रति समर्पित होना भी परम आवश्यक होता है । समर्पित होने की दशा में ही वह अनन्य भाव से सेवा रूप में कार्य सम्पादित करेगा । सतत मस्तिष्क पटल पर यह विचार चमकते सूर्य की भाँति प्रकाशमान रहना चाहिये कि आराध्य का आदेश पूर्ण करना मेरा शाश्वत कर्तब्य है ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

रविवार, 24 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचारक्रम केंद्रित है ब्रम्ह के कर्म संविधान का पालन करने के उपाय के विषय में । संविधान का उलंघन सर्वथा अवाँक्षित होता है । प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है । व्यवस्था सृष्टि के संचालन की । ब्रम्ह ने सृष्टि बनाया । इस सृष्टि को संचालित करने के लिये प्रकृति बनाया । प्रकृति को संचालन क्षमता दी आत्मा के माध्यम से । प्रकृति गुणयुक्त है । आत्मा प्रकृति के गुणों की भोक्ता है । इसीलिये आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर लेती है । परिणामत: आत्मा का कार्य निस्तारण ब्रम्ह के कार्य संविधान के उलंघन की सीमा तक त्रुटिपूर्ण हो जाता है । जब मनुष्य को अपनी त्रुटि का बोध होता है तो तलाशता है त्रुटि से उबरने का मार्ग । इस तलाश में भक्ति सरलतम उपलब्धि है ।
भक्ति आराध्य ब्रम्ह की । भक्ति ब्रम्ह की व्यवस्था अर्थात प्रकृति की । क्रमश: निर्गुण और सगुण ब्रम्ह की । परम् ब्रम्ह निर्गुण है । प्रगट ब्रम्ह अर्थात प्रकृति गुणयुत है अर्थात सगुण । विचार किया जाय तो विदित होता है कि ब्रम्ह के कर्म संविधान की मूल मंशा भी यही है सगुण की सेवा । संविधान में व्यवस्था देना की सकल कर्मों की कर्ता प्रकृति है । विदित है कि सगुण कर्ता है । अव्यक्त परंतु निर्देश तो निर्गुण आत्मा के लिये ही व्यक्त किया गया है कर्म संविधान में । इस प्रकार निर्गुण की भक्ति सगुण के प्रति । यही आत्मा के भटकाव का मूल भी है । दायित्व निर्वाह तो वह कर्म संविधान के प्रति निष्ठावान होकर ही करता है । वही निष्ठा ही उसे आसक्ति में फँसाती भी है । यही माया की महिमा है ।
बिना भगवान की कृपा के माया से उबरना सरल नहीं है । सत्यनिष्ठा ही बंधन बन जाती है । बंधन में बँधते ही सत्यनिष्ठा लुप्त हो जाती है । वह अभियोगी कहा जाने लगता है । संविधान उलंघन का लान्क्षन लग जाता है । आत्मा विस्मय में पड जाती है कि मैं तो सत्यनिष्ठा से कार्य कर रहा था तो यह लांक्षन कैसा ? परंतु उस बेचारे को अनुभव नहीं कि उसकी सत्यनिष्ठा ही उसका लान्क्षन है । वस्तुत: यह ब्रम्ह की व्यवस्था प्रकृति इतनी विलक्षण विज्ञान से संचालित है कि इसे सहज़ प्रयत्नों से लांघा नहीं जा सकता है । कल्याण इसी में है कि त्राहिमाम् अर्थात इसी को समर्पित हो जाइये कि मै आपका सेवक हूँ आप जैसे चाहें मेरी सेवा का प्रयोग करिये । यही है भक्ति का स्वरूप ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

शनिवार, 23 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
