धर्म मनुष्य को जीने की राह दिखाता है । दर्शन उस धर्म के
आधार भूत सिद्धांत होते हैं । भारतीय धर्म दर्शन में आधार भूत सिद्धांत अवलम्बित
है कर्म की प्रधानता पर । कर्म ही आधार है समस्त सृष्टि की प्रगति का समस्त
गतिविधियों का । कर्म का सृजन होता है ब्रम्ह के अंश आत्मा और ब्रम्ह की रचना
प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा । कर्म सिद्धांत प्रगट करता है कि समस्त
क्रियाँओं की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति की कार्य पद्धति न्याय पर आधारित होती है
। न्याय में कर्म दोष दण्डनीय होते हैं । कर्म प्रवर्तन आत्मा का दायित्व है । इसलिये
कर्म फल की भोगी आत्मा होती है । इन्ही कर्म फलो के भोग के निमित्त आत्मा पुनर्जन्म
की परिस्थिति से गुजरता है ।
भारतीय धर्म दर्शन में जो कि कर्मप्रधान सिद्धांतों पर
आधारित है जो भी प्राविधान किये गये हैं वह समस्त मनुष्य समुदाय के हितों के
अनुरूप है क्योंकि कर्म प्रत्येक मनुष्य के जीवन का आधारभूत निमित्त होता है ।
कर्म के अभाव में कोई जीवन सम्भव नहीं होगा । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । प्रकृति
ब्रम्ह की अभिब्यक्ति है । अलौकिक ब्रम्ह ने अपने को लौकिक संसार के रूप में प्रगट
किया है । प्रकृति ही ब्रम्ह की व्यवस्था है । समस्त सृजन प्रकृति के माध्यम से
सम्भव हुआ है । प्रकृति ही समस्त संसार के पालन का आधार है । काल और कर्म दोनो ही
प्रकृति के अधीन हैं ।
इस व्यापक धर्म दर्शन के प्रवर्तक मुनियों ने सदैव प्रकृति
की व्यापक महिमा को शिरोधार्य किया है । कर्म प्रवर्तक आत्मा का कार्य सम्पादन
प्रकृति के नियंत्रण में रखा गया है । प्रकृति गुणयुक्त है । आत्मा प्रकृतीय गुणों
की भोक्ता होती है । इसलिये आत्मा को अति संवेदनशील दायित्व निर्वाह की आवश्यकता
होती है ।
ज्ञानी मुनि कहते हैं –
लाभ हानि जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ ।
लाभ तथा हानि दोनो ही कर्म फल हैं । कर्म फल निर्धारण
प्रकृति का क्षेत्र है । आत्मा निर्धारण की भोगी है । एक ही स्थान एक ही समय दो
व्यक्ति अलग अलग फल पाते हैं । निर्भर करता है कर्म सम्पादन की गुणवत्ता पर । इसी
प्रकार किस आत्मा को किस शरीर में किस स्थान पर किस काल में जन्म लेना होगा यह
प्रकृति का निर्धारण है । यह भी आधारित होता है आत्मा के कर्म सम्पादन की गुणवत्ता
पर । आत्मा के समस्त कर्म सम्पादन का लेखा प्रकृति संचित करती है । अगली शरीर का
निर्धारण पूर्ण रूप से लेखा के अनुसार न्यायपूर्ण होता है । इसी प्रकार मृत्यु
किसकी किस काल किस विधि और किस स्थान पर होगी यह भी पूर्णतया कर्म भोग और कर्म
सम्पादन की गुणवत्ता पर ही आधारित होती है । प्रकृति के अधीन होती है । इसी प्रकार
यश और अप-यश दोनो ही प्रकृति नियंत्रित होते हैं । वही कर्म कर एक व्यक्ति यश पाता
है और दूसरा व्यक्ति अपयश पाता है । निर्भर करता है कर्म की गुणवत्ता तथा पूर्व के
कर्मों के फलभोग किसके कैसे हैं । प्रकृति का समस्त सम्पादन होता न्यायपूर्ण ही है
। प्रकृति ब्रम्ह की सत्यनिष्ठ होती है ।
इन्ही कारणों से इस कर्म प्रधान संसार में समस्त उपलब्धि
कर्म की गुणवत्ता पर ही लम्बित होती है । कर्म प्रेरक आत्मा व्यापक प्रकृति के
मोहक स्वरूप के मध्य दायित्व निर्वाह के लिये स्थापित है । मानो तलवार की धार पर
उसे यात्रा करनी हैं । सतर्क सज्ञान पूर्वक संचालन ही यात्रा पार करेगा । अन्यथा विध्वंसक
विकल्प भोगेगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें