मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

श्रीमद भागवद गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण भक्त अर्जुन को धर्म दर्शन का ज्ञान बताते हुये सर्वाधिक महत्व कर्म सम्पादन को देते है । मनुष्य का कर्म सम्पादन यदि कर्म संविधान के प्राविधानो के अनुकूल है तो निश्चय ही उत्कृष्ट स्थितियाँ उसे मिलनी ही मिलनी है । इसके विपरीत यदि मनुष्य का कर्म सम्पादन कर्म संविधान के प्राविधानों के प्रतिकूल है तो उसे पतन की  पराकाष्ठाओं को प्राप्त होना है । यह प्रकृति का न्याय है । यह प्रत्येक मनुष्य पर बिना किसी भेद भाव के प्रभावी होता है । कर्म सम्पादन की गुणवत्ता मनुष्य को प्राप्त मस्तिष्क की यथास्थिति तथा संचालन व नियंत्रण दक्षता पर निर्भर करता है । योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते है कि जो मनुष्य अपने मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले मोह को नियंत्रित कर अपने कर्तव्य दायित्व संचालन का निर्वाह कर सकेगा वह जीवन में समस्त उत्कृष्ट स्थितियों को प्राप्त करेगा ।
मस्तिष्क की संरचना व उसके कार्य पद्धति का विज्ञान प्रकृति निर्मित होता है । चूँकी ब्रम्ह ने कार्य का दायित्व प्रकृति को सौंपा है और मनुष्य जो की प्रकृतीय घटको द्वारा निर्मित रचना है के अंदर अपना अंश आत्मा प्रदान किया है प्रकृति को सहायता प्रदान करने के उद्देष्य से इसलिये प्रकृति को मनुष्य से अपने कार्य कराने हैं । यह लक्ष्य हासिल करने के लिये प्रकृति मनुष्य के मस्तिष्क का सहारा लेती है । मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृति प्रत्येक कार्य के प्रति अनेकानेक विकल्प प्रस्तुत करती रहती है । मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप विकल्प का चयन कर कार्य करने का अभ्यासी बन कर्म संविधान का उलंघन करता है । यदि उत्कृष्ट स्थितियाँ हासिल करनी हैं तो निष्चय ही उपरोक्त स्थिति को समझ अपने कार्य प्रणाली को सुधारना होगा । इच्छा जनित कार्यों को नियंत्रित करना होगा ।
समस्त उपलब्धि निर्भर करती है मनुष्य के मस्तिष्क की कार्य दक्षता पर । मस्तिष्क की संचालन दक्षता पर । मस्तिष्क के नियंत्रण दक्षता पर । कर्म पथ से कर्म दोष के निवारण की विधा में समस्त निर्देश मस्तिष्क को पुष्ट स्वस्थ्य संचालन हेतु दक्ष बनाने के लक्ष्य से प्रतिपादित की गई है । इस उपलब्धि को हासिल करने के लिये कतिपय आचरण संयम भी कहे गये है जो कि उपलब्धि में सहायक के रूप में योगदान करने वाले है ।

शरीर एक यंत्र के समान है । इस यंत्र का सकल संचालन नियंत्रण केंद्र मस्तिष्क है । स्वाभाविक रूप से यंत्र द्वारा सम्पन्न सकल कार्य की गुणवत्ता नियंत्रण केंद्र मस्तिष्क की संचालन गुणवत्ता के अनुरूप होगी । इसलिये समस्त महत्व का केंद्र मस्तिष्क है । इसी को कुशल दक्ष बनाना प्रत्येक शिक्षा प्रणाली का लक्ष्य होता है । धर्म दर्शन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सरल आचरण उपाय सुझाता है जिसे प्रत्येक शिक्षित तथा अशिक्षित व्यक्ति अपना कर लाभ पा सकता है । 

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

कर्म पथ से कर्म दोष का निवारण वास्तविकता में आत्म शोध द्वारा कर्म नियंत्रण का पथ है । इसमें साधक को अपने स्वयं को पूर्ण सयंम में संतुलित रखते हुये जीवन यापन अर्थात अपने समस्त कार्य दायित्व निर्वाह करने का पथ है । त्रुटि कोई भी हो निवारण सदैव त्रुटि के कारण को निर्मूल करने से ही होता है । कर्म सृजन होता है प्रकृति और आत्मा की परस्पर क्रिया से । प्रकृति और आत्मा किस प्रकार किस परिस्थिति में किस निमित्त से एक दोसरे से वर्ताव करते है वही गुणवत्ता कर्म में प्रतिबिम्बित होती है । प्रकृति के गुणों के मोह से आत्मा किस स्तर तक ग्रसित है अथवा उससे अपने को विरक्त रखती है इसी का प्रगट स्वरूप होता है कर्म की गुणवत्ता । उत्तम परिणाम मात्र इच्छा से तो प्रगट नहीं होंगे । संयमित एवं नियंत्रित कार्य शैली अर्थात प्रकृति और आत्मा की संयमित और नियंत्रित परस्पर क्रिया का संचालन करने से सम्भव होगा । यही अभ्यास बन जाने की दशा में सत्य उपलब्धि होगी । यही कर्म मार्ग का लक्ष्य होता है । इसे पाने के लिये ही अपनी प्रकृतीय शरीर को भली भाँति जानना आवश्यक है । मात्र जानना ही नही अपितु उसे नियंत्रित उपयोग करने की विधा भी जानना अनिवार्य है । मनुष्य के मस्तिष्क की रचना व कार्य शैली की चर्चा को गत अंक के क्रम को सतत रखते हुये
मस्तिष्क का तीसरा भाग । इस भाग में समस्त निर्णय लिये जाते है । कर्म के चुनाव का निर्णय कर्म सम्पादन विधा का निर्णय कर्म प्रेरणा का निमित्त चुनाव का निर्णय । इन्ही निर्णयों से उन्न्ति और पतन प्रशस्थ होते है । निर्णय के प्रभाव से कर्म दोष भी पैदा होता है । निर्णय के प्रभाव से ही दोष निवारण भी होता है । कर्म सम्पादन तभी प्रवित्त होता है जब मस्तिष्क कर्म करने का निर्णय लेता है । मस्तिष्क कर्म करने का निर्णय तभी लेता है जब निमित्त सम्मुख होता है । इस प्रकार उपरोक्त सभी परस्पर सम्बंधित होते हैं । कर्म की गुणवत्ता उपरोक्त सभी से प्रभावित होती है । संयम वर्तना होगा निमित्त के निर्धारण में । संयम रखना होगा आत्मा के प्रकृतीय गुणों के मोंह से । नियंत्रण रखना होगा प्रकृति और आत्मा के परस्पर पर । कर्म गुणवत्ता निखर जावेगी । अन्यथा स्थिति कर्म दोष । कर्म का निमित्त जब तक इच्छा पर लम्बित होगा कर्म दोष निवारण असम्भव । निमित्त शोधित कर जब इच्छा से प्रकृति के आदेश में पर्णित हो जावेगी तो कर्म दोष लुप्त हो जावेगा । यह उपलब्धि मस्तिष्क के इसी तीसरे भाग के सही नियंत्रित उपयोग द्वारा सम्भव होगी ।
प्रकृति ने मस्तिष्क की रचना में अद्भुद विज्ञान को पिरोया है कि प्रतिपल यह यंत्र अनेको परस्पर विरोधी विकल्प प्रस्तुत करता रहता है । चाहे निमित्त निर्धारण का अवसर है अथवा कर्म सम्पादन सम्पन्न करने का निर्णय है अनेको विकल्प मस्तिष्क सम्मुख करता ही रहेगा । यही वह स्थल है जहाँ इच्छायें गुप्त रहते हुये निर्णय को प्रभावित करती है । कार्य का निमित्त इच्छाओं से प्रदूषित होने की दशा में कर्म दोष अपरिहार्य होगा ।