मनुष्य का जन्म इस संसार में हुआ है कर्म करने के लिये । यह सृष्टि कर्म प्रधान है । कर्म सृजित होता है प्रकृति और आत्मा की परस्पर क्रिया द्वारा । प्रकृति गुणयुक्त होती है । आत्मा प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है । आत्मा प्रकृति के गुणों में आसक्ति सृजित कर लेता है । इस आसक्ति के सृजन से आत्मा ब्रम्ह के कर्म संविधान के प्रति अचेत हो जाता है । परिणामत: त्रुटिपूर्ण कार्यों को प्रेरित करने लगता है । यह अवाँक्षित होता है । प्रकृति की मर्यादा न्यायपूर्ण होती है । अत: वह आत्मा के त्रुटिपूर्ण कर्मों के लिये उसे दण्डित करती है । दण्ड भोगते आत्मा पीडित होती है । तब वह सोचने को बाध्य होती है कि इस पीडा से उबरने का उपाय क्या है । उपाय मात्र एक होता है । जिन त्रुटिपूर्ण कर्मो के कारण उसे दण्डित किया गया है वह उनकी पुनरावृत्ति न करे । परंतु त्रुटिपूर्ण कर्मों का सृजनश्रोत अर्थात प्रकृति के गुणों में आसक्ति से उबरना आत्मा के लिये इतना आसान नहीं होता है । अनंत जन्मों से आत्मा प्रकृति के गुणों का भोग करते उसमें आसक्त होते आयी है । इसलिये प्रकृति के गुणों में आत्मा की आसक्ति उसका सहज़ स्वभाव बन गया होता है । फिर मुक्ति मिले कैसे ? भगवान के शरण में प्रश्र्य ही सरलतम पथ है ।
भगवान कृपालु हैं । वह अपने शरण में आये को अपनी कृपा की छाया अवश्य प्रदान करते हैं । उनकी कृपा हो जाने पर सब कुछ सुगम हो जाता है । वही सृजन कर्ता है । प्रकृति भी उन्ही की उत्पत्ति है । जब भगवान की कृपा हो जावेगी तो प्रकृति का कोप भी शांत हो जावेगा ।
भगवान स्वयँ बताते हैं कि भक्ति ही सभी सुखों का मूल है जड है । भक्ति ही सरलतम पथ है भगवान को पाने का उनकी कृपापात्र बनने का । भगवान की भक्ति मिलती है संत की कृपा से ।
भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलहिं जो संत होहिं अनुकूला ॥
भगति कि साधन कहहुँ बखानी । सुगम पंथ मोहि पावहिं प्राणी ॥  

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
ब्रम्ह का संविधान है समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । संसार के समस्त कर्मों के लिये मनुष्य शरीर में प्रदत्त आत्मा नित्य कर्ता है । आत्मा उपरोक्त कथित ब्रम्ह के संविधान के क्रियांवन में विचलित पायी जाती है । विचलन का मूल श्रोत होता है आत्मा की प्रकृतीय गुणों में आसक्ति ।  यह तो हुआ एक सत्य जो कि नित्य प्रतिदिन प्रत्येक मनुष्य के जीवन में घटित हो रहा है । परंतु मात्र दोष जान लेने से तो दोष से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है । अब उपरोक्त दोष के निवारण की चर्चा करते हैं । वैसे तो निवारण के लिये धर्मदर्शन में तीन पथ सुझाये गये हैं । परंतु मैं उन तीनों में से सरलतम पथ का विवरण सर्वप्रथम प्रस्तुत करते हैं ।
सर्वप्रथम सरलतम पथ है परमब्रम्ह जो कि सृजन करता है प्रकृति का, प्रकृति ही मूल कारण है जो आत्मा के विचलन का निमित्त बनती है, की भक्ति करना अर्थात उसी परमब्रम्ह से ही विनय करना कि हे प्रभू मेरी सहायता करिये मैं कार्यकाल में प्रकृतीय गुणों में आसक्ति सृजित कर आपके कार्य संविधान के उलंघन को प्रेरित हो जाता हूँ जबकि यथार्त में मै ऐसा करना चाहता नहीं । इसलिये प्रभु मेरे ऊपर कृपा करिये और मैं अपने कार्यकाल में आपके कार्य की वाँक्षना के अनुकूल सम्पादन प्रेरित कर सकूँ ऐसी मुझे शक्ति प्रदान कीजिये ।
अवतार पुरुष श्रीराम ने एक बार नारद मुनि द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देते हुये स्वयँ बताते हैं कि हे नारद मुनि जब कोई भक्त अपनी मानसिक शक्ति का भरोसा त्याग कर मुझसे सहायता की पुकार करता है तो मैं उसकी पूर्ण सुरक्षा को तत्पर हो जाता हूँ । मैं फिर उसकी उसी प्रकार रक्षा करता हूँ जिस प्रकार एक माँ अपने नवजात शिशु की रक्षा करती है । इसी वृतांत को कवि व्यक्त करता है
