गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मुक्ति का साधन

ज्ञान (ब्रम्ह) का अंश आत्मा को अज्ञान (प्रकृति) के आवरण (शरीर) में रखा गया है । उद्देष्य होता है प्रकृति के प्रयोजनों की पूर्ति । प्रकृतीय गुणों के मोंहवश आत्मा अपने उद्देष्य के प्रति अचेत हो जाता है । यही मोंह उसका बंधन है । इसी बंधन के अधीन वह दु:ख भोगते इस शरीर उस शरीर की यात्रा करता है ।
मुक्ति का विचार करने पर दो पथ सम्मुख होते हैं । जिन्हे आत्मा विश्वास है उनके लिये कर्म पथ । कर्मों को सज्ञानपूर्वक करते मोंह बंधन से मुक्ति पाँवें । जिन्हे आत्मविश्वास नहीं है उनके लिये भक्ति पथ । प्रकृति की कृपा पर आश्रित होकर मुक्ति पाँवें ।

प्रकृति ही बंधन का कारण भी है । उसे ही मुक्ति का साधन बनावें । उसकी कृपा का पात्र बनकर । यदि प्रकृति आत्मा को किसी कारण मोंह बंधन में बाँधती भी है तो प्रकृति ही किसी परिस्थिति विषेस में आत्मा को मुक्ति भी देती है । प्रकृति ही बंधन का निमित्त भी है और प्रकृति ही मुक्ति का साधन भी है ।  

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

लक्ष्य करें मुक्ति

इस जीवन मृत्यु के चक्र में यात्रा करती आत्मा की इस चक्र से मुक्ति । यह तभी मिल सकेगी जब आत्मा अपने ऊपर आच्छादित प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो सकेगा । क्योंकि आत्मा उस चिर दिव्य परमात्मा में विलय के लिये उसी दशा में योग्य पात्र बनेगा जब वह अपने परमात्मा से विलगाव के समय की मौलिक स्वरूप अर्थात प्रकृतीय मोंह से मुक्त को प्राप्त कर लेगा । इस सत्य को कोई दूसरा सत्य पदस्थापित नहीं कर सकता ।
मुक्ति के लिये पथ का प्रश्न विचाराधीन होने पर गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि जिन्हे आत्मविश्वास है अपने कर्म पर नियंत्रण है उन्हे अपनाना होगा कर्म पथ । कर्म पर नियंत्रण अर्थात इच्छाजनित कर्मों का पूर्ण रूप से त्याग । परंतु यह पथ है किये जाने वाले कर्मों में कर्म फल की लिप्सा के त्याग का । सन्यास का । इसे दृढप्रतिज्ञ ही निर्वाह कर सकेगा । यह प्रवृत्ति है । कर्म करते हुये मुक्ति । इसके विपरीत निर्वृत्ति । ब्रम्ह के प्रगटस्वरूप प्रकृति सगुण ब्रम्ह की कृपा द्वारा मुक्ति । भक्ति पथ ।

दोनों ही पथों कर्म द्वारा अथवा भक्ति द्वारा एक ही लक्ष्य मुक्ति की यात्रा । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । यह लक्ष्य पर्याय है आत्मा की जन्म मृत्यु के दौर से मुक्ति । यह लक्ष्य पर्याय है चिर दिव्य ब्रम्ह के चिर आनंद में समाहित होने का । इस लक्ष्य को लक्षित करना ही जीवन का योग्य उपयोग है ।  

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

विक्षेप से मुक्त

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस मनुष्य की आत्मा समस्त प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाती है वह आवा-गवन अर्थात जन्म-मृत्य के इस समुद्र से मुक्त करदी जाती है और परम् ब्रम्ह के स्वरूप में विलीन हो जाती है ।
आत्मा जो कि परम् ब्रम्ह का ही अंश होती है । उसे प्रकृति के मध्य रखने का प्रयोजन होता है । प्रकृति के प्रयोजनों की पूर्ति ही लक्ष्य होता है । इस लक्ष्य को प्राप्त करना आदर्श आचरण होता है । आत्मा प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होकर इस लक्ष्य को पाने से च्युत होती है । यह विक्षेप ही उसको इस शरीर उस शरीर की यात्रा का निमित्त बनता है । इसलिये जो आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त होगी उसे आवागवन से मुक्ति मिलेगी । परम् ब्रम्ह के शाश्वत् पद में स्थान मिलेगा । वह चिर दिव्य शांति का भोग करेगा ।

समस्त अशांति का मूल विक्षेप है । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होना है । स्मरणीय है कि मूल स्वरूप में आत्मा ब्रम्ह की गरिमा से युक्त होता है । विक्षेप उसकी विकृति है । विकार से मुक्ति ही उसे पुन: श्रीपद में स्थान दिलाने वाला है । कर्म साधन है । 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