मस्तिष्क के इसी तीसरे भाग के निर्णय को सदैव विवेक द्वारा परिक्षित कर उपयोग करने से ही कर्म दोष सुधार सम्भव होगा । निर्णय सामान्य तौर पर स्मृति के उदाहरणों द्वारा लिये जाते है । आदर्श निर्णय होगा प्रकृति के आदेशानुसार लिया गया निर्णय । इच्छाओं के रहते प्रकृति के आदेश जानना कठिन होता है । इस मस्तिष्क का संचालन तथा नियंत्रण के लिये कोई दूसरा अंग नहीं है । इसलिये मस्तिष्क का नियंत्रण मस्तिष्क ही करेगा साथ ही शेस दस इंद्रियों को भी नियंत्रित करेगा । स्वयँ अपना नियंत्रण । शरीर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सक्षम अंग है मस्तिष्क । इसी का कुशल संचालन कार्य की गुणवत्ता है । 

रविवार, 29 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

शरीर की रचना प्रकृति और पुरुष के सन्योग से हुई । पुरुष ब्रम्ह का अंश और प्रकृति ब्रम्ह की रचना । पुरुष विषय और प्रकृति वस्तु स्वरूप । कर्म संविधान के प्राविधान के अनुसार कर्मों की कर्ता प्रकृति । स्वाभाविक रूप से पुरुष आत्मा प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करता । परिणामत: कर्म दोष उत्पन होते हैं । इनके निवारण के लिये सरल उपाय बताया गया भक्ति । पुरुष आत्मा वस्तु प्रकृति के प्रति समर्पित भाव । दूसरे सुधार मार्ग के रूप में कर्म पथ सुझाया गया । कर्म द्वारा कर्म का सुधार । इस कर्म पथ के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान शरीर का पाते हुये शरीर के विभिन्न अंगों जिनके द्वारा कर्म सम्पादन सम्भव होता है की चर्चा को सतत रखते हुये
मस्तिष्क का दूसरा भाग होता है संचय अनुभाग । संचित स्मृतियाँ । समस्त पाँच ज्ञानेंद्रियों द्वारा लायी गयी सूचनाओं का संग्रह । जन्म से मृत्यु पर्यन्त तक के संग्रह । सम्पादित कर्मों का संग्रह । समस्त कर्म फलों का संग्रह । पूर्ण भण्डारण होता है । यह हर व्यक्ति की निधि होती है । इसकी गुणवत्ता होती है (1) क्रमबद्धता (2) समय पर स्मरण । जिस व्यक्ति का संचय जितना सुनियोजित होता है उतना ही उपयोगी होता है । प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव से जीवन जीता है । उसका संचित भण्डार ही उसका अनुभव होता है । संचित भण्डार विगत स्मृतियों का । सुखद और दु:खद कर्म फलों का । कर्म त्रुटियों का । सुधारात्मक प्रयत्नों का । विगत सम्बंधों का । विगत अध्ययनों से एकत्रित विषयों का । यह समस्त स्मृतियाँ जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में जितने ही क्रमबद्ध ढंग से सुव्यवस्थित भण्डारित होती है उसकी क्रिया शीलता उतनी ही प्रखर होती है । उसके कर्म पुष्ट होते हैं । वह दक्ष होते हैं । सुव्यवस्थित भण्डारण से कर्म सम्पादन काल में आवश्यकता पडने पर त्वरित गति से सूचनायें मिलती है जिससे उनका प्रयोग सुलभ होता है ।
मस्तिष्क का कर्म सम्पादन में सबसे बडा योगदान होता है । बाह्य जगत से सूचनाये पाँचो ज्ञानेंद्रियाँ लगातार लाती रहती है । सूचनाओं का रूपांतर और विश्लेषण मस्तिष्क के प्रथम भाग में लगातार किया जाता है । इस विश्लेषण और रूपांतर के तुरंत बाद भण्डारण भाग खोजता है सूचना के अनुरूप पुरानी स्मृति विगत अनुभव । पुराना अनुभव मिलने पर आगे का कार्य सरल हो जाता है । पुरानी सूचना या अनुभव भण्डार में न मिलने की दशा में आगे का कार्य कढिन हो जाता है । सूचना स्मृति भण्डार में न मिलने के दो कारण होना सम्भव होते हैं । प्रथम की भण्डार में कोई सूचना है ही नहीं । दूसरा कारण होता है कि भण्डार में सूचनायें सुव्यवस्थित रखी नहीं गई हैं । इसलिये समय पर मिलती नहीं है । समय बीतने पर मिलती हैं । पश्च्याताप होता है कि समय पर याद आया होता तो भूल न होती । यह सभी के साथ घटित होने वाला अनुभव होता है ।
यह भण्डारण संचय सुव्यवस्थित उत्तम बनाने से बनता है । कतिपय व्यक्तियों को नैसर्गिक क्षमता के रूप में भी मिलता है । परंतु कर्मसुधार के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति को इसे उत्त्म बनाने के लिये विषेस उद्यम कर बनाना ही चाहिये । उसके उत्तम होने से कर्म करने की गति भी बढती है कर्म करने की क्षमता भी बढती है कर्म सुधार के प्रति आत्मविश्वास बढता है । संचय जितना ही ढंग से indexed  होगा उतना ही समय पर उपलब्ध होगा । सजग जीवन । सूचनाओं की प्राप्ति के समय ही जो व्यक्ति उस सूचना के महत्वानुसार उसे स्मृति भण्डार में किसी अविस्मरणीय स्मृति के साथ सम्बद्ध कर संचित करेगा उसे सदैव समय पर सूचना भण्डार से मिलेगी । समय महत्वपूर्ण होता है । समय पर किया गया कार्य ही फलदायी होता है । समय बीत जाने पर वही कार्य दुर्गम हो जाता है । कर्म त्रुटि सुधारने को सचेष्ट व्यक्ति के लिये यह अत्यंत महत्व का है । समस्त कर्म सम्पादन की गुणवत्ता का मूल होता है । यह तो अपने अनुभव का लाभ लेते उत्थान की यात्रा करने की बात है । उत्तम से भी आगे उत्कृष्ट व्यक्ति तो दूसरों के भी अनुभव का लाभ लेते हुये उन्हे अंगीकार कर अपनी उन्नति यात्रा आगे बढाते हैं । ये दूसरों के अनुभव पढने से सुनने से देखने से मिलते हैं । विलोम भी सत्य है । मूर्ख कहे जाने वाले व्यक्ति अपने ही अनुभव का लाभ लेने के विपरीत एक ही त्रुटि बार बार करते है । अवनती की ओर अग्रसर होते हैं ।

कतिपय अवसरों पर स्मृतियाँ बाधा के रूप में भी सम्मुख होती हैं । कर्म सुधार के पथिक के सम्मुख भोग विलास की स्मृतियाँ । कर्म सुधार का पथ एक तपस्या है । मस्तिष्क को कु-प्रवित्तियों से हटा उत्तम की ओर प्रवर्त करना । इन प्रयत्नों के प्रारम्भिक अवस्था में विगत की भोग विलास की स्मृतियाँ बाधा बनती है । सतर्कता अनिवार्य है ।    