सुनि मुनि ताहि कहौं सहरोषा । भजहिं जे जब मोहिं तजि सकल भरोसा ॥
करहुँ सदा तिन्हकरि रखवारी । जिमि बालक राखहिं महतारी ॥
मेरे प्रौढ तनय सम ज्ञानी । बालकसुत सम दास अमानी ॥
जनहिं मोर बल निज़बल ताहीं । द्वौ कर काम क्रोध रिपु आहीं ॥
यहि बिचार पंडित मोहिं भजही । पायेहुँ ज्ञान भगति नहिं तजही ॥

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
ब्रम्ह का संविधान है समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । संसार के समस्त कर्मों के लिये मनुष्य शरीर में प्रदत्त आत्मा नित्य कर्ता है । आत्मा उपरोक्त कथित ब्रम्ह के संविधान के क्रियांवन में विचलित पायी जाती है । विचलन का मूल श्रोत होता है आत्मा की प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । आसक्ति से जन्म होता है इच्छाओं का । इच्छा पूर्ण न होने की दशा में उत्पन्न होता है क्रोध । यह और भी अधिक विध्वंसक होता है आत्मा के कार्य दायित्व के निर्वाह के विचार से । इच्छा पूर्ण हो जाने की दशा में उत्पन्न होता है लोभ । इच्छा पूर्ति के परिणाम स्वरूप उपलब्धि को संजोने की भावना । अधिक प्रकृतीय सम्पदा की उपलब्धियों की दशा में उत्पन्न होता है मद घमण्ड । ये सभी क्रमबद्ध एक के बाद एक उत्पन्न होते जाते हैं । एक स्थिति हो जाती है कि मनुष्य इन्हीं अवांक्षितों के समूह में इतना घिर जाता है कि उसे ब्रम्ह या ब्रम्ह के संविधान का कंचिद स्मरण भी नहीं रह जाता है । जबकि वाँक्षित यह होता है कि जिस प्रकृति ने हमें इतना सुंदर वैज्ञानिक शरीर प्रदान किया उसे प्रतिपल स्मरण रखे व उसके उदारता के लिये हम उसके कृतज्ञ रहें । जिस ब्रम्ह ने उदारता पूर्वक अपना ही अंश स्वरूप आत्मा प्रदान किया हम उस आत्मा को रोग ग्रसित ( इच्छा, क्रोध, मद, लोभ ) करके आचरण भ्रष्ट न बनावें । परंतु कंचिद यह विचार मात्र विचार ही है इनका आचरण प्राय: नगण्य है ।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कर धार ।
यह चार कर्म के शत्रु है । इन चारो या इनमें से किसी एक के विद्यमान रहते कभी भी कार्य का आचरण यथावाँक्षित नही रह सकता । मनुष्य का कर्म तभी वाँक्षित अर्थात ब्रम्ह के संविधान के अनुकूल सम्भव हो सकता है जब उपरोक्त चार शत्रुओं का प्रादुर्भाव न हो । इन शत्रुओं से तभी मुक्त हो सकते हैं जब हम दृढप्रतिज्ञ हो इनके निवारण के लिये । निवारण के लिये हम प्रयत्नशील तभी होगें जब हम मानसिक स्तर पर इन्हे निर्मूल करने की आवश्यकता महसूस करें ।
प्रकृति भी सहायक होगी हमारे सत्यनिष्ठ प्रयत्नों को सफल बनाने में जब हम स्वयं अपने उत्थान के लिये सत्यनिष्ठ हो जावेगे । God help those who help themselves  प्रकृति ब्रम्ह की अभिब्यक्ति है । हम सभी ब्रम्ह की संताने है । ब्रम्ह ने हमें अपने कार्य प्रयोजनों को करने के लिये बनाया है जन्म दिया है । यह हम सभी का पावन कर्तब्य है कि हम प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों को कर ब्रम्ह के सच्चे वंश का कर्तव्य निर्वाह करें ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

बुधवार, 20 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा


इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