आराधना ध्यान समर्पण

निर्गुण ब्रम्ह का स्वरूप जाना नही जा सकता । उसके स्वरूप की कोई कल्पना नहीं की जा सकती । क्योंकि वह पूर्ण रूप से अलौकिक स्वत: अस्तित्व है । उसे जानने के समस्त उपलब्ध साधन लौकिक जगत के हैं । ऐसे में जब निर्गुण ब्रम्ह की आराधना करने का या ध्यान करने का अथवा उसके प्रति समर्पित होने का लक्ष्य मस्तिष्क में धारण कर कोई प्रयत्नशील होता है तो उसके सामने सबसे पहली और ज़टिल समस्या यह उपस्थित होती है कि वह कौन सा रूप मस्तिष्क में धारण करके उसकी आराधना करे या उसका ध्यान करे अथवा उसके प्रति समर्पित होवे । आम अभ्यास यह होता है कि किसी की आराधना करने या ध्यान करने अथवा उसके प्रति समर्पित होने के लिये उसके रूप की कोई छवि मस्तिष्क में होनी चाहिये ।

उपरोक्त के विपरीत निर्गुण ब्रम्ह के प्रकृतीय स्वरूप अर्थात सगुण ब्रम्ह की आराधना या ध्यान अथवा उसके प्रति अपने को समर्पित करने की दशा में साधक के सम्मुख मस्तिष्क में धारण करने के लिये एक निष्चित स्वरूप की छवि उपलब्ध होती है । इसलिये तुलनात्मक रूप से यह सुगम होता है । सगुण ब्रम्ह को जीव के प्रति करुणामय, दयामय, वात्सल्य भाव, रक्षक भाव के विभिन्न स्वरूपों में बताया जाता है । तद्नुसार उसकी अनेको छवियाँ प्रचलित की गई हैं । इसलिये साधक को सगुण ब्रम्ह की आराधना या ध्यान अथवा उसके प्रति समर्पित होना आसान लक्ष्य होता है ।  

रविवार, 13 अप्रैल 2014

निर्गुण सगुण

ब्रम्ह चिर दिव्य शांत स्वत: अस्तित्व है जो कि पूर्णतया अलौकिक है । इसे लौकिक जगत के ज्ञेय मानको से जाना नहीं जा सकता है ।
प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति है । रचना है । यह गुणों से युक्त है । ज्ञान के लिये सुलभ है । यही मनुष्य के लिये ज्ञेय सीमा भी है ।
योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य करने का सुझाव । कर्मयोग । यह सगुण प्रकृति की सेवा का ही सुझाव है ।
इसी प्रकृति को ही ब्रम्ह का साकार रूप मान ब्रम्ह की ही सेवा का भाव संजो कार्य में तत्पर होना ही सगुण उपासना है ।

चारो वेद इसी सगुण ब्रम्ह की अस्तूति गाते हैं । 

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

प्रकृति देव

गुरू योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुये बताते हैं
जो मनुष्य मेरे प्रकृति स्वरूप को ईश्वर के समान सम्मान मस्तिष्क में धारण कर पूर्ण समर्पण की भावना से अपने समस्त कर्मों को सेवा भाव से करता है उसे कर्मयोग की उपलब्धि होती है ।

परम् ब्रम्ह पूर्णतया अलौकिक स्वत: स्तित्व है उसका प्रगट ज्ञेय स्वरूप प्रकृति है प्रकृति भी ईश्वर तुल्य है इसमें सृजन क्षमता है, पालन क्षमता है, संहार क्षमता है वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति अपनी समस्त संतानो  जीवों को प्यार करती है उनकी हर सम्भव सहायता करती है । उन्हे अपने समस्त सुधार के प्रयत्नों में उनको सफलता प्रदान करती है । 

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

प्रकृति विज्ञान

परम् ब्रम्ह ने प्रकृति के रूप में अपने विज्ञान को प्रगट किया है । इस विज्ञान की महिमा कि यह मानों निर्गुण निर्विकार ब्रम्ह को जैसे प्रगट करता है । इस विज्ञान की महिमा कि जैसे यह कर्ता ब्रम्ह की कर्ता क्षमता को मानो प्रगट करता है । इस विज्ञान की महिमा की यह प्रकृति सृजन क्षमता, पालन क्षमता, तथा संहार की क्षमता से युक्त है । इस विज्ञान की अद्भुद क्षमता कि यह प्रकृति अपने अंदर संजोये हुये है वह क्षमता कि यह समस्त भोगों की स्वयँ भोक्ता भी है, समस्त आहुँतियों की ग्रहणकर्ता भी है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस मनुष्य को परम् ब्रम्ह के उप्रोक्त वर्णित प्रकृत विज्ञान का स्वच्छ स्वरूप दर्शन हो जाता है वह फिर अपने कर्तापन के अहंकार को मिटा ब्रम्ह की अनुभूति में ब्रम्ह की गरिमा में विलीन हो जाता है ।
इस सृष्टि में जो कुछ भी कर्म हो रहा है वह समस्त ब्रम्ह स्वयं अपने ही कर रहा है । यह प्रकृति के रूप में फैला हुआ उसका अद्बुद विज्ञान कर रहा है । ब्रम्ह ने इस विस्तृत प्रकृति की व्यापक विज्ञान क्षमता को प्रगट करने के लिये ही अपने ही अंश आत्मा को इस प्रकृति के मध्य भ्रमित होते व्यक्त किया है । जो आत्माधारक इस सत्य को अनुभव कर अपने को इस प्रकृति की कृपा के लिये प्रकृति को अर्पित कर देता है उसे प्रकृति विषेस कृपा स्वीकृत करते हुये उसके मित्र के रूप में, उसके गुरू के रूप में, उसके माता-पिता के रूप में, उसके हितैषी के रूप में उसे रक्षा कवच भी प्रदान करती है । परंतु यह समस्त कृपा उसे एक ही दशा में प्रकृति प्रदान करती है जब वह अपने प्रकृतीय मोंह रूपी व्याधि से मुक्त होने के लिये सचेष्ट होने में प्रकृति से याचना करता है । याचना भी पूर्णसमर्पण द्वारा ।

इस व्यापक प्रकृति में ब्रम्ह का व्यापक विज्ञान पिरोया है । यह दोष सृजन भी करती है । दोष का निवारण भी करती है । यह मोंहमें नचाती भी है । उबारती भी है । इससे संघर्ष करके कोई पार नहीं पा सकता । इससे पार पाने का एक ही उपाय है इसकी कृपा । जो महात्मा इसकी कृपा का पात्र बनजाता है उसे इसकी कृपा के प्रभाव से उपरोक्त विज्ञान भी विदित हो जाता है और प्रकृतीय मोंह की व्याधि से मुक्ति भी पाता है । परिणामत: वह ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति का भोग करता है । यह व्यापक प्रकृति समस्त सृष्टि की शासक है । धारक है । नियंत्रक है । मित्र भी है । गुरू भी है । माता-पिता भी है । शत्रु भी है । कृपालु होने पर सहायक भी है । यह समस्त रूप ब्रम्ह के विज्ञान की महिमा के प्रभाव से उसमें हैं । ब्रम्ह के इस व्यापक विज्ञान के कृपापात्र बन इसकी कृपा के माध्यम से ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति का भोग करें । यह योग्य मत है । 

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

परम् पद दशा

योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं
निर्मान मोंहा          जितसंग़्दोषा ।
आध्यात्मनित्या     विनिवृत्तकामा: ।
द्वंदैर्विमुक्ता:         सुखदु:खसंज्ञै ।
गर्च्छंत्यमूढा:       पदमव्ययं  तत् ।

जो लोग अभिमान और प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो गये हैं, जिन्होने इंद्रियों के विषयभोग की आसक्तियों को जीत लिया है, जिनकी सभी इच्छायें शांत हो गई हैं, जो अपने अंदर विद्यमान आत्मा में निहित ब्रम्ह की गरिमा में प्रतिपल लीन रहते हैं, जो बिना फल की आसक्ति के कर्म करने के अभ्यासी होते हैं, जो लोग सुख और दु:ख के द्वैत से मुक्त हो गये हैं, वे शाश्वत् पद दशा को प्राप्त होते हैं ।    

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

निर्वाण

योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि
जो व्यक्ति मुक्ति के लिये कटिबद्ध होकर प्रयत्नशील होता है उसे मुक्ति अवश्य मिलती है । प्रकृतीय मोंह में आसक्त होना बंधन होता है । यह मोंह की वृद्धि करता है । प्रकृतीय मोंह से मुक्त होना मोक्षहोता है । मोक्ष का उपाय बताते हुये कहते हैं
जो व्यक्ति अपने दोनों आँखों की दृष्टि को दोनों भौंहों के मध्य केंद्रित कर, दोनों नाँकों में प्रवाहित होने वाली अंदर जाने वाली तथा बाहर निकलने वाली श्वासों को सम कर, अपनी सकल इंद्रीय वासनाओं को नियंत्रित कर, अपने मस्तिष्क पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुये, इच्छाओं और क्रोध पर विजय करके प्रयत्नशील होता है उसे निर्वाण अवश्य मिलता है ।
वास्तविकता में हर प्रत्येक में सद् विचार के द्योतक देव तथा दुर्विचार के सूचक दानव दोनों ही विद्यमानरहते हैं । कौन किन विचारों अर्थात देव व दानव किसे विकसित करने के लिये वातावरण प्रदान करता है । यह अवसर उसके किये जाने वाले कर्मों द्वारा उत्पन्न होते हैं । किये जाने वाले कर्मों की प्रेरणा ग्रहण करने वाले श्रोत से पैदा होते हैं । जो व्यक्ति इन समस्त तथ्यों को जानते हुये, इन्हे अपने वश में रखते हुये प्रयत्न करेगा उसे सफलता अवश्य मिलेगी ।

बंधन ही दु:खों को प्रशस्थ करता है । मुक्ति ही आनंद को प्रशस्थ करता है । जैसा कर्म करेगें वैसा फल पायेंगे । कर्म करने की विधा को विस्तार से वर्णन किया गया । इन्हे अपनाना या त्यागना प्रत्येक की अपनी रूचि है । 