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

गत अंक से क्रमश: -
कर्म त्रुटि को सुधारने के लक्ष्य से कर्म पथ अंगीकार करने की दशा में मनुष्य की शरीर के विभिन्न अवयवों जिनका कि कर्म सम्पादन में प्रयोग होता है को जानना परम आवश्यक वाँक्षना है । मात्र उनका परिचय जनना ही पर्याप्त नहीं होगा अपितु उन प्रत्येक अंग की कार्य पद्धति तथा उन अंगों की त्रुटि प्रवित्त में सम्भावित योगदान को जानना भी परम आवश्यक है । गत अंक में दसो इंद्रियों के सम्बंध में विवेचना उद्घृत की गई थी । इंद्रियों का सकल नियंत्रण मस्तिष्क द्वारा संचालित होते हैं । इसलिये अब विवरण मस्तिष्क की रचना, कार्य विधा, कर्म त्रुटि में योगदान के सम्बंध में । मस्तिष्क प्रकृति की अति विलक्षण विज्ञानमय अद्भुद रचना है । इसकी जितनी सराहना की जाय पर अल्प ही होगी । प्रकृति की असीम क्षमता की ज्ञोतक यह प्रकृतीय रचना अद्भुद कार्य क्षमता दक्षता से युक्त है । परंतु इसे अति नियंत्रित और कुशलता पूर्वक संचालित करना भी अति महत्वपूर्ण वाँक्षना है । अन्यथा सृजन को लक्ष्य कर विध्वंस घटित होते हैं ।
सर्व-प्रथम मस्तिष्क की रचना की चर्चा उचित क्रम होगा । यहाँ यह उल्लेख महत्वपूर्ण होगा कि शरीर विज्ञान के ज्ञाता इसका विश्लेषण व अध्ययन जिस लक्ष्य से करते हैं वह भिन्न है । यहाँ जो विश्लेषण प्रस्तुत किया जावेगा वह धर्म दर्शन के आलोक में होगा । उपरोक्त दोनों भिन्न विधाओं की तुलनात्मक उपलब्धि की समीक्षा विषयांतर तुल्य होगा । इसलिये इतना उल्लेख मात्र ही पर्याप्त है ।
मस्तिष्क को यदि इसके कार्य सम्पादन को लक्ष्य कर देखा जाय तो इसे तीन स्पष्ट खण्डों में पाया जाता हैं । प्रत्येक खण्ड की चर्चा क्रम से । पहला खण्ड जहाँ प्रत्येक ज्ञान इंद्रियों द्वारा वाह्य जगत से लायी गई सूचना पहुँचती है । कोई विशिष्ट नाम आवंटित करना आवश्यक नहीं है । इस खण्ड में वाह्य जगत से लाई गई प्रत्येक सूचना का विश्लेषण किया जाता है । सूचना को विश्लेषण उपरांत एक निश्चित उभयनिष्ट भाषा में रूपांतित किया जाता है । तदोपरांत मस्तिष्क के दूसरे खण्ड को प्रेषित की जाती है । तीसरा कार्य भी इस खण्ड में सम्पादित होता है । मस्तिष्क के तीसरे खण्ड से प्राप्त होने वाली सूचनाओं को पुन: विश्लेषण कर इंद्रियों को प्रेषण हेतु इंद्री विषेस की भाषा में पर्णित करता है । यहाँ विषेस उल्लेखनीय है कि उपरोक्त वाक्य मे प्रयुक्त भाषा शब्द का अर्थ बोली जाने वाली भाषा से भिन्न है । जो भी सूचना कोई इंद्री काह्य जगत से लाती है वह प्रत्येक भिन्न वर्ग की सूचना होती है । यथा आँख की सूचना दृष्य से सम्बंधित होगी । उसे वह प्रकाश की कार्य शैली के अनुरूप भाषा में प्रेषित करेगी । कान की सूचना ध्वनि की कार्य शैली के अनुरूप भाषा में प्रेषित होगी । जिह्वा की सूचना स्वाद की कार्य विधा के अनुरूप भाषा में होगी । नाक की सूचना गंध की कार्यशैली के अनुरूप भाषा में होगी । स्पर्ष की सूचना त्वचा तापमान की कार्यविधा के अनुरूप भाषा में होगी । यदि उपरोक्त सभी विधाओं की भाषा भिन्न नहीं होगी तो ज्ञान बोध भिन्न कैसे होगा । सुंदर या असुंदर दृष्य । संदर या असुंदर स्वर । सुंदर या असुंदर स्वाद । सुंदर या असुंदर गंध । शीत या ठंड । सभी भिन्न अनुभूतियाँ हैं । प्रत्येक की भाषा भिन्न है । प्रत्येक का प्रभाव भिन्न है । प्रत्येक की भिन्न भाषा का तर्क अति सामान्य मूल्याँकन होगा । इसमें विस्मय योग्य रंचमात्र कुछ नहीं है । इस आलोक में मस्तिष्क की सक्षमता का मूल्याँकन करने पर उसे अद्भुद से कम क्या कहा जायेगा । प्रत्येक पाँच भषाओं को किस दक्षता से वह प्रतिपल संचालित करता है । एक साथ कितने इंद्रियों से सूचनाये आती रहती है । सभी साथ के साथ निस्तारित होती रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य के साथ घटित हो रहा है । प्रतिपल घटित हो रहा है । यह बात भिन्न है कि कौन इसका सज्ञान ले रहा है और कौन इसका सज्ञान नहीं ले रहा है । कर्म पथ से यदि कर्म दोष का निवारण करना है तो सज्ञान लेना अनिवार्य वाँक्षना होगी ।

क्रमश: अगले अंक में -  

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

कर्म प्रधान सृष्टि में कर्म ही आधार है समस्त प्रगति का । चाहे किसी व्यक्ति विषेस का विचार हो अथवा वर्ग विषेस का विचार हो अथवा संस्था विषेस का विचार हो अथवा शासन तंत्र का विचार हो यह बात समान रूप से लागू होती है । इस विचार से कर्म के माध्यम से कर्म की त्रुटि का निवारण अत्यंत प्रभावी प्रमाणित होती है ।
किसी मनूष्य का जन्म किस वर्ग में हुआ किस माता पिता के मध्य हुआ किस स्तर के सामाजिक स्थिति के परिवार में हुआ निश्चय ही यह मनुष्य के वश में नहीं था । परंतु सही कर्म करते हुये जीवन जीना तो निश्चय ही प्रत्येक मनुष्य के अपने वश में होता है । यह बात तर्क और व्यवहार दोनों ही प्रकार के परीक्षण से सत्य प्रमाणित होती है । सामाजिक मानको से कमजोर वर्ग में और दलित आर्थिक स्थिति के माता पिता से जन्मी संतान भी अपने उत्कृष्ट कर्मों से उच्चतम स्थिति पाते है । इसके विपरीत उच्च सामाजिक स्थिति व धनाड्य परिवारो में जन्मे लोग भी निकृष्ट कर्म के श्राप से दयनीय स्थिति तक पहुँचते हैं । समस्त उपलब्धि कर्म की ही होती है । सही कर्म को जाने । कर्म करने की सही पद्धति को जाने । सही कर्म करना अपना अभ्यास बनावें । यही जीवन की सफलता है ।
कर्म के अध्ययन के प्रकरण में सबसे पहले अपनी शरीर में उपलब्ध कर्म सम्पादन अंगों को अच्छे से जाने । मनुष्य शरीर में दस इंद्रियाँ हैं । इनमें से पाँच केवल कर्म सम्पादन के लिये है । शेस पाँच दो कार्य करने वाली इंद्रियाँ है । पहला कार्य बाह्य संसार का ज्ञान ये इंद्रियाँ अंदर ले आती हैं । दूसरा कार्य कर्म भी करती हैं । दोनो प्रकार की इंद्रियों को अलग प्रकार से चिन्हित करने के लिये बाद में अंकित की गई दो कार्य में सक्षम इंद्रियों को ज्ञानेंद्रियों का नाम दिया जाता है । इन दसो इंद्रियों के अतिरिक्त एक अदद मस्तिष्क होता है मनुष्य के पास । इसकी स्थिति इंद्रियों के ऊपर होती है । यह इंद्रियों का नियंत्रक भी है । यह इंद्रियों का शासक भी है । इंद्रियाँ मस्तिष्क के नियंत्रण में ही कार्य करती है । इस मस्तिष्क से भिन्न एक क्षमता मनुष्य को प्रकृति ने दी है जिसे विवेक कहा जाता है । परंतु इसके स्थिति के लिये किसी विषेस अंग को नहीं बताया जा सकता कि यह विवेक इसी अंग में स्थिति होता है । इसकी कार्य पद्धति और कार्य क्षमता के आधार पर इसे मस्तिष्क में स्थित होने का तर्क किया जा सकता है परंतु यह पुष्ट नहीं है । उपरोक्त के अतिरिक्त और कोई भी अंग नहीं होता मनुष्य शरीर में जो कार्य सम्पादन में सम्मलित होता हो ।
उपरोक्त वर्णित कार्य में प्रयुक्त अंगो की कार्य शैली के सम्बंध में । इंद्रियाँ जो मात्र कार्य सम्पादन में प्रयुक्त होती हैं उनमें मात्र कार्य अभ्यास ही प्रभावी योगदान करने वाला होता है । उत्तम कार्य अभ्यास से उनकी कार्य गुणवत्ता प्रखर होती है । चूँकी ये अंग मस्तिष्क के निर्देश अनुसार कार्य करते हैं इसलिये कार्य के सही चुनाव अथवा गलत चुनाव या कर्म संविधान के अनुरूप कार्य अथवा कार्म संविधान के विपरीत कार्य जैसे विचारों के लिये इन्हे दोषी अथवा श्रेयमान नहीं ठहराया जा सकता । ये निष्ठावान सेवक होते हैं मस्तिष्क के । इनसे भिन्न ज्ञानेंद्रियों की कार्य शैली द्विपक्षीय होने से उनका कार्यकारी एक भाग अर्थात कर्म सम्पादन में तो उपरोक्त कथित कर्म करने वाली अन्य पाँच इंद्रियों के समान ही होता है परंतु दूसरा भाग बाहरी संसार का ज्ञान अंदर लाने वाले दायित्व में आंशिक रूप से मस्तिष्क के नियंत्रण में होती है और आंशिक स्वतंत्र होती हैं । इसलिये यदि कार्य त्रुटिपूर्ण पाया जाता है तो इन इंद्रियों को भी दोष में भागीदार होना सम्भावित होता है । इसलिये इन्हे सतर्कता की सूची में श्रेणीबद्ध किया जाता है ।  
षेस अगले अंक में  