समस्त सृष्टि का संचालन परम् ब्रम्ह इन्ही दो घटको नामत: आत्मा और प्रकृति के परस्पर क्रिया द्वारा चला रहे हैं । समस्त सृष्टि की प्रगति इन्ही दो घटको की परस्पर क्रिया द्वारा सतत प्रगति की ओर अग्रसर है । इन्ही दो की परस्पर क्रिया के आधार पर ही सभी जीव सुख और दु:ख का भोग करते, परस्पर प्रेम और द्वेष करते जीवन जी रहे हैं । कितना अद्भुद विज्ञान है ब्रम्ह का जिसकी ब्यापकता असीमित है, जिसकी मर्यादा अति नियंत्रित है, जिसका न्याय अति निष्पक्ष है, सर्वभौम है । समस्त उपरोक्त को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ऊपर लिखे एक सूत्र में सिद्धांत का विमोचन किया कि हे अर्जुन समस्त सृष्टि में जो कुछ भी कर्म हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है । क्या विलक्षण विज्ञान है ब्रम्ह का प्रकृति के रूप में कि मनुष्य शरीर में निहित आत्मा अपने अहंकारबोध के कारण उपरोक्त सत्य को हृदयस्थ नहीं करती कि समस्त कर्म करने वाली प्रकृति है ।
आत्मा सतत प्रकृति के मध्य कार्यरत, प्रकृति के गुणों का भोग करते, उन गुणों में आसक्ति जनित करते, उन्ही प्रकृतीय घटको को पाने की अभिलाषा संजोये, उन्ही को पाने के लिये उद्यत चलता आया है, चलता जा रहा है । प्रकृतीय घटक सदैव यथा स्थिति रहें है और रहेंगे बस मनुष्य जन्म लेता बाल्यावस्था से नवयुवक फिर वयस्क और अंत में वृद्धावस्था को पार करते मृत्यु पर्यंत यात्रा करता ही रहेगा । यह प्रकृतीय चक्र आत्मा को नये नये स्वरूप नयी नयी स्थितियों का भोग कराते कार्य में ब्यस्त बनाये रखेगी ।
कार्य करने के लिये जन्म हुआ है । कार्य अवश्य करिये । आहवाहन मात्र इस ध्येय से कि कार्य प्रकृतीय ब्यवस्था के संविधान को स्वीकार कर उसकी मर्यादा के अनुरूप करिये । ऐसा करने से ही शांति और ऐश्वर्य उपलब्ध हो सकेगा ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: |
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
अभिप्राय है समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । यह ब्रम्ह का संविधान है । ब्रम्ह ने जो सृष्टि की रचना की है उस रचना के लिये माध्यम ब्रम्ह ने प्रकृति को बनाया है । प्रकृति में सृजन क्षमता है परंतु संचालन क्षमता नहीं है । इस संचालन क्षमता की पूर्ति करने के लिये ब्रम्ह ने प्रकृति के मध्य में अपना अंश पिरोया है जिसे कि आत्मा के रूप में जाना जाता है । इसी आत्मा को साँख्य दर्शन में पुरूष कहा गया है । पुरुष ज्ञाता होता है प्रकृति अंश का परंतु गुणयुक्त प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है । यह ब्रम्ह की महिमा जिसे धर्मदर्शन में माया कहा जाता है का प्रभाव कि पुरुष प्रकृति का ज्ञाता होते हुये भी प्रकृति के गुणो का आसक्त हो जाता है । आसक्ति निमित्त बन जाती है कर्म सम्पादन को त्रुटि पूर्ण बनाने में क्योंकि नित्य संसार के प्रयोजनों के लिये पुरुष आत्मा ही नित्य कर्ता होती है । आसक्ति उसे ब्रम्ह के कर्मसंविधान के प्रति अचेत कर देती है । वह न्रम्ह के कर्म संविधान को विस्मृति कर अपनी रुचि का क्रियांवन प्रेरित करने को चेष्टारत हो जाता है ।