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

यति

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि,

जिन तपस्वी आत्माओं नें यतियों ने अपने आप को इच्छा और क्रोध से मुक्त कर लिया है, जिन्होने अपने मस्तिष्क को वश में कर लिया है और जिन्होने अपनी आत्मा को जान लिया है, परमात्मा का परम् आनंद ब्रम्हनिर्वाण उनके निकट ही विराजमान रहता है । वे आत्मा की चेतना में जीवन जीते रहते हैं । यहाँ इस संसार में आनंदमय जीवन का यही वास्तविक स्वरूप होता है । 

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

ब्रम्हनिर्वाण का सुपात्र


योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ब्रम्हनिर्वाण की दशा को बताने के उपरांत यह बताया कि इस दशा को पाता कौन है । ब्रम्हनिर्वाण की दशा । दशा जिसमें मनुष्य समस्त खुशियाँ अपने ही अंत:करण में निहित पाता है । दशा जिसमें समस्त खुशियों के श्रोत को मनुष्य अपने ही अंत:करण में निहित पाता है । दशा जिसमें मनुष्य अज्ञान अर्थात प्रकृतीय मोंह के अंधकार को ज्ञान अर्थात् आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा का बोध करके नष्ट कर आनंदित रहने की दशा प्राप्त करता है । ऐसे मनुष्य के लिये बताया कि ब्रम्ह के साथ एकीकरण हो जाता है । ब्रम्हनिर्वाण की दशा को प्राप्त होता है । परंतु यह दशा हर मनुष्य को तो नहीं मिल जाती है । फिर किसे मिलती है यह दशा । तो योगेश्वर कृपापूर्वक बताते हैं कि यह दशा उन मनुष्यों को प्राप्त होती है जो अपने समस्त पापों को नष्ट कर पवित्र हो चुके हैं । पाप क्या होते हैं । इच्छाजनित कार्यों को करना पाप होता है । जो मनुष्य इच्छाजनित कार्यों को करता ही नहीं है । फिर करता कौन से कर्म है । प्रकृति द्वारा आदेशित । प्रकृति द्वारा अपेक्षित । ऐसा मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है जो इच्छाजनित कार्यों को करता ही नहीं है । इच्छाजनित कार्यों को कौन नहीं करता है । जो मनुष्य योग की मस्तिष्क की दशा में अपने समस्त कार्य करता है । योगी । योगी जिसके समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं । जो प्रकृति द्वारा अपेक्षित तथा प्रकृति द्वारा आदेशित कार्यों को ही करता है । ऐसा मनुष्य योग्य पात्र बन जाता है । क्या पाने के लिये । ब्रम्हनिर्वाण की दशा । ब्रम्ह के साथ एकीकरण की दशा । ब्रम्ह को अपने अंत:करण में आत्मा के स्वरूप में प्रकाश स्तम्भ के रूप में पाना । जीवनकी सर्वाधिक उच्चतम स्थिति । आत्मा का बोध होना । यह दशा पाने का पहला प्रमाण पापरहित । इच्छाजनित कार्यों को ना करना । पहली अनिवार्य वाँक्षना । दूसरी अनिवार्य वाँक्षना जो कि पहली वाँक्षना पापरहित प्राप्त होने पर प्रतिफल के रूप में मिलेगी । सुख दु:ख के द्वंद से मुक्त । इच्छा की पूर्ति में मिलने वाला फल सुख । इच्छा के अपूर्ण रहने में मिलने वाला दु:ख । कौन इन सुख और दु:ख के द्वंद से मुक्त होगा । जो इच्छाजनित कार्यों को करेगा ही नहीं । योगी । इसप्रकार योगी सुपात्र होता है ब्रम्हनिर्वाण की दशा पाने के लिये । इस ब्रम्हनिर्वाण की दशा पाने का फल क्या होगा । वह योगी समूचे जगत के हित के लिये कार्य करने में आनंदित रहने लगेगा । इस स्थल पर यह अंकन विषय के अनुकूल होगा कि हित भौतिक सुख पहुँचाने वाली स्थितियों को पाने के लिये सहायता करने में नहीं निहित होता अपितु आत्मा का बोध कराने जिससे समस्त सुख दु:ख का द्वंद उत्पन्न करने वाला अज्ञान का अंधकार नष्ट होता है को कराने में हित होता है । ब्रम्हनिर्वाण की स्थितप्राप्त योगी ही समाज का सच्चा हितैषी होता है । 

रविवार, 6 अप्रैल 2014

ब्रम्हनिर्वाण

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जो मनुष्य अपना सुख अपने अंत:करण में निहित पाता है । जो मनुष्य समस्त खुशियाँ अपने अंत:करण में अनुभव करता है । जो मनुष्य ज्ञान को अपने अंत:करण में पिरोया अनुभव करता है । ऐसा समस्त अनुभव करने वाले मनुष्य का ब्रम्ह के साथ एकीकरण हो जाता है । ऐसे मनुष्य की दशा ब्रम्हनिर्वाण कही जाती है । ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आत्मनियंत्रण की एक परिभाष्य दशा है । यह मात्र क्षणिक अनुभव नहीं है । इस ब्रम्हनिर्वाण की दशा को प्राप्त योगी ब्रम्ह में लीन ब्रम्ह का ज्ञानी ब्रम्ह में जीवन जीता है । 