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

 कर्म प्रधान संसार में कर्म ही आधार होता है सकल मूल्याँकन हेतु । कर्म की उत्पत्ति होती है आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा । आत्मा ब्रम्ह का अंश है प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । कर्म का निश्चित संविधान है । संविधान के प्रतिकूल कार्य  वर्जित बताये गये । फिर भी होते हैं । संविधान का ज्ञान न होना भी कारण बनता है । परंतु ज्ञान होने पर भी कोई परवशता भी कारण बनती है । परवशता बाह्य भी हो सकती है परंतु अधिकतर आंतरिक कारणों से होती है । आंतरिक कारणों में व्यक्ति विषेस की शरीर में निहित आत्मा और उसकी शरीर की प्रकृति के मध्य अनियंत्रित प्रतिक्रिया का फल होती है । इस अनियंत्रित स्थिति को सुधारने के लिये सुधार उपाय के रूप में सर्व प्रथम सरल मार्ग भक्ति सुझाया गया जिसके विषय में पर्याप्त चर्चा गत अंकों में की गई । अब त्रुटि सुधार के लिये द्वितीय पथ नामत: कर्म पथ की विवेचना की जावेगी ।
भक्ति पथ में त्रुटि के जनित होने के माध्यम प्रकृति के प्रति समर्पण का पथ सुझाया गया था । परंतु कर्म पथ में कर्म द्वारा कर्म त्रुटि का सुधार सुझाया गया है । कर्म द्वारा कर्म सुधार के पथ में कंचिद एक कर्म त्रुटि को सुधारने के लिये कोई अन्य अलग सुधारक कर्म नहीं अपेक्षित होता अपितु किये जाने वाले कर्म जिसके करने में त्रुटि हुई है अथवा हो रही है अथवा त्रुटि सम्भावित है की सम्पादन गुणवत्ता सुधारने की अपेक्षा है । कर्म सम्पादन गुणवत्ता विचाराधीन होने की दशा में इस गुणवत्ता के अंग स्वरूप कर्म जनित होने के निमित्त कर्म सम्पादन काल में कर्ता की मन:दशा कर्म सम्पादन की प्रेरणाश्रोत भी महत्वपूर्ण योगदान के रूप में चर्चा तथा जानने योग्य तथ्य होंगे । इस प्रकार इस परिचयात्मक उल्लेख से यह स्पष्ट सम्मुख है कि कर्म मार्ग में सज्ञान पूर्वक नियंत्रित कर्म सम्पादन अपेक्षित है । इस नियंत्रित कर्म सम्पादन की अपेक्षा को तभी पूर्ण किया जा सकता है जबकि साधक व्यक्ति का आचरण संयमित और निष्ठापूर्ण हो । आचरण अर्थात समस्त कर्म अभ्यास । संयमित अर्थात करने वाले के अपने नियंत्रण में । निष्ठापूर्ण अर्थात कार्य सम्पादन को वाँक्षनानुसार नियंत्रित ढंग से करने के लिये दृढ संकल्प के साथ । भक्ति को सरल इसीलिये बताया जाता है कि उसमें उपरोक्त सभी अपेक्षाये साधक अपने करने के बजाय प्रकृति पर छोड देता है । प्रकृति की कृपा पर छोड देता है । इसी कारण भक्ति में प्रकृति की कृपा पर विश्वास महत्वपूर्ण होता है । परंतु उपरोक्त के विपरीत कर्म पथ में ना ही प्रकृति के ऊपर छोडना है ना ही प्रकृति पर विश्वास करना है इस पथ में तो साधक को अपने को सुधारना है अपने विषय में जनने द्वारा अपने कर्मों को जानने द्वारा अपने कर्मों की उत्पत्ति जानने द्वारा अपने कर्मों की प्रेरणा श्रोत को जानने द्वारा । इस प्रकार कर्म पथ से त्रुटि सुधार की अपेक्षाये हैं नियंत्रित व्यक्तित्व संयमित कार्य संचालन अभ्यास ।
आत्मा पूर्ण रूप से अलौकिक स्वत: अस्तित्व है । कार्य संचालक है । कार्य की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति के गुणों की महिमा त्रुटि पैदा होने का मूल होता है । आत्मा मौलिक स्वरूप में निरंकार अर्थात प्रकृति से निर्लिप्त होता है । प्रकृतीय संसर्ग में वह प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर त्रूतिपूर्ण कर्म सम्पादन प्रेरित करता है । कर्म पथ द्व्रारा त्रुटि सुधार पथ में यह स्वच्छ चित्र मस्तिष्क में प्रतिपल विद्यमान रहना दूसरी अपेक्षा है ।
कर्म पथ से कर्म त्रुटि सुधार सबसे अच्छा पथ है अपने कर्म की त्रुटि सुधारने के लिये । पहला कारण कि कर्म प्रतिपल कर रहे है । इसलिये सुधारने के लिये प्रयत्नशील होने पर सबसे अधिक सुधार अभ्यास मिलेगा । इतना सुधार अभ्यास किसी अन्य पथ में नहीं मिलता । जितना ही अभ्यास होगा उतना ही साधक दक्ष हो जावेगा । दूसरा कारण है कि इस पथ में आप किसी अन्य व्यक्ति या व्यवस्था पर आश्रित नहीं हैं अपने कर्म सुधार के लिये । इसमें सुधार स्वयँ आपको करना है । अपनी त्रुटियों का सुधार करना है । इसलिये यह आपकी अपनी उपलब्धि होगी । आत्म विश्वास जाग्रित होगा । आप अपनी शक्ति को पहचानेगे । कार्य की क्षवि आपको सुखद अनुभव के रूप में आनदित रहने का माध्यम बनेगी । जीवन वही रहेगा । आप आनंद से ओत प्रोत हो जावेगे ।
कर्म संविधान के अनुरूप कर्म सम्पादन अमृत समान है । एक बार इसका कंचिद स्वाद जिसे अनुभव मिल जावेगा निष्चय है कि फिर वह इसे किसी मूल्य पर नहीं त्यागेगा । ब्रम्ह का दिव्य चिर आनंद । मनुष्य जो कि अपने विवेक के कारण वर्गीकरण के विज्ञान श्रेणी में जन्मा है यदि अपने कर्मों द्वारा उन्नत श्रेणी आनंद में पदोन्न्ति हासिल कर लेता है तो कंचिद यह महानतम उपलब्धि होगी । प्रयत्न प्रारम्भ कर स्वयम अनुभव करे ।   