प्रकृतीय गुणों में आत्मा की आसक्ति का आगला कदम होता है उसे पाने की इच्छा । उसपर स्वामित्व की अभिलाषा । यह मूलत: अपनी आसक्ति को स्थायी रूप से भोग के उद्देष्य से जनित होती है । उदाहरण के लिये एक ब्यक्ति की आत्मा को एक बार किसी सुंदर कार में यात्रा का सुख अनुभव मिला तो यही सुख की अनुभूति वह स्थायी रूप से भोग की कामना कर कार के निज़ी स्वामी बनने को इच्छुक हो जावेगा । यह पाने की इच्छा उसके यात्रा के सुख अनुभूति का परिणाम होती है ।
किसी प्रकृतीय घटक को उपरोक्तानुसार पाने की इच्छा आत्मा में समा जाने पर उसका कर्म संचालन ब्रम्ह के कर्म संविधान के प्रति अचेत कर देता है कि कर्ता प्रकृति है वह अपनी इच्छा को प्रधानता देते हुये हठात इच्छा वाले कार्य को ही प्रेरित करने को उद्यत होता है । वह यह नही स्वीकार कर पाता कि कंचिद प्रकृति ने उसे एक बार उस कार की यात्रा का सुख प्रदान किया वह हठात उसी सुख का स्थायित्व सुलभ होने को चेष्टारत हो जाता है ।  

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

सोमवार, 18 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
प्रकृति परम् ब्रम्ह की ब्यवस्था का नाम है । अलौकिक ब्रम्ह ने अपने को लौकिक जगत के सज्ञान के लिये प्रकृति के रूप में प्रगट किया है । जहाँ तक मनुष्य की ज्ञान सीमा है वह सब प्रकृति है । समस्त स्वरूप भी प्रकृति है समस्त गतिविधि भी प्रकृति है । इसी बात को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा
      प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
मनुष्य का शरीर प्रकृति परंतु उसका अस्तित्व आत्मा यदि समस्त सृष्टि को इस रूप में देख सके कि जो कुछ भी कर्म सम्पादन हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है तो मानो वह कर्ता को साक्षात देख रहा होता है ।
उपरोक्त कथन पर्याय है अहंकार के शमन का । कोई मनुष्य कोई कार्य करके उसमें कर्तापन का जो बोध करता है उसे ही अहंकार कहा जाता है । परंतु यदि योगेश्वर का उपरोक्त कथन हृदयस्थ कर सके मनुष्य तो यह तुल्य होगा उसके अहंकार भाव के समापन के ।
परंतु युगो से विभिन्न शरीरों को संचालित करती आ रही आत्मा ज्ञान के आभाव में कर्तापन अर्थात अहंकार की सहज अभ्यासी होती है । परंतु जब ज्ञान के रूप में यह तथ्य ग्रहण किया जाय कि समस्त कर्म की कर्ता प्रकृति है दूसरे शब्दों में परम् ब्रम्ह की ब्यवस्था कर्म की कर्ता है तो निश्चय ही अहंकार को विदा लेना ही होगा । अहंकार दोषपूर्ण कर्म का प्रेरक होता है । त्याज्य होता है ।
प्रकृति और आत्मा दोनों ही अनादि काल से विद्यमान है । प्रकृति काल सीमा के अंतर्गत कार्यरत रहती है । आत्मा अजर है अमर है । इन दोनो का परस्पर ही सृष्टि का समस्त स्वरूप है । प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था का स्वरूप है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है । कर्म दोनो के परस्पर की उत्पत्ति है ।
आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के कारण अविनाशी है । इसी कारण एक शरीर जो कि प्रकृति निर्मित होता है की काल अवधि पूरा होने पर अविनाशी आत्मा ब्रम्ह की व्यवस्था द्वारा दूसरे शरीर में अंतरित की जाती है । परंतु एक शरीर में जो भी क्रिया सम्पादन आत्मा ने प्रेरित किया उसका सम्पूर्ण लेखा रहता है जिसके आधार पर उसे अगली शरीर आवंटित होती है । त्रुटिपूर्ण कर्मों का पोषण पाप के रूप में और सही कर्मो का पोषण पुण्य के रूप में लेखा में अंकित रहते है । उनका फल भोग अगली शरीर में आत्मा को भोगना होता है । पाप करने से पाप की वृद्धि होती है पुण्य करने से पुण्य की वृद्धि होती है । प्रकृति की कार्यशैली न्यायपूर्ण होती है । ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कर्म पुण्य की श्रेणी में और कर्म संविधान के विरुद्ध कर्म सम्पादन पाप की श्रेणी में लेखाबद्ध किये जाते हैं ।