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

सुख का रहस्य

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जो इंसान अपने जीवनकाल में अपने अंत:करण में उठने वाले इच्छाओं और क्रोध के तूफान को अंकुश कर इन पर विजय प्राप्त कर सकेगा वही इस संसार में सुखपूर्वक जीवन जीयेगा । वही इंसान योगी होगा । वही इंसान ब्रम्ह की दिव्य शांति को पा सकेगा । यह सुखमय जीवन इसी वर्तमान जीवनकाल में ही जीने की कल्पना ही योग्य विचार है । इन सभी सुझाओं को इसी वर्तमान जीवन की अवधि में ही अपनाकर इसी वर्तमान जीवन को ही सुखमय बनाने हेतु हैं । यह समस्त सुझाव किसी भविष्य के जीवन अवधि के लिये नहीं हैं । समस्त अशांति दु:ख का मूल होती हैं मनुष्य की अपनी इच्छायें । इसलिये इन्ही इच्छाओं को वश में करना ही सबसे अधिक पुरुषार्थ का विषय है । इन्ही इच्छाओं पर विजय पाना ही योग्यतम प्रयत्न है । क्रोध तो प्रतिफल होता है । इच्छाओं की पूर्ति ना होने की दशा में उत्पन्न होता है । कंचिद यदि इच्छाओं को वश में कर लिया जाय तो क्रोध का जन्म ही नही होगा । इन समस्त उपलब्धियों को पाने के लिये मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास ही योग्यतम सुझाव है । 

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

दु:खों के श्रोत

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जो सुख मनुष्य प्रकृति के मोंह से पाता है वह वास्तविकता में उसके दु:ख का कारण बनता है । ऐसे सुख समय की सीमाओं से बँधे होते हैं । ऐसे सुखों का कहीं प्रारम्भ व कहीं अंत होता है । इसलिये कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे सुखों के मिलने पर हर्षित नहीं होता है । ऐसे सुख मनुष्य की अपनी इच्छाओं की पूर्ति होने पर प्राप्त होते है और उनके समाप्त हो जाने पर उनके आभाव का दु:ख उसे सताता है । इस प्रकार वे दु:ख के निमित्त बनते हैं ।   

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

ब्रम्हसुख

आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में ब्रम्ह की चिर दिव्य शांति से युक्त होता है । आत्मा की यह चिर दिव्य शांति प्रकृतीय मोंह के विकार से बाधित होती है । परिणामत: अशांति प्रगट होती है । इसलिये जो भी मनुष्य अपने को प्रकृतीय मोंह से सुरक्षित करने में सफल होगा वह अपनी आत्मा के मौलिक चिर दिव्य शांति का अनुभव कर सकेगा । ब्रम्ह के शांत स्वरूप का भोग कर सकेगा । समस्त कलह विकार पराजित होंगे । समस्त अशांति का श्रोत प्रकृतीय संसर्ग के माध्यम इंद्रीय गुणभोग होती है । इसलिये जो मनुष्य अपनी इंद्रीय गुणों के भोग की आसक्ति को विजय करने में सफल होता हैं वह आत्मा में विद्यमान चिर दिव्य शांति के रस का भोग करेगा । ब्रम्ह हमारे आपके अंदर विद्यमान है । मात्र वह व्याधियों से आच्छादित है । उस ब्रम्ह को पाने के लिये हमें कुछ भी अन्य नहीं करना है बल्कि मात्र जो व्याधियाँ उसे ढके हुये हैं उन्हे नोचकर हटा देना है । व्याधियों को हटजाने पर भोक्ता आत्मा अपने चिर दिव्य शांति का रसभोग स्वयं करेगी । यह ऐसा रस है जो कि इसी रसमें ही मिलेगा कहीं अन्यत्र नहीं । जो आत्मा अपने ही आनंद रस का भोग करेगी वह फिर प्रकृतीय मोंह की ओर प्रवृत्त नहीं होगी । ज्ञान अज्ञान के आवरण से ढका हुआ है । अज्ञान के अंधकार को ज्ञान का प्रकाश ही पराजित करेगा । 

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

ईश्वर की छवि

मस्तिष्क की दशा का नियंत्रण । कर्ता स्वरूप की धारणा । यह दो प्रधान उपलब्धियाँ हासिल करने वाला कर्मयोगी । मस्तिष्क जो कि अनुकूल परिणामों के उपलब्ध होने पर हर्ष का अनुभव ना करे । मस्तिष्क जो कि विपरीत परिणामों के उपस्थित होने पर दु:ख का अनुभव ना करे । मस्तिष्क की उपरोक्त दोनों ही दशाये नामत: अनुकूल परिणाम मिलने पर हर्षित होना तथा विपरीत परिणाम उपस्थित होने पर दु:खी होना हर प्रत्येक मनुष्य के लिये सामान्य दशायें होती हैं । परंतु मस्तिष्क की दशा जिसमें अनुकूल परिणाम से हर्ष ना हो तथा विपरीत परिणाम से दु:ख ना हो यह विषेस प्रयत्नों द्वारा ही हासिल हो सकती है । यही मस्तिष्क की दशा उत्पन्न कर कार्य करने वाला कर्मयोगी ।