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

कर्म प्रधान संसार में कर्म ही आधार है समस्त सुख और दु:ख का । कर्म दोष सृजित होता है प्रकृति की व्यापक फैली हुई सुंदरता से ही । फिर भी प्रकृति को किसी भाँति दोषी नहीं ठहराया जा सकता है कर्मदोष के लिये । अधिक से अधिक प्रकृति को निमित्त कहा जा सकता है कर्म दोष के लिये । यह अद्भुद विज्ञान जिसे ब्रम्ह ने पिरोया है प्रकृति में वही विलक्षण विज्ञान ज्ञानी मुनियों को प्रकृति की वंदना के द्वारा प्रकृति की कृपा का पात्र बन कर त्रुटि से सुरक्षित रह जीवन यापन का पथ प्रशस्थ करने का निमित्त बना । भक्ति । समर्पण । कर्ता आत्मा द्वारा निमित्त प्रकृति के प्रति । विषय आत्मा द्वारा वस्तु प्रकृति के प्रति ।
गत अंकों में ज्ञानी मुनि श्रेष्ठों ने प्रकृति की वंदना के कुछ उदाहरण संदर्भित किये गये थे । आज भगवान शंकर की सगुण ब्रम्ह प्रकृति की वंदना निम्नवत उद्घृत है
जय राम रमा रमनम् समनम् । भवताप भयाकुल पाहि जनम् ॥
अवधेस  सुरेस  रमेस  विभो । सरनागत  मागत  पाहि प्रभो ॥
जन्म और मृत्यु के समय आत्मा को अपार कष्ट भोग सहन करना होता है भवताप इसी जन्म और मृत्यु काल के अपरिमित कष्ट को कहा कवि ने । इसी भवताप के भय से त्रस्त भयाकुल । भवताप का भोग का कारण सृजित होता है त्रुटिपूर्ण कर्मों के कारण । जन्म बारम्बार उन्ही त्रुटिपूर्ण कर्मों का दण्ड भोग के लिये ही होता है । इसीलिये भगवान शंकर अपनी वंदना में कहते हैं हे प्रभू मुझे अपनी शरण में लीजिये मेरी रक्षा कीजिये । यही यथार्थ भाव है भक्ति का । प्रकृति की कृपा का कवच ।
तैत्रेय उपनिषद में वर्णित संसार की रचना के पाँच स्तर (1) अन्न (2) प्राण (3) मनस (4) विज्ञान (5) आनन्द । अन्न सकल निर्जीव रचनायें, प्राण सकल वनस्पति, मनस सकल प्राणी, विज्ञान मनुष्य, आनंद दिव्य शांति । मनुष्य में विवेक है । इसलिये मनस श्रेणी से श्रेष्ठ है । आनंद दिव्य शांति की उपलब्धि सम्भव होगी त्रुटिपूर्ण कर्मों से मुक्त होने की दशा में ही । प्रकृति में आसक्ति अवनति को प्रशस्थ करता है । अवनती की श्रंखला उसे विज्ञान से मनस फिर प्राण फिर अन्न पर्यंत ले जाती है । उत्कर्ष उसे विज्ञान से पदोन्नति के रूप में आनंद की स्थिति मिलेगी । सही कर्म ही एक मात्र वाँक्षना है । त्रुटिपूर्ण कर्म पाप हैं । सही कर्म संविधान अनुरूप कर्म पुण्य हैं । पाप से पाप की वृद्धि होती है । पुण्य से पुण्य की वृद्धि होती है ।

सगुण ब्रम्ह प्रकृति अति कृपालु होती है । वह शरण में आये की पूर्ण रक्षा करती है । शरण में यदि मनुष्य का अहंकार नहीं जाने देता तो दोषी प्रकृति नहीं है ।  

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा


धर्म मनुष्य को जीने की राह दिखाता है । दर्शन उस धर्म के आधार भूत सिद्धांत होते हैं । भारतीय धर्म दर्शन में आधार भूत सिद्धांत अवलम्बित है कर्म की प्रधानता पर । कर्म ही आधार है समस्त सृष्टि की प्रगति का समस्त गतिविधियों का । कर्म का सृजन होता है ब्रम्ह के अंश आत्मा और ब्रम्ह की रचना प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा । कर्म सिद्धांत प्रगट करता है कि समस्त क्रियाँओं की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति की कार्य पद्धति न्याय पर आधारित होती है । न्याय में कर्म दोष दण्डनीय होते हैं । कर्म प्रवर्तन आत्मा का दायित्व है । इसलिये कर्म फल की भोगी आत्मा होती है । इन्ही कर्म फलो के भोग के निमित्त आत्मा पुनर्जन्म की परिस्थिति से गुजरता है ।  
भारतीय धर्म दर्शन में जो कि कर्मप्रधान सिद्धांतों पर आधारित है जो भी प्राविधान किये गये हैं वह समस्त मनुष्य समुदाय के हितों के अनुरूप है क्योंकि कर्म प्रत्येक मनुष्य के जीवन का आधारभूत निमित्त होता है । कर्म के अभाव में कोई जीवन सम्भव नहीं होगा । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । प्रकृति ब्रम्ह की अभिब्यक्ति है । अलौकिक ब्रम्ह ने अपने को लौकिक संसार के रूप में प्रगट किया है । प्रकृति ही ब्रम्ह की व्यवस्था है । समस्त सृजन प्रकृति के माध्यम से सम्भव हुआ है । प्रकृति ही समस्त संसार के पालन का आधार है । काल और कर्म दोनो ही प्रकृति के अधीन हैं ।
इस व्यापक धर्म दर्शन के प्रवर्तक मुनियों ने सदैव प्रकृति की व्यापक महिमा को शिरोधार्य किया है । कर्म प्रवर्तक आत्मा का कार्य सम्पादन प्रकृति के नियंत्रण में रखा गया है । प्रकृति गुणयुक्त है । आत्मा प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है । इसलिये आत्मा को अति संवेदनशील दायित्व निर्वाह की आवश्यकता होती है ।
ज्ञानी मुनि कहते हैं
लाभ हानि जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ ।
लाभ तथा हानि दोनो ही कर्म फल हैं । कर्म फल निर्धारण प्रकृति का क्षेत्र है । आत्मा निर्धारण की भोगी है । एक ही स्थान एक ही समय दो व्यक्ति अलग अलग फल पाते हैं । निर्भर करता है कर्म सम्पादन की गुणवत्ता पर । इसी प्रकार किस आत्मा को किस शरीर में किस स्थान पर किस काल में जन्म लेना होगा यह प्रकृति का निर्धारण है । यह भी आधारित होता है आत्मा के कर्म सम्पादन की गुणवत्ता पर । आत्मा के समस्त कर्म सम्पादन का लेखा प्रकृति संचित करती है । अगली शरीर का निर्धारण पूर्ण रूप से लेखा के अनुसार न्यायपूर्ण होता है । इसी प्रकार मृत्यु किसकी किस काल किस विधि और किस स्थान पर होगी यह भी पूर्णतया कर्म भोग और कर्म सम्पादन की गुणवत्ता पर ही आधारित होती है । प्रकृति के अधीन होती है । इसी प्रकार यश और अप-यश दोनो ही प्रकृति नियंत्रित होते हैं । वही कर्म कर एक व्यक्ति यश पाता है और दूसरा व्यक्ति अपयश पाता है । निर्भर करता है कर्म की गुणवत्ता तथा पूर्व के कर्मों के फलभोग किसके कैसे हैं । प्रकृति का समस्त सम्पादन होता न्यायपूर्ण ही है । प्रकृति ब्रम्ह की सत्यनिष्ठ होती है ।

इन्ही कारणों से इस कर्म प्रधान संसार में समस्त उपलब्धि कर्म की गुणवत्ता पर ही लम्बित होती है । कर्म प्रेरक आत्मा व्यापक प्रकृति के मोहक स्वरूप के मध्य दायित्व निर्वाह के लिये स्थापित है । मानो तलवार की धार पर उसे यात्रा करनी हैं । सतर्क सज्ञान पूर्वक संचालन ही यात्रा पार करेगा । अन्यथा विध्वंसक विकल्प भोगेगा । 

