ज्ञान (आत्मा का
स्वरूप बोध) जिसे कि अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के आवरण में ढका हुआ बताया गया है ।
ज्ञान जिसे कि प्रकृतीय संसाधनों (इंद्रियों, बुद्धि, और विवेक) की सीमा से परे बताया
गया है । ऐसे ज्ञान को पाने के जिज्ञासु प्रयत्नशील साधक द्वारा प्रयत्न किये जाने
पर कंचिद काल उसे कुछ झलक मिलती है । परंतु अनादि काल से मोंह के आवरण का जो
अभ्यास उसकी आत्मा को आच्छादित किये हुये है वह उसे पुन: उसी अज्ञान (प्रकृतीय
मोंह) की ओर फिर से वापस घसीट लेता है । इस विकट परिस्थिति के ऊपर विजय पाने के
लिये योगेश्वर श्री कृष्ण उपाय बताते हैं कि –
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: ।
गच्छंत्यपुनरावृतिं ज्ञाननिर्धूर्तकल्मषा: ।
सतत् लगातार उसी
ज्ञान (आत्मा स्वरूप) को मस्तिष्क में विचार करते हुये, अपनी समस्त विवेक शक्ति को उसी ज्ञान में पिरोये हुये, उसी ज्ञान को पाना ही अपने मस्तिष्क का लक्ष्य बनाये
हुये, उसी ज्ञान (आत्मा स्वरूप) को पाना
ही अपने समस्त समर्पण का उद्देष्य निर्धारित किये हुये, जो जिज्ञासु साधक प्रयत्न करेगा उसे एक स्थिति ऐसी मिलेगी जहाँ
पहुँच कर फिर से अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में लौटने का भय समाप्त हो जावेगा
।
योगेश्वर के
उपरोक्त कथन से बिना कहे यह पूर्णरूप से स्पष्ट सत्य प्रगट होता है कि यह एक कठिन
रस्सा कशी चलती है । ज्ञान पाने के प्रयत्नों में और पुन: अज्ञान (प्रकृतीय मोंह)
के दलदल में वापस खिंच जाने में । इसी स्थिति को विजय करने का उपाय योगेश्वर बताते
हैं कि (1) लगातार प्रयत्न, (2) मस्तिष्क में व्याप्त विचार, (3) समस्त विवेक शक्ति को प्रयोग करते हुये, (4) उसी ज्ञान (आत्मस्वरूप का बोध) को पाना अपना
लक्ष्य बनाये हुए, (5) उसी ज्ञान (आत्मस्वरूप के बोध)
को ही अपने को अर्पित किये हुये, इन समस्त पाँच को एका साथ प्रयोग
करते हुये जो साधक प्रयत्न करेगा वह एक स्थिति ऐसी हासिल करेगा कि जहाँ से उसे
वापस अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में फिर से लौटना नहीं होगा ।
तर्क द्वारा भी
योगेश्वर की उपरोक्त व्याख्या समझने योग्य है । जो व्याधि अनादि काल से ग्रसित
किये हुये है वह इतनी सरलता से तो छोडती नहीं । उसे विजय करने के लिये कठिन साधना
तो अपेक्षित होगी ही । जितना व्याधि की साख होगी उतना ही दवा की मात्रा भी तो
चाहेगी । परंतु योगेश्वर बताते हैं कि एक ऐसी स्थिति आती है कि प्रयत्न करने वाले
साधक के समस्त पिछले पाप स्वयँ उसके अपने प्रयत्नों के बल से धुल जाते हैं और वह
दलदल से बाहर निकलनेमें सफल हो जाता है ।