इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
सृष्टि की रचना में ब्रम्ह का अंश आत्मा विषय (subject) है और प्रकृति वस्तु (object) है
। परंतु ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुसार प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है इसलिये प्रकृति
कर्ता है (subject) है
और आत्मा वस्तु है (object) है
। यही परस्पर विरोधी स्थितियाँ है जिसे कि आसानी से मनुष्य ग्राह्य (concept) नहीं
कर पाता है । परिणामत: जन्म होता है त्रुटि पूर्ण कर्म का समस्त
कलह एवँ तनावपूर्ण स्थितियों का । जिस प्रकार प्रजातंत्र एक व्यवस्था है । प्रजातंत्र
का आधार उसका संविधान है । प्रजातंत्र के प्रभाव क्षेत्र में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति
व्यवस्था व उसके संविधान को पालन करने के लिये बाध्य होता है । उसी प्रकार ब्रम्ह की
व्यवस्था का नाम प्रकृति है । कर्म संविधान व्यवस्था का आधार है । प्रत्येक आत्मधारी
को उसे मानना अनिवार्य है । त्रुटि दण्डनीय होती है । यही स्वरूप है नित्य जीवन में
व्याप्त त्रास का ।
यद्यपि कि निवारण आसान है । कर्म संविधान का पालन करते
जीवन यापन किया जाय । विडम्बना उपरोक्त वर्णित विरोधी स्थितियों की है । त्रुटि पूर्ण
कर्म जैसे आम प्रचलित तरीका बना हुआ है । मनुष्य अपने इच्छा जनित कार्यों को करने का
इतना अभ्यासी हो गया है कि कर्म संविधान को स्वीकारना जैसे एक अनहोनी बात है ।
सुधार के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति की साधना को सरल बनाने
के उद्देष्य से आदि महर्षियों ने कुछ करने योग्य और त्यागने योग्य ( Do &
Do-not ) निर्धारित किये है । एक
एक कर उनकी चर्चा करता हूँ
(1) प्रकृति के किसी भी कर्म संचालन में हस्तक्षेप न बने
। ब्रम्ह की व्यापक व्यवस्था प्रकृति के असँख्य कार्य स्तर होते है । यदि कंचिद किसी
व्यक्ति विषेस को किसी स्तर की व्यवस्था से असंतोष है अथवा उसके मानसिक ढाँचे के विपरीत
है तो भी उस व्यवस्था को हस्तक्षेप न करे अथवा उसे क्षति पहुँचाने की कार्यवाही न करें
। प्रकृति अति बलशाली और साधन सम्पन्न है । वह आपके प्रयत्नों को निर्मूल भी कर देगी
और दण्डित भी करेगी त्रुटिपूर्ण कर्मों के लिये । इस स्थिति को कवि व्यक्त करता है
–
यहि तन कर फल विषय न भाई । स्वर्गहु स्वल्प अन्त दु:खदायी
॥
प्रकृति जनित संचालन विषय हैं । कंचिद उनमें तर्क के आधार
पर हस्तक्षेप वर्जित बताये गये । प्रकृतीय व्यवस्था किसी व्यक्ति विषेस अथवा समाज विषेस
को लक्ष्य कर नहीं होती । सकल मनुष्य समुदाय प्रकृति की प्रजा है । प्रकृति सभी का
पालन करती है । प्रकृति समूचे समुदाय की सेवाओं का प्रयोग कर समूचे विश्व का विकास
करती है । उस व्यवस्था के प्रति निष्ठावान होना प्रत्येक मनुष्य का शाश्वत धर्म होता
है ।
शेष अगले अंक मे - - -
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
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