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
ज्ञानी मुनियों ने सगुण ब्रम्ह की वंदना कर अपने त्रुटिपूर्ण कर्मों को सुधार कर्मसंविधान के अनुकूल कर्म करने की उपलब्धि किस प्रकार पायी की श्रंखला को सतत रखते हुये । ज्ञानी मुनि सुतीक्ष्ण की वंदना उद्घृत है ।
अस अभिमान जाई जन भोरे । मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥
मुनि की उपरोक्त वंदना सीधे रूप में भक्ति के स्वरूप के अनुरूप है । भक्ति का स्वरूप स्पष्ट यही रूप है । वंदनकर्ता सेवक और आराध्य स्वामी । कार्य प्रेरक आत्मा सेवक और कार्यों की कर्ता प्रकृति स्वामी । इस अभिव्यक्ति की महत्ता अधिक प्रगाढ इसलिये प्रमाणित होती है कि मुनि की उपरोक्तानुसार वंदन पर प्रभु श्रीराम ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह वंदन में व्यक्त भाव को पुष्टि करता है । प्रभु की प्रतिक्रिया को कवि निम्नवत् ब्यक्त करता है
सुनि मुनि बचन राम मन भाये । बहुरि हरष मुनिबर उर लाये ॥
मुनि के ब्यक्त विचार प्रभु श्रीराम को पसंद आये और प्रसन्नता ब्यक्त करते हुये प्रभु श्रीराम मुनि को गले लगा लिये । प्रभु श्रीराम की प्रसन्नता इतने अभिब्यक्ति से ही नहीं पूर्ण हुई । वह आगे कहते हैं
परम प्रसन्न जान मुनि मोंही । जो बर माँगहुँ देहुँ सो तोहीं ॥
मुनि मैं तुम्हारी वंदना में ब्यक्त तुम्हारे बिचारों को जान तुम्हसे अति प्रसन्न हूँ । तुम मुझसे जो भी वरदान माँगो मैं तुम्हे दूँगा । कितनी बडी उपलब्धि मुनि श्रेष्ठ को हुई । गत अंकों में मुनि श्रेष्ठ ज्ञानी मुनि अगस्त तथा ब्रम्हानंद की स्थिति के भोक्ता मुनि सनकादि के जो उध्वरण उद्घृत किये गये थे उनमें मुनियों ने प्रभु से माँग की थी वरदान की परंतु प्रभु ने उनकी माँग स्वीकार किया यह प्रमाणित नहीं था । परंतु इस उद्वहरण में प्रभु ने स्पष्ट वंदना को स्वीकार किया है और वरदान देने के लिये मुनि से कहा वरदान माँगो । यह विलक्षण स्थिति हुई । प्रभु की अभिब्यक्ति पर आगे मुनि की प्रतिक्रिया इससे भी विशिष्ट महत्व की है । मुनि बोले हे प्रभु मैं नहीं जानता कि मेरा हित क्या वरदान माँगने में होगा इसलिये यदि आप मुझपर प्रसन्न ही हैं तो आप स्वयँ मुझे वह वरदान दीजिये जिसमें मुझ भक्त की भलाई निहित हो । भक्त का शास्वत निखरा स्वरूप यही है । वह आराध्य पर इसी प्रकार सीमा रहित अंतविहीन परिधि तक निर्भर करता है । अपने को समर्पित करता है । आराध्य की कृपा पर विश्वास करता है । यही निर्भरता माप भी है भक्ति का । इसी की प्रगाढ निरूपण प्रपत्ति होती है । प्रभु की प्रतिक्रिया मुनि के उपरोक्त समर्पण पर
अविरल भगति बिरति विज्ञाना । होहुँ सकल गुण ज्ञान निधाना ॥
प्रभु ने तो मुनि को अमृत ही दे दिया । उसका पूर्ण उद्धार ही कर दिया । अविरल भगति अर्थात सतत कर्म संविधान के अनुकूल क्रिया सम्पादन, बिरति अर्थात प्रकृति स्वामीं के कलापों के प्रति उदासीन रहने का विज्ञान अर्थात भगवान शंकर की अनन्य भक्ति, गुण अर्थात कार्य सम्पादन कौशल, ज्ञान अर्थात ज्ञेय ब्रम्ह को जानना । शेष क्या बचा ? मुनि तो सभी कुछ पा गये जिसे पाने के लिये म्नुष्य सारे उद्यम करता है । यह स्वरूप है सगुण ब्रम्ह की कृपा भाव का । यह स्वरूप है सगुण ब्रम्ह की उदारता का । वह अति कृपालु है । हम उसके सच्चे सेवक नहीं बन पाते । अविद्या हमें अमृत से दूर किये रहती है । प्रभु तो स्पष्ट कहते हैं कि
समदरसी मोंहि कहि सब कोई । सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ ॥
प्रभु कहते हैं कि मुझे सेवक प्रिय होते हैं उनमें भी अधिक प्रिय वह सेवक होते हैं जो अनन्य भाव से सेवा करते हैं । आगे अनन्य को परिभाषित भी करते हैं

