इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: -- --
नारद मुनि राजकुमारि के मोह में आसक्त तथा उसे पत्नी रूप
में पाने की अभिलाषा मन में संजोये उसके स्वयम्बर में जाकर बिराजे । उन्होने
श्रीहरि से सुंदर रूप का वरदान भी माँगा था । श्रीहरि ने उन्हे उनके हित रक्षा का
वरदान दिया भी था । श्रीहरि ने उनकी हितरक्षा के लिये उन्हे अति कुरूप स्वरूप प्रदानकिया
जिसे कि नारद मुनि जानते नहीं थे । परंतु प्रकृति की महिमा कि उनका वह कुरूप
स्वरूप अन्य कोई भी नहीं देख सका इसलिये सभी उन्हे श्रेष्ठ मुनि जान प्रणाम किये, केवल नृपकन्या ही उनका कुरूप स्वरूप देख सकी और देखकर अति असंतुष्ट हुई । इस
असंतोष के परिणाम स्वरूप वह जयमाल की सभा में नारद की ओर भूल से भी नही देखी । उस
जयमाल सभा में श्रीहरि भी एक राजा के रूप में बिराजे थे । नृपकन्या ने सहर्ष उन्हे
जयमाल पहना दिया । इसप्रकार श्रीहरि नृपकन्या को ले गये और सभी राजा निरास होकर
विदा हुये ।
जब आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती है तो वह किस
प्रकार उन्हे पाने के लिये सारी लोक मर्यादाओं को भुला किस प्रकार आतुर हो जाती है, इसे नारद मुनि के चरित्र में वर्तमान संदर्भ में देखा जा सकता है ।
निज़ निज़ आसन बैठे राजा । बहु बनाव कर सहित समाजा ॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरे । मोहि तजि आनहिं बरिहि न भोरे ॥
मुनि हित कारण कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाई बखाना ॥
सो चरित्र लखि काहू न पावा । नारद जानि सबहि सिरु नावा ॥
काहू न लखा सो चरित बिषेसा । सो सरूप नृपकन्या देखा ॥
मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदय क्रोध भा तेही ॥
जेहि दिसि बैठे नारद फूली । सो दिसि तेहि न बिलोकी भूली ॥
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला । कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला ॥
दुलहिन ले गये लक्षिनिवासा । नृपसमाज सब भयउ निरासा ॥
शेष अगले अंक में --
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प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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