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

रविवार, 17 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
मनुष्य शरीर के दो घटक आत्मा और प्रकृति । इन दोनो की परस्पर क्रिया से जनित होता है कर्म । विगत उदाहरण में यह विदित हुआ कि प्रकृति के गुणों से आत्मा किस प्रकार प्रभावित होकर त्रुटिपूर्ण कर्म प्रेरित करने लगती है । मात्र दोष जानने से अध्याय पूर्ण नहीं होता । दोष का निवारण भी जानना अनिवार्य होता है । निवारण से भी पहले कर्म सिद्धांत जानना आवश्यक है ।
श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णन है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं
      प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
कर्ता प्रकृति है । यह संविधान बताया । ब्रम्ह की रचना है प्रकृति । प्रकृति की रचना का निमित्त है कर्म । यह ब्रम्ह की ब्यवस्था है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है। सृष्टि में कार्य सम्पादन के निमित्त आत्मा नित्य कर्ता है । कार्य का संविधान बताया कि कर्ता प्रकृति है । यह एक ब्यूह का स्वरूप बन जाता है । इस ब्यूह की क्लिष्टता और बढ जाती है आत्मा की प्रकृतीय गुणों में आसक्ति से । आसक्त आत्मा अपनी आसक्ति की पूर्ति के कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत होने लगता है । कार्य सिद्धांत का उलंघन का सूत्रपात होता है ।
अपेक्षित होता है कि आत्मा मात्र उन कर्मों को प्रेरित करे जो कार्य ब्रम्ह के संविधान के अनुरूप हो अर्थात कार्य की कर्ता प्रकृति द्वारा प्रेरित हों, परंतु आत्मा अपनी आसक्ति के कर्मों को प्रेरित करने में रुचि रखता है, इसलिये वह कार्य के संविधान की उपेक्षा करता है । यह नित्य प्रतिदिन के जीवन में प्रत्येक मनुष्य के साथ घटित हो रहा है । कोई भी अपने नित्य प्रतिदिन के कर्मों को विश्लेषण करके देख ले । हर व्यक्ति वही कर रहा है जो उसकी इच्छा है । प्रकृति के प्रेरित कार्य की किसको परवाह है ।
उपरोक्त त्रुटिपूर्ण कर्म सम्पादन का विश्लेषण किया जाय तो इसमें दो अंग मिलते हैं (1) ब्रम्ह के कर्म सिद्धांत का ज्ञान न होना (2) ब्रम्ह के कर्म सिद्धांत का ज्ञान हो जाने पर भी उत्पन्न होनेवाला विचलन कर्म करने की पद्धति का ज्ञान न होना ।
मनुष्य अनादि काल से जन्म लेते, कर्म करते, और मृत्यु को प्राप्त होते चला आया है और चलता ही जा रहा है । दोषपूर्ण कर्मों के सम्पादन के फलस्वरूप प्रकृति द्वारा आरोपित दण्डों को भोगते त्रास उठाते चलता आया है और चलता ही जा रहा है मानो किसी सुधार की जैसे आवश्यकता ही नहीं है ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

शनिवार, 16 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
क्रमश: --  -- 
