इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
मनुष्य का जन्म इस संसार में हुआ है कर्म करने के लिये । यह
सृष्टि कर्म प्रधान है । कर्म सृजित होता है प्रकृति और आत्मा की परस्पर क्रिया द्वारा
। प्रकृति गुणयुक्त होती है । आत्मा प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है । आत्मा प्रकृति
के गुणों में आसक्ति सृजित कर लेता है । इस आसक्ति के सृजन से आत्मा ब्रम्ह के कर्म
संविधान के प्रति अचेत हो जाता है । परिणामत: त्रुटिपूर्ण कार्यों को प्रेरित करने
लगता है । यह अवाँक्षित होता है । प्रकृति की मर्यादा न्यायपूर्ण होती है । अत: वह
आत्मा के त्रुटिपूर्ण कर्मों के लिये उसे दण्डित करती है । दण्ड भोगते आत्मा पीडित
होती है । तब वह सोचने को बाध्य होती है कि इस पीडा से उबरने का उपाय क्या है । उपाय
मात्र एक होता है । जिन त्रुटिपूर्ण कर्मो के कारण उसे दण्डित किया गया है वह उनकी
पुनरावृत्ति न करे । परंतु त्रुटिपूर्ण कर्मों का सृजनश्रोत अर्थात प्रकृति के गुणों
में आसक्ति से उबरना आत्मा के लिये इतना आसान नहीं होता है । अनंत जन्मों से आत्मा
प्रकृति के गुणों का भोग करते उसमें आसक्त होते आयी है । इसलिये प्रकृति के गुणों में
आत्मा की आसक्ति उसका सहज़ स्वभाव बन गया होता है । फिर मुक्ति मिले कैसे ? भगवान के शरण में प्रश्र्य ही सरलतम पथ है ।
भगवान कृपालु हैं । वह अपने शरण में आये को अपनी कृपा की छाया
अवश्य प्रदान करते हैं । उनकी कृपा हो जाने पर सब कुछ सुगम हो जाता है । वही सृजन कर्ता
है । प्रकृति भी उन्ही की उत्पत्ति है । जब भगवान की कृपा हो जावेगी तो प्रकृति का
कोप भी शांत हो जावेगा ।
भगवान स्वयँ बताते हैं कि भक्ति ही सभी सुखों का मूल है जड है
। भक्ति ही सरलतम पथ है भगवान को पाने का उनकी कृपापात्र बनने का । भगवान की भक्ति
मिलती है संत की कृपा से ।
भगति तात अनुपम सुखमूला
। मिलहिं जो संत होहिं अनुकूला ॥
भगति कि साधन कहहुँ
बखानी । सुगम पंथ मोहि पावहिं प्राणी ॥
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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