कर्मयोगी की मस्तिष्क की दशा हासिल करने के लिये अनिवार्य वाँक्षना होती है कि मस्तिष्क पूर्णरूप से प्रकृति के कर्ता स्वरूप को धारण कर सके । समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । यह स्वरूप जिस मस्तिष्क में स्थापित हो जावेगा वही हासिल कर सकेगा वह दशा जिसमें कार्य के अनुकूल परिणाम से हर्ष का अनुभव ना होवे तथा कार्य के विपरीत परिणाम से दु:ख ना होवे । यह कर्ता स्वरूप धारण करने वाला ही ईश्वर के अस्तित्व का सवच्छ स्पष्ट रूप का दृष्टा होता है । वही ईश्वर के रूप में विभोर जीवन जीता है । ऐसे व्यक्ति का मस्तिष्क कभी भी किसी भी परिस्थिति में ईश्वर की क्षवि से विचलित नहीं होता है । ईश्वर की उपरोक्त छवि का दर्शन पाने वाला उसी छवि में विलीन होकर अपना जीवन जीता है । ईश्वर के उसी छवि में समा जाता है । 

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

मोंह से मुक्त

ब्रम्ह का निष्कलंक, निरंजन स्वरूप । कलंक होता है पाप । धर्म का निर्वाह ना करना पाप । अपेक्षित आचरण धर्म । निष्कलंक होना है पाप से रहित होना । जिसका समस्त आचरण धर्मवत् होवे । जिसका समस्त आचरण अपेक्षानुरूप होवे । निरंजन । प्रकृति से अछूता । प्रकृतीय मोंह से रहित । प्रकृतीय मोंह से मुक्त । यह स्वरूप है ब्रम्ह का । अपनी आत्मा में ब्रम्ह स्वरूप का बोध । प्रत्येक प्राणी में निहित आत्मा में निष्कलंक, निरंजन ब्रम्ह का दर्शन । समदर्शी । समदर्शी होगा प्रकृतीय मोंह से मुक्त ।
कार्य को करते हुये कार्य के परिणाम से सम्बंध ना रखना । सन्यास । सन्यासी होगा प्रकृतीय मोंह से मुक्त । कार्य करते हुये मस्तिष्क की दशा । कार्य के परिनाम से सम्बंध ना रखने वाली । ऐसी दशा का धारक । सन्यासी ।
कार्य के परिणाम से ना प्रभावित होने वाला । योगी । मस्तिष्क की दशा जिसमें कार्य के कर्ता के मस्तिष्क पर कार्य के परिणाम से प्रभाव ना पहुँचे । योग । कार्य करने का निमित्त स्वयँ कार्य ही होवे । योग । कार्य करते हुये कार्य के परिणाम से सम्बंध ना होवे । योग । सन्यास । योगी ही सन्यासी होता है । केवल एक ही कर्म की क्रियाकाल में अलग अलग समय पर स्थितियाँ है ।
हमारे आपके अंदर विद्यमान आत्मा । अपनी आत्मा का बोध । अपनी आत्मा में ब्रम्ह के निष्कलंक, निरंजन स्वरूप का बोध । प्रत्येक प्राणी में विद्यमान आत्मा में निष्कलंक, निरंजन ब्रम्ह का दर्शन । समदर्शी । यह सभी स्थितियाँ प्रगट करती हैं प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । मोक्ष ।

मोक्ष का साकार स्वरूप इसी जीवन को जीते हुये पाना ही एकमात्र सार्थक प्रयत्न होगा । मोक्ष की कल्पना जीवन के उपरांत करना एक भ्रम मात्र । जीवन जीते मोक्ष पाना । जीवन जीते प्रकृतीय मोंह से मुक्त होना । ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप जीवन जीना । यही योग्यतम लक्ष्य हैं जीवन जीने हेतु । चिर दिव्य शांत जीवन की कल्पना । कलह से मुक्त । द्वेष से मुक्त । द्वंद रहित । इन समस्त उपलब्धियों की एकाकी वाँक्षना । प्रकृतीय मोह से मुक्ति । 

सोमवार, 31 मार्च 2014

भेद विज्ञान

मनुष्य को जैसे जैसे प्रकृति की व्यापक शक्ति, अथवा प्रकृति की क्षणभंगुरता, अथवा अपने भ्रामक अहंकार का बोध होता है वैसे वैसे वह विनयशील होता जाता है । यह बात उसी प्रकार की है जिस प्रकार मोमबत्ती जलाने पर अंधकार की व्यापकता का बोध होता है । उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके अज्ञान का विस्तार उसके ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है । यही अनुभूति भक्ति के रूप में प्रगट होती है । भक्ति का जन्म ही होता है जब मनुष्य को यह अनुभूति व्याप्त होती है कि उसकी सक्षमता कहीं ज्यादा तुच्छ है तुलना में उसके आराध्य की शक्ति की अपेक्षा । उसके भ्रामक अहंकार का मर्दन होता है 