नारद मुनि ने क्रोधवश श्रीहरि को श्राप दिया । श्रीहरि ने उदारता पूर्वक नारद का श्राप सिरोधार्य किया । श्रीहरि ने जिस माया का विस्तार किया था, जिसमें फंस नारद पहले राजकुमारी के मोह में आसक्त हुये फिर उसे पाने की इच्छा संजोये पाने का प्रयत्न किये और उसे न पाने पर क्रोधवश श्रीहरि को श्राप दिये और दुर्वचन कहे, को वापस खीचलिया । माया हट जाने पर नारद मुनि ने देखाकि वहाँ न राजकुमारी है न ही नारद के मन में पहले जैसे उन्माद ही रह गये । बदली हुई स्थिति का अनुभव कर नारद अति भयभीत हुये । श्रीहरि का माया विस्तार का उद्देष्य पूरा हो चुका था । वह नारद के अभिमान को नष्ट करना चाहते थे जिसके तहत नारद कहते घूम रहे थे कि उन्होने माया पर विजय प्राप्त कर लिया है । नारद को भयभीत देख श्रीहरि ने उन्हे सांत्वना करायी और परामर्श दिया कि भगवान शंकर की कृपापात्र बने जिससे उन्हे मन की शांती मिलेगी ।
प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया से कर्म सृजित होता है । प्रकृति गुणयुक्त होती है । पुरुष प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है । इन कारणों से पुरुष प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर लेता है। आसक्त आत्मा प्रवृत्ति करती है दोषपूर्ण कर्म।
प्रकृति अति विस्तृत अतिशक्तिशाली अद्भुद विज्ञान से युक्त गुणों की धारक है इसलिये वह आत्मा को भली भाँति अपने नियंत्रण में करने में सक्षम होती है । यदि मनुष्य के अस्तित्व को प्रगट करने वाले घटक के रूप में आत्मा को माना जाय तो प्रकृति को उसका नियंत्रक कहा जा सकता है । आत्मा और प्रकृति इन्ही दोनो का सही स्वरूप का ज्ञान व कर्म सृजन में इन दोनो की सही ढंग से परस्पर क्रिया का उचित नियंत्रित संचालन ही मनुष्य की जीवन यात्रा है । जो जितने ही सज्ञान पूर्वक नियंत्रित संचालन को अंजाम दे सकता है वह उतना ही उत्कृष्ट जीवन का भोगी हो सकता है । मनुष्य जीवन में व्याप्त सकल उद्वेग, अशांति, तनाव आत्मा और प्रकृति के अनियंत्रित व विधि के विधान के विपरीत संचालन का परिणाम होती हैं । इसलिये सज्ञांनपूर्वक विधि के संविधान के अनुकूल आचरण द्वारा शांत तनाव रहित जीवन यापन सुलभ हो सकता है । विधि के संविधान की चर्चा अगले अंक से सतत ।  

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
क्रमश: --  -- 
नारद मुनि अति आतुर हुये उस राजकुमारी को पत्नी रूप में पाने के लिये । अपने मनोरथ को पूरा करने के लिये श्रीहरि से वरदान भी माँगा । इसके बाद भी उसे पा नहीं सके । पराजित महसूस करने लगे । पराजय का भाव मन में आते ही क्रोध सृजित हुआ । स्वाभाविक रूप से क्रोध श्रीहरि को लक्षित था । क्यों उन्होने हमारी सहायता नहीं किया । चल पडे श्रीहरि से निपटने । मार्ग में ही श्रीहरि मिल गये । श्रीहरि उसी राजकुमारी को अपनी पत्नी सदृष्य साथ लिये आ रहे थे । मिलते ही श्रीहरि ने मृदु बचन में पूँछा कि मुनिबर क्यों ब्यग्र दीख रहें हैं ? मुनिबर का क्रोध ऊबल पडा । जो कुछ भी मनमें आया बोलते चले गये मुनि महोदय । उनको कंचिद किसी मर्यादा का बोध नहीं रह गया था ।
प्रकृति की लीला का स्वरूप प्रत्यक्ष है । नारद मुनि ने पहले अमर्यादित बर माँगा । यद्यपि की श्रीहरि ने उन्हे बर यही दिया था कि जिस प्रकार आपका हित होगा मैं वही करूँगा । परंतु इस कहे का अर्थ मुनिजी ने यह लगाया कि श्रीहरि हमारा मनोरथ पूर्ण करेगे । राजकुमारी को पत्नी रूप में नहीं पा सके । परिणामत: और भयंकर अशिष्ट आचरण को अग्रसर हुये । श्रीहरि को दुर्बचन भी कहे ।
यह प्रकृति की असीमित शक्ति और अद्भुद कार्यशैली का परिचायक है ।  
फरकत अधर कोप मन माहीं । सपद चले कमलापति पाहीं ॥