सो अनन्य जाके असि मति न टरई हनुमंत ।
मैं  सेवक  सचराचर  रूप  स्वामि  भगवंत ॥  
जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में सदैव यह विचार विद्यमान रहता है कि मैं सेवक हूँ और समस्त रूप अर्थात प्रकृति मेरी स्वामी है वे ही अनन्य है ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
गत अंक की चर्चा मुनि सनकादि की प्रभु श्रीराम से की गई वंदना को सतत् रखते हुये । मुनिश्रेष्ठ प्रभु से विनय करते हैं कि हे प्रभु मुझे प्रेम भक्ति का वरदान दीजिये । यही दुर्लभ उपलब्धि है इसे ही मनुष्य अपने प्रयत्नों से उपलब्ध नहीं कर पाता है । इसलिये प्रभु मुझपर प्रसन्न हो मुझे यही वरदान दीजिये । स्मरणीय है कि मुनि की उपलब्धियाँ । ब्रम्हानंद में मग्न रहने वाले मुनि श्रेष्ठ यह विनय करते है कि प्रेम भक्ति ही अति दुर्लभ साधना है । इसे हम अपने प्रयत्नो से नहीं हासिल कर पा रहे हैं । जो मुनि श्रेष्ठ आत्मा की अनुभूति का प्रतिपल बोध कायम रखते हुये जीवन यापन करने वाले और समस्त वेदों के ज्ञाता वह इस प्रकार की असमर्थता को व्यक्त करते है । निष्चय ही यह प्रकृति की प्रबल क्षमता का ज्ञोतक माना जाना चाहिये जिसके प्रभाव से आत्मा प्रकृति के कर्तापन को नहीं स्वीकार करता । यही है प्रबल माया । प्रकृति अपने इसी प्रचण्ड माया शक्ति से मनुष्य को गुलाम बना उनकी सेवाओं को प्रयोग करती है । कर्म संविधान का विचलन भी प्रकृति ही प्रवित्त करती है । विचलित होने पर दण्डित भी प्रकृति ही करती है । इन्ही कारणों से ज्ञानी मुनि प्रेम भक्ति अर्थात प्रकृति के अपेक्षानुसार कर्म सम्पादन का सतत अभ्यास का वरदान माँगते हैं । हे सगुण प्रभु मेरे ऊपर कृपा करिये मुझे विषेस अनुकम्पा के अधीन सतत सेवा अर्पित करने के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान कीजिये ।
उपरोक्तानुसार विनय के उपरांत मुनिश्रेष्ठ अपनी विनय का निमित्त भी प्रगट करते है । कवि निमित्त को व्यक्त करते लिखा
देहुँ भगति रघुपति अति पावन । त्रिविधि ताप भव दाप नसावन ॥
त्रिविध ताप दैहिक, दैविक, भौतिक । शरीर मे उत्पन्न होने वाले कष्ट । रोग, ब्याधियाँ जो शरीर के विभिन्न अंगों मे उत्पन्न होने वाली बाधाये और उनसे प्रवित्त कष्ट । इनकी कारक प्रकृति ही होती है । दैविक भाग्य जनित । पूर्व जन्मों के कर्मों के परिणाम स्वरूप आरोपित त्रास । इन त्रासो का वर्तमान जन्म से कंचिद कोई सम्बंध नहीं प्रमाणित होता । इन त्रासो की भी प्रेरक प्रकृति ही होती है । प्रकृतीय प्रकोप । तूफान, बाढ, भूकम्प, आदि प्रकृतीय आपदाओं से जनित संताप । इनकी कर्ता भी प्रकृति ही होती है । मुनिश्रेष्ठ विनय का निमित्त बयान करते हुये कहते हैं कि आपके प्रसन्न होने से प्रभु मैं उपरोक्त वर्णित समस्त कष्टो से मुक्त हो आपकी सेवा कर सकूँगा प्रभू । इस संसार की समस्त क्लिष्ट बिपत्तियों से उत्पन्न भय से मुक्त आपकी सेवा में तत्पर हो सकूँगा प्रभू । आपकी कृपा अति पवित्र है प्रभू । मुझे अपनी कृपा प्रदान कीजिये प्रभु ।
कंचिद मुनि श्रेष्ठ की उपरोक्त वंदना और विनय की निमित्त का समर्थन भगवान शंकर भी करते है । कवि निम्नवत् ब्यक्त करता है
ज्ञानी मूढ न कोय ।
जेहिं जब रघुपति करहिं जब सो तस तेहि क्षण होय ।
सगुण ब्रम्ह स्वरूप श्रीराम प्रकृति - जिस समय जिसको जो परिस्थिति प्रदान करती है उसी अनुरूप वह प्रगट होता है । कोई स्थायी स्वरूप नहीं ग्रहण कर पाता । न ही ज्ञानी स्वरूप न ही अज्ञानी मूर्ख स्वरूप । यह प्रकृति की महिमा है कि किसको कब क्या स्वरूप प्रदान करती है । प्रकृति की कृपा का आकाँक्षी होना श्रेष्ट सुझाव है ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
प्रभु श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्षमण को जीवन जीने की नीति बताई जिसे कि कवि ने निम्नवत् व्यक्त किया
लक्षमण देखत काम अनीका । रहहिं धीर तिन्हकर जग लीका ॥
काम अर्थात प्रकृति का वह स्वरूप अथवा अभिव्यक्ति जिसके माध्यम से मनुष्य की आत्मा कर्म संविधान को भुला इच्छा जनित कर्म प्रेरण की ओर प्रवृत्त होता है । यह शब्द पाँचों ज्ञान इंद्रियों के विषयों को आच्छादित करता है । सुंदर गंध, सुंदर मन-मोहक दृष्य, सुन्दरवाद्य धुने अथवा गीत, सुरम्य वातावरण, स्वादिष्ट व्यंजन । यह सभी आसक्ति सृजित करते हैं । प्रकृति प्रस्तुत करती है । आत्मा को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना अपेक्षित होता है इनके उपस्थित होने पर । प्रभु बताते हैं कि उचित प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिये । धीर अर्थात सजग नियंत्रित । होता क्या है कि किन्ही परिस्थितियों में मनुष्य का मस्तिष्क बडी ही त्वरित गति से ढेरों विकल्प उपस्थित करता है उस परिस्थिति के परिणाम के रूप में अथवा सम्भावित उपलब्धि के रूप में । सामान्यतया मनुष्य उन्हीं उपस्थित किये गये विकल्पो में से चुनाव शुरू कर देता है अपनाने के लिये । यही आसक्ति का प्रवेष द्वार है । यहीं से गाडी अपने रेल से उतरती है । भगवान आगाह करते हैं रहहिं धीर सावधान यह प्रकृति का व्यापक फैला मनमोहक सुंदर स्वरूप देख जो इसमें आसक्त नहीं होता धैर्यवान रहता है अपने मस्तिष्क में उठ रहे अनेकानेक प्रकार के उन्मादों के आगोश में नहीं उलझता धीर रहता है । फिर उसके धीर रहने का फल उसे क्या मिलता है तिन्हकर जग लीका उन्हे ही संसार में श्रीमान उपाधि मिलती है संसार में वह एक उदाहरण के रूप में बताये जाते है । उन्ही का कर्म त्रुटिपूर्ण नहीं होता । ऐसे ही धैर्यवान व्यक्ति ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कार्य करते श्रीमान बनते हैं ।
पुन: गत अंक के प्रसंग ज्ञानी मुनियों द्वारा सगुण ब्रम्ह प्रकृति से क्या वरदान मागा गया को सतत रखते हुये ज्ञानी मुनि सनकादि द्वारा माँगा गया वरदान । मुनि सनकादि के व्यक्तित्व को बताते हुये कवि लिखता है
ब्रम्हानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥
अपनी आत्मा की प्रतिपल जिसे अनुभूति बनी रहेगी वह सदैव ब्रम्ह की अनुभूति करते में आनंदित विभोर रहेगा उसे कहा जावेगा ब्रम्हानंद सदा लयलीना । प्रकृति के काम विस्तार से सदैव सतर्क । निरंकार । प्रकृति के मोह बंधन से प्रतिपल मुक्त । ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व सदैव स्फूर्ति उर्जा से भरपूर । नवयुवक । प्रकृति के सेवा हेतु प्रतिपल तत्पर ।
रूप धरे जनु चारिहुँ वेदा । समदरसी मुनि विगत विभेदा ॥
जो मनुष्य प्रकृति की आसक्ति से बचा रहेगा उसे हर मनुष्य में विद्यमान ब्रम्ह का अंश आत्मा के रूप में साक्षात ब्रम्ह दिखाई पडता रहेगा उसे कोई बडा कोई छोटा कोई सुंदर कोई असुंदर कोई श्रेयमान कोई तिरस्कृत नहीं प्रतीत होगा । वह समदरसी हो जावेगा । चारो वेद प्रकृति का पूर्ण ज्ञाता । क्या उपलब्धि बची । मुनि जिसने हर सम्भव उपलब्धि हासिल कर ली थी । आनंद की स्थिति भोग कर रहे थे । ब्रम्हानंद स्थिति ।
ऐसे मुनि श्रेष्ठ ने भी प्रभु श्रीराम से वरदान माँगा
द्वंद बिपति भव फंद विभंजय । हृद बस काम क्रोध मद गंजय ॥
हे प्रभु आप मेरे हृदय concept में सदैव निवास करिये और मेरे हृदय में प्रकृतीय आसक्ति व इच्छाओं तथा इच्छा पूर्ति न होने की दशा में उभरने वाले क्रोध व कर्तापन के अहंकार को नष्ट कर दीजिये प्रभो ।
परमानंद कृपायतन  मनपरिपूरन  काम ।
प्रेम भगति अनपायनी देहुँ हमहि श्रीराम ॥  
भगति ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कार्य सम्पादन । प्रेम प्रति पल का अभ्यास

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
सगुण ब्रम्ह प्रकृति की वंदना । वंदना का उद्देष्य उसकी कृपा की उपलब्धि । कृपा की आवश्यकता अपने त्रुटिपूर्ण कर्म का सुधार । इच्छाजनित कर्मों का पोषण त्याग कर्म संविधान के अनुकूल कर्म सम्पादन परिणाम अपना अभ्यास बनाने के निमित्त । सुगमतम पथ भक्ति । अर्थात निर्गुण ब्रम्ह के अंश स्वरूप आत्मा के सुधार हेतु सगुण ब्रम्ह की वंदना । निमित्त निर्गुण आत्मा सगुण के गुणों की भोक्ता होने के कारण सगुण में आसक्त हो जाने से अपने निरंकार स्वरूप को कलंकित कर बैठी ।
मुनि अर्थात विद्वान जिन्होने अपना समस्त जीवन अर्पित किया मात्र ब्रम्ह व ब्रम्ह की उत्पत्ति प्रकृति के अध्ययन में और कुछ उपयोगी उपलब्धियों को उन्होने दिया समाज को लाभांवित होने के उद्देष्य से । ज्ञानी मुनियों ने जिस प्रकार सगुण ब्रम्ह की वंदना की उसके कतिपय दृष्टांत उद्घृत किये जा रहे है ।
सर्व प्रथम अगस्त मुनि द्वारा की गई प्रभु श्रीराम की वंदना
अस बर माँगहु कृपा निकेता ॥ बसहुँ हृदय श्री अनुज समेता ॥
अविरल भगति प्रीति संत संगा । चरण सरोरुह प्रीति अभंगा ॥
ज्ञानी मुनि सर्वप्रथम माँगते है अविरल भक्ति । सतत भक्ति । प्रतिपल सेवा भाव । अविस्मरणीय सेवा कामना । वंदना की दूसरी माँग प्रीति संत संगा । संत अर्थात वे प्राणी जिनका प्रत्येक कर्म कर्म संविधान के अनुकूल है । ऐसे संतो के साथ रहने का सुयोग । वंदना का तीसरा वंदन चरण सरोरुह प्रीति अभंगा । प्रभु के श्री चरणों के प्रति मन अर्थात मस्तिष्क में प्रतिपल अविरल अर्थात कभी खण्डित न होने वाली प्रीति चेतना ।
ध्यान योग्य है कि ज्ञानी मुनि की वंदना अविरल कभी खण्डित न होने वाली सेवा तत्परता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानती है । त्रुटि किसी भी पल जनित हो सकती है । इसलिये त्रुटि निवारण के लिये प्रयत्नशील को प्रतिपल सतर्कतापूर्ण प्रयत्नों की आवश्यकता प्रतीत होती है । सावधानी हटी दुर्घटना घटी । सुधार प्रयत्नों की साधना काल में दूसरी योगकारक स्थिति बनती है संत संग से । उन व्यक्तियों की संगत जिनका कर्म सुधरा हुआ है । जो त्रुटि करते ही नहीं । इच्छाजनित कर्म करते ही नहीं । ऐसे व्यक्ति के साथ मिलने पर आँख से देखता है उद्यमी व्यक्ति की संत किस सरलता से प्रकृति प्रेरित कर्मों को करता है । देखकर सुगमता से सीखता है । भगवान श्रीराम ज्ञानी मुनि सनकादि के आगमन के अवसर पर उनका स्वागत करते हुये कहते हैं
बडे भाग्य पाउब संत संगा । बिनहि प्रयास होंहि भव भंगा ॥
यह मेरा अति सौभाग्य है कि आप के आने से मुझे संत का संग मिला, जिसके मिलने से इस संसार में जो कर्म त्रुटिपूर्ण होने का भय होता है समाप्त हो जावेगा ।
इसप्रकार संत की संगत को अध्ययन के प्रत्येक स्तर पर अति महत्वपूर्ण माना गया है ।
वंदना की तीसरी माँग प्रीति अभंगा । अखण्डित सेवा भाव । इस भाव के खण्डित होने के साथ ही प्रवेष होगी त्रुटि । इसलिये त्रुटि से बचने के लिये अखण्डित । उपलब्धि के लिये परम आवश्यक अखण्डित सेवा भाव ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
प्रपत्ति का आधार स्तम्भ होती हैं (1) अनुकूलस्य संकल्प: - प्रत्येक प्राणी के प्रति सद्भाव । प्रत्येक प्राणी व्यापक प्रकृति की संतान है । प्रत्येक प्राणी को प्रकृति ने जन्म दिया है किसी निश्चित कर्तब्य की पूर्ति के लिये । प्रत्येक प्राणी का कार्य दायित्व महत्वपूर्ण है । प्रत्येक प्राणी के मनोभाव का एक निश्चित महत्व है । मात्र तुलनात्मक सामाजिक उपलब्धियों के आधार पर किसी को महत्वपूर्ण अथवा तिरस्कृत न ग्रहण किया जाय । इस प्रकार के विचार यदि मस्तिष्क में निहित होगे तभी वह व्यक्ति प्रकृति के प्रति आदर भाव जाग्रित कर उसकी निष्ठापूर्ण सेवा में तत्पर हो सकेगा । (2) प्रतिकूलस्य वर्जितम उपरोक्त क्रमाँक एक पर कहा गया कि प्रत्येक प्राणी के प्रति सद्भाव आवश्यक है । विद्वान महात्मा उतना ही बता संतुष्ट नहीं हुये वह उपरोक्त के विलोम को वर्जित भी बताया । किसी प्राणी के प्रति दुर्भावना न रखे । सभी प्राणी प्रकृति के संतान हैं । सभी को प्रकृति ने किसी विसिष्ट कार्य दायित्व के लिये जन्म दिया है । प्रत्येक महत्वपूर्ण है प्रकृति के लिये । सभी प्राणी के कर्मों की कर्ता प्रकृति ही है । अत: किसी भी प्राणी के प्रति दुर्भावना न रखी जाय । (3) रक्षिस्याति विश्वास: - प्रकृति रक्षा करेगी यह विश्वास मस्तिष्क में दृढ हो । यहाँ विवेचना योग्य है कि मनुष्य प्रवित्ति दो प्रकार की होती है । प्रथम श्रेणी में मनुष्य किसी सिद्धांत को विश्वास करता है जब तक कोई ऐसी घटना न घटित हो जाय जिससे वह विश्वास करने योग्य न रह जाय । दूसरी श्रेणी में मनुष्य किसी सिद्धांत को विश्वास नहीं करेगा जब तक कोई घटना ऐसी न घटित हो जाय जिससे वह विश्वास करने पर बाध्य हो जाय । उपरोक्त वर्गीकरण यथा अनुभव पाया जाता है । यह मूलत: जिसका जैसा मस्तिष्क प्रकृति ने बनाया है वैसा वह वर्ताव करता है । इसलिये वाँक्षना रक्षिस्याति विशास: प्रथम श्रेणी के व्यक्ति जो सिद्धांत को कहे अनुसार सत्य मानते हैं को अभ्यास में सरलता से व्यव्हृत होगा और दूसरे श्रेणी के लोग जो सत्य मानने के लिये घटित सत्य की प्रतीक्षा करते है उन्हे इसे अंगीकार करने में कठिनाई आयेगी । परिणामत: उपलब्धियाँ भी तद्नुसार होंगी । (4) गोपतृत्व वर्णम् प्रकृति की ओर रक्षा की कामना से घूमना । यह वाँक्षना पूर्णतया अभ्यास काल के लिये कही गयी है । कर्म दोष के सुधार की प्रक्रिया विचाराधीन है । दोष उत्पत्ति होती है आसक्ति जनित इच्छाओं से और कर्तापन के अहंकार से । निवारण को प्रयत्नशील होने पर मनुष्य चेष्टा करता है कि वह प्रकृति के आदेशित कर्मों को सम्पन्न कर कर्म संविधान के प्रति सत्य प्रमाणित हो । कर्म सम्पादन के उपरांत जब वह अपने कर्म सम्पादन की स्वयँ समीक्षा करता है तो पाता है कि फिर उसने अपनी इच्छाजनित कर्म को ही सम्पन्न किया है । उसकी सही कर्म सम्पादन की चेष्टा विफल हुई । अनंत काल से आत्मा का अभ्यास रहा है इच्छाजनित कर्मों को ही करने का । इसलिये सुधार की चेष्टा विफल हुई । इस प्रकार बार बार की सुधार की चेष्टा विफल होने पर विफलता से त्रस्त वह प्रकृति की ओर अपने सुधार के प्रयत्नों की रक्षा के मंतब्य से घूमता है । गोपतृत्व वर्णम् । (5) कार्पण्यम् अपने सामर्थ्य से असहाय । उपरोक्त गोपतृत्व वर्णम् प्रकृति की ओर रक्षा की कामना से मनुष्य तभी घूमेगा जब उसे अपने सुधार की चेष्टा से वह असहाय महसूस करेगा । जब तक उसे अपने पुरुषार्थ पर भरोसा रहेगा तब तक वह किसी सहायता के लिये क्यों आत्र होगा । सहायता की प्रार्थना ही आत्र असहाय स्थिति का परिणाम होती है । इस प्रकार यह वाँक्षना भी प्रयत्नशील सुधार के चेष्टारत साधक के लिये ही है । कार्पण्यम् स्थिति गोपतृत्व वर्णम् की सत्यनिष्ठा प्रमाणित करती है । दोनों वाँक्षनाओं का मिश्रित स्वरूप बनता है कि हे प्रभू मैं अपने प्रय्त्नों से अपने कर्म दोष का सुधार नहीं कर पा रहा हूँ इसलिये मैं आपसे सहायता की याचना कर रहा हूँ कृपया मेरे प्रयत्नों की रक्षा कीजिये ताकि मैं सत्यनिष्ठ यथा संविधान वाँक्षना कर्म सम्पादित कर सकूँ । (6) आत्मनिक्षेप: - पूर्ण समर्पण । अपने को पूर्ण रूप से प्रकृति की कृपा पर अर्पित करना । गत लेख में जो दृष्टांत बिल्ली के बच्चे का दिया गया था । उपरोक्त छ: वाक्षँनाये वब मनुष्य पूर्ण कर लेगा अपने अभ्यास में समाहित कर लेगा तो प्रकृति माँ अपने उस संतान के कर्मों की रक्षा बिल्ली की भाँति करेगी उसे अपने पूर्ण संरक्षण में वह माहौल देगी जिसमें वह अपनी इच्छाजनित कर्मों से दूर हट प्रकृति के आदेशित कर्मों को करने में संलग्न हो जावेगा ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण