गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
एक भक्त के आग्रह को कवि निम्नवत् व्यक्त करता है
द्वंद बिपति भव फंद विभंजय । हृद बस काम ताम मद गंजय ॥
जो सर्वस्व का ज्ञाता है उसे कवि कहा जाता है । सुन कर विश्वास नही होता । सर्वस्य का ज्ञाता कौन हो सकता है । सकल सृष्टि की रचना प्रकृति और पुरुष के सन्योग से हुई है । इसलिये जो प्रकृति और पुरुष का ज्ञाता है वह कवि कहायेगा ।
कवि भक्त की अपने आराध्य से विनय का वृतांत व्यक्त करते हुये बताता है कि भक्त अपने आराध्य से विनय करता है कि हे प्रभु आप मेरे हृदय में बस जाओ । हृदय conceptual centre of mind में बस जाओ अर्थात मुझे आपका अनुभव हो जाय । ब्रम्ह को बताया गया कि वह उपलब्ध ज्ञानेंद्रियों की ज्ञान सीमा से परे है । तो कैसे उसका ज्ञान सम्भव है ? उसका आपको अनुभव हो जाय । कवि इस स्थिति को ब्यक्त करते हुये कहता है – “ जानहि तुम्हहि जेहि देहुँ जनाई अर्थात कृपालु ब्रम्ह जब भक्त पर कृपा करेगा तो उसे अपना बोध करा देगा अनुभव करा देगा । यही विनय करता है भक्त कि हे प्रभु आप कृपालु हो मेरे ऊपर और आप मुझे अपना बोध करा दो अनुभव करा दो । ज्ञानी मुनि अगस्त इसी स्थिति को इस प्रकार ब्यक्त करते है – “ यद्यपि ब्रम्ह अखण्ड अनंता । अनुभव गम्य भजहिं तेहिं संता ॥ जैसा प्रभु अपने को अनुभव करा दे अपने भक्त को वैसे ही स्वरूप का ध्यान कर भक्त उनका गुण गान करने लगता है । भक्त प्रहलाद को इमारत के खम्भों में प्रभु ने दर्शन दिया । प्रभु तो कण कण में ब्यप्त हैं नारायण हैं । अंधे तो हम हैं कि उन्हे देख नहीं पाते । भक्त यही विनय करता है कि हे प्रभु मुझे वह दिव्य दृष्टि दो वह कल्पना शक्ति दो कि हम आपको हर रूप में हर अस्तित्व में अनुभव कर सकें ।
ऐसा अनुभव मिलने का परिणाम क्या होगा ? हमारे हृदय में जो मोह ब्याप्त है प्रकृतीय घटकों के प्रति जो आसक्ति व्याप्त है प्रकृतीय गुणों के प्रति जो उन्हे पाने की इच्छा व्याप्त है वह समाप्त हो जावेगी प्रभू । हम इस प्रकृतीय गुणों की आसक्ति और उन्हे पाने की इच्छाओं से घिरे आप की छवि के दर्शन से च्युत हैं प्रभू । आप कृपालु हों और मेरे हृदय में बास करिये मेरे हृदय को अपना निवास बना लीजिये प्रभू । मै ब्रम्हानंद की स्थिति पाना चाहता हूँ प्रभू ।
यदि कंचिद प्रभु कृपालु हुये और आप ब्रम्हानद का अमृत भोग कर सके तो विश्वास करिये कि जो इन सांसारिक सुखो और दु:खो का ब्यूह घेरे सता रहा है वह लुप्त हो जावेगा । यही भक्त की विनय होती है अपने आराध्य से ।

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

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