वास्तविक भेद होता है ब्रम्ह और प्रकृति के मध्य । प्रकृति का अस्तित्व काल की सीमा से परिभाषित होता है । इसीलिये भ्रामक होता है । इसके विपरीत ब्रम्ह का स्वरूप चिर होता है दिव्य होता है । यही भेद जब सत्य रूप में ग्राह्य हो जाता है तभी उसे भ्रामक अहंकार की अनुभूति होती है । विविधता प्रकृतीय स्वरूपों में होती है । मूल ब्रम्ह तो प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में एक ही उभयनिष्ठ स्वरूप में विद्यमान होता है । जिस मनुष्य को यह भेद का विज्ञान स्पष्ट रूप में विदित हो जाता है उसे प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में एक अविनाशी ब्रम्ह के रूप का दर्शन होने लगता है । ऐसा मनुष्य ही समदर्शी होता है । मूल ब्रम्ह का दर्शन प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में । प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में प्रगट होने वाला भेद प्रकृतीय रचना के क्षेत्र का होता है । मूल ब्रम्ह का स्वरूप प्रत्येक प्रकृतीय रूप में एक ही होता है । यह विदित होना ज्ञान है । 

रविवार, 30 मार्च 2014

साधना विधि

ज्ञान (आत्मा का स्वरूप बोध) जिसे कि अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के आवरण में ढका हुआ बताया गया है । ज्ञान जिसे कि प्रकृतीय संसाधनों (इंद्रियों, बुद्धि, और विवेक) की सीमा से परे बताया गया है । ऐसे ज्ञान को पाने के जिज्ञासु प्रयत्नशील साधक द्वारा प्रयत्न किये जाने पर कंचिद काल उसे कुछ झलक मिलती है । परंतु अनादि काल से मोंह के आवरण का जो अभ्यास उसकी आत्मा को आच्छादित किये हुये है वह उसे पुन: उसी अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) की ओर फिर से वापस घसीट लेता है । इस विकट परिस्थिति के ऊपर विजय पाने के लिये योगेश्वर श्री कृष्ण उपाय बताते हैं कि
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा:  ।
गच्छंत्यपुनरावृतिं ज्ञाननिर्धूर्तकल्मषा:      ।  
सतत् लगातार उसी ज्ञान (आत्मा स्वरूप) को मस्तिष्क में विचार करते हुये, अपनी समस्त विवेक शक्ति को उसी ज्ञान में पिरोये हुये, उसी ज्ञान को पाना ही अपने मस्तिष्क का लक्ष्य बनाये हुये, उसी ज्ञान (आत्मा स्वरूप) को पाना ही अपने समस्त समर्पण का उद्देष्य निर्धारित किये हुये, जो जिज्ञासु साधक प्रयत्न करेगा उसे एक स्थिति ऐसी मिलेगी जहाँ पहुँच कर फिर से अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में लौटने का भय समाप्त हो जावेगा ।
योगेश्वर के उपरोक्त कथन से बिना कहे यह पूर्णरूप से स्पष्ट सत्य प्रगट होता है कि यह एक कठिन रस्सा कशी चलती है । ज्ञान पाने के प्रयत्नों में और पुन: अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में वापस खिंच जाने में । इसी स्थिति को विजय करने का उपाय योगेश्वर बताते हैं कि (1) लगातार प्रयत्न, (2) मस्तिष्क में व्याप्त विचार, (3) समस्त विवेक शक्ति को प्रयोग करते हुये, (4) उसी ज्ञान (आत्मस्वरूप का बोध) को पाना अपना लक्ष्य बनाये हुए, (5) उसी ज्ञान (आत्मस्वरूप के बोध) को ही अपने को अर्पित किये हुये, इन समस्त पाँच को एका साथ प्रयोग करते हुये जो साधक प्रयत्न करेगा वह एक स्थिति ऐसी हासिल करेगा कि जहाँ से उसे वापस अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में फिर से लौटना नहीं होगा ।

तर्क द्वारा भी योगेश्वर की उपरोक्त व्याख्या समझने योग्य है । जो व्याधि अनादि काल से ग्रसित किये हुये है वह इतनी सरलता से तो छोडती नहीं । उसे विजय करने के लिये कठिन साधना तो अपेक्षित होगी ही । जितना व्याधि की साख होगी उतना ही दवा की मात्रा भी तो चाहेगी । परंतु योगेश्वर बताते हैं कि एक ऐसी स्थिति आती है कि प्रयत्न करने वाले साधक के समस्त पिछले पाप स्वयँ उसके अपने प्रयत्नों के बल से धुल जाते हैं और वह दलदल से बाहर निकलनेमें सफल हो जाता है ।  