देहउँ श्राप की मरिहऊँ जाई । जगत मोर उपहास कराई ॥
बीचहि पंथ मिले दनुजारी । संग रमा सोई राजकुमारी ॥
बोले मधुर बचन सुरसाई । मुनि कहँ चले बिकल की नाई ॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥
पर सम्पदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरे इर्ष्या कपट विषेसी ॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायेहु । सुरन्ह प्रेरि विष पान करायेहु ॥
असुर सुरा विष शंकरहि आपु रमा मनि चारु ।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहार ॥
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावहि मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू । विस्मय हरष न हियँ कछु धरहू ॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥
करम शुभाशुभ तुम्हहि न बाधा । अब लग तुम्हहि न काहू साधा ॥
भले भवन अब बायन दीन्हा । पाहवुगे अब आपन कीन्हा ॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा । सोई तन धरहु श्राप मम एहा ॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्ह हमारी । करिहहि कीस सहाय तुम्हारी ॥
मम अपकार कीन्ह तुम भारी । नारि बिरह तुम होब दुखारी ॥
शेष अगले अंक में --  --

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
क्रमश: --  --
नारद मुनि राजकुमारि के मोह में आसक्त तथा उसे पत्नी रूप में पाने की अभिलाषा मन में संजोये उसके स्वयम्बर में जाकर बिराजे । उन्होने श्रीहरि से सुंदर रूप का वरदान भी माँगा था । श्रीहरि ने उन्हे उनके हित रक्षा का वरदान दिया भी था । श्रीहरि ने उनकी हितरक्षा के लिये उन्हे अति कुरूप स्वरूप प्रदानकिया जिसे कि नारद मुनि जानते नहीं थे । परंतु प्रकृति की महिमा कि उनका वह कुरूप स्वरूप अन्य कोई भी नहीं देख सका इसलिये सभी उन्हे श्रेष्ठ मुनि जान प्रणाम किये, केवल नृपकन्या ही उनका कुरूप स्वरूप देख सकी और देखकर अति असंतुष्ट हुई । इस असंतोष के परिणाम स्वरूप वह जयमाल की सभा में नारद की ओर भूल से भी नही देखी । उस जयमाल सभा में श्रीहरि भी एक राजा के रूप में बिराजे थे । नृपकन्या ने सहर्ष उन्हे जयमाल पहना दिया । इसप्रकार श्रीहरि नृपकन्या को ले गये और सभी राजा निरास होकर विदा हुये ।
जब आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती है तो वह किस प्रकार उन्हे पाने के लिये सारी लोक मर्यादाओं को भुला किस प्रकार आतुर हो जाती है, इसे नारद मुनि के चरित्र में वर्तमान संदर्भ में देखा जा सकता है ।
निज़ निज़ आसन बैठे राजा । बहु बनाव कर सहित समाजा ॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरे । मोहि तजि आनहिं बरिहि न भोरे ॥
मुनि हित कारण कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाई बखाना ॥
सो चरित्र लखि काहू न पावा । नारद जानि सबहि सिरु नावा ॥
काहू न लखा सो चरित बिषेसा । सो सरूप नृपकन्या देखा ॥
मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदय क्रोध भा तेही ॥
जेहि दिसि बैठे नारद फूली । सो दिसि तेहि न बिलोकी भूली ॥
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला । कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला ॥
दुलहिन ले गये लक्षिनिवासा । नृपसमाज सब भयउ निरासा ॥
शेष अगले अंक में --  --

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण