इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
कर्म सुधार के लिये भक्ति पथ । भक्ति और प्रगाढ intense रूप में
प्रपत्ति की संज्ञा से निरूपित की गई । प्रपत्ति अनन्य भाव की और उत्कृष्ठ सीमा का
नाम । प्रपत्ति में साधक जिज्ञासु अपने आराध्य पर इस सीमा तक अपने को समर्पित करता
है कि यदि आराध्य ने उसकी रक्षा ना कि तो आराध्य क्षति को प्राप्त हो जावेगा ।
पूर्ण समर्पण ।
भक्ति और प्रपत्ति का अंतर समझने के लिये बंदर और
बिल्ली का उदाहरण दिया जाता है । बंदर का नवजात शिशु यदि कंचिद अपनी माँ के शरीर
से चिपट जाय तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित है । इसके विपरीत बिल्ली अपने बच्चे की
सुरक्षा के लिये उसे अपने मुँह में पकड उठाकर ले जाती है । बंदर के बच्चे को अपनी
सुरक्षा के लिये कुछ प्रयत्न करना ही पडता है अपनी माँ के शरीर से चिपटने में ।
इसके विपरीत बिल्ली का बच्चा तो कंचिद भय के निमित्त से परिचित भी नहीं होता । माँ
बिल्ली ही अपने दायित्व के रूप में अपने बच्चे के सम्भावित अहित का पूर्वानुमान कर
उसे अपने मुँह में पकड उठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाती है । दृष्टांत में बंदर की
समता भक्ति से है और बिल्ली की समता प्रपत्ति से है ।
अवतार पुरुष श्रीराम भक्त नारद मुनि को बताते हैं –
सुन
मुनि ताहि कहौं सहरोषा । भजहिं जे मोहिं तजि सकल भरोसा ॥
करहुँ
सदा तिन्हकर रखवारी । जिमि बालक
राखहिं महतारी ॥
माँ नवजात शिशु के सम्भावित कष्ट का
पूर्वानुमान कर स्वयँ उसके हित अनुरूप कष्ट निवारण का उपाय करती है । उसकी सुरक्षा
करती है । वह शिशु के सुरक्षा के लिये अपने को जिम्मेदार मानती है । यह चेतना जागृति
माँ में सृजित कहाँ से होती है ? प्रकृति उत्पन्न करती है । यह व्यापक प्रकृति सर्वभौम है । सभी प्राणी उसकी
रचना है । उत्पत्ति हैं । प्रकृति सभी की माँ है । वह सभी की हित रक्षक है । वह
सभी को समृद्धि दाता है । प्रकृति के प्रति निष्ठावान होना तो हम संतानों का
कर्तब्य है । इस निष्ठा के लिये प्रकृति हम संतानों से याचना तो करेगी नहीं । हाँ
यदि माँ के प्रति संतान लिप्सा भाव संजोयेगा तो दण्ड तो अपनी उच्छंखलता का पायेगा
ही । यदि अविद्या के प्रभाव से संतान माँ के प्रति आसक्ति अथवा स्वामित्व का भाव
मस्तिष्क में सृजित करता है तो दोषी मनुष्य है प्रकृति नहीं । प्रकृति ने तो अपना
सुंदरतम स्वरूप विस्तार विस्तृत किया है । आप चाहे उसे माँ के स्वरूप में ग्रहण कर
उसकी सेवा करो चाहे प्रेयसी समझ उससे सुख भोग की कामना करो । वह आपकी जननी भी है ।
वह आपको पोषण भी प्रदान करती है । आपकी रक्षक भी है । आप मृत्यु उपरांत उसी में
विलीन भी हो जावोगे । जन्म के पूर्व से मृत्यु उपरांत पर्यंत सभी स्थिति प्रकृति
ही है । यदि आप उसके स्वरूप और अस्तित्व से अनभिज्ञ अपने अहं को ही वर्चस्व प्रदान
कर जीवन जीना चाहते हैं तो भूल प्रकृति की नहीं । प्रकृति तो आपको स्वरूप प्रदान
कर माँ का दायित्व पूरा ही कर चुकी है । पारी तो हम संतानों की है कि हम माँ के प्रति
समर्पित हो उसकी सेवा करें । प्रकृति के प्रति निष्ठावान बने । वह हमारी जननी भी है
पोषक भी है रक्षक भी है ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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