शनिवार, 29 मार्च 2014

मुक्त आत्मा

जिस मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा का बोध उसके प्रकृतीय मोंह के ऊपर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त कर लेता है । उस मनुष्य को आत्म ज्ञान का बोध एक चमकते हुये सूर्य की भाँति अज्ञान के अंधकार को पूर्णतया समाप्त करने में सफल होता है । ऐसे मनुष्य को ब्रम्ह का साक्षात दर्शन प्रतिपल होता रहता है । ऐसे मनुष्य की आत्मा कर्तापन के अहंकार से पूर्णतया मुक्त होती है । ऐसी अहंकार मुक्त आत्मा किसी भी पाप कर्म अथवा पुण्य कर्म की कर्ता नहीं होती है । अपितु ऐसे मनुष्य की आत्मा प्रकृति दारा किये जा रहे प्रत्येक पाप कर्म या पुण्य कर्म की मात्र दृष्टा होती है । ऐसे मनुष्य की आत्मा मात्र प्रकृति द्वारा प्रेरित किये जा रहे प्रत्येक पाप कर्म अथवा पुण्य कर्म की साक्षी रहती है । ऐसी मुक्त आत्मा का धारक व्यक्ति ब्रम्ह में निवास करता है । ऐसा मनुष्य ही ब्रम्ह का जीवन जीता है ।  

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

अज्ञान का आवरण

ब्रम्ह का अंश आत्मा । ब्रम्ह की रचना प्रकृति । ब्रम्ह चिर दिव्य शांत आनंद । प्रकृति क्षणभंगुर भ्रामक विनाशी । ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय । ब्रम्ह को जानना ही ज्ञान । आत्मा की अनुभूति का होना ज्ञान है । आत्मा ना ही पाप में सम्मलित होती है और ना ही गुणों को धारण करती है । परंतु जैसा कि रचना है आत्मा भ्रामक प्रकृति के आवरण में ढकी हुई है । यही प्रकृति का भ्रामक आवरण ही अज्ञान है । इसी अज्ञान के प्रभाव से जीव समस्त दु:खो को भोग रहा है । ज्ञान पाने के लिये भ्रामक अज्ञानके आवरण को हटाना होगा । ज्ञान का प्रकाश व्याप्त हो जाने पर अज्ञान का अंधकार विलीन हो समाप्त हो जावेगा । ज्ञान पाने के लिये केवल अज्ञान के आवरण को हटाना है । प्रकृतीय मोंह को त्यागना है । 

गुरुवार, 27 मार्च 2014

कर्ता प्रकृति

आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में ना ही स्वयं किसी कार्य की कर्ता होती है और ना ही वह किसी अन्य के कार्य का माध्यम बनती है और ना ही वह कर्म के फल तथा कर्म में किसी प्रकार का सम्बंध ही जोडती है । उपरोक्त अभिव्यक्ति में प्रयुक्त अन्य के कार्य का माध्यम के व्याख्या की आवश्यकता है । अन्य कई बार मनुष्य कोई ऐसा कार्य भी करता है जिसे कि कहा जाता है कि वह किसी परवशता में कर रहा है । परवसता एक ऐसी दशा जिसका सही निरूपण अग्रेजी भाषा के शब्द hypnotism  द्वारा व्यक्त होता है । एक ऐसी दशा जो उसके वश में नहीं है परंतु वह उस दशा के अनुसार उसे पालन करने को बाध्य है । इसी स्थिति को उपरोक्त कथन में अन्य के कार्य का माध्यम द्वारा व्यक्त किया गया है । आत्मा ना ही स्वयं अपने सज्ञान में किसी कार्य की कर्ता बनती है और ना ही किसी परवसता की दशा में भी किसी कार्य की कर्ता बनती है और ना ही कार्य के परिणाम की कार्य से सम्बंध ही जोडती है । अत्मा का मौलिक स्वरूप अर्थात वह स्वरूप जिसमें वह ब्रम्ह से विलग हो प्रकृति के मध्य आत्मा के रूप में स्थापित की गई । प्रकृतीय मोंह से अछूती आत्मा । यह स्थिति आसक्त आत्मा के सुधार द्वारा भी उत्पन्न हो सकती है और मौलिक स्वरूप में तो होती ही है । प्रकृतीय मोंह से अछूती आत्मा उपरोक्तानुसार आचरण क्यों करती है क्यों कि उपरोक्त समस्त की कर्ता प्रकृति होती है । 

बुधवार, 26 मार्च 2014

नियंत्रित प्रकृति

आत्मा और प्रकृति । इन दोनो की परस्पर क्रिया द्वारा उत्पन्न होने वाला कर्म । इनमें से आत्मा ब्रम्ह का अंश । प्रकृति ब्रम्ह की रचना । आत्मा प्रकृतीय शरीर के सभी अंगों की ज्ञान सीमा से परे । जो कुछ भी नियंत्रण संयम सम्भव हो सकता है वह प्रकृतीय क्षेत्र में ही हो सकता है । प्रकृतीय अंगों में सर्वाधिक सक्षम मस्तिष्क । इसलिये जो मनुष्य अपने मस्तिष्क को नियंत्रित व संयमित रख कार्य को बिना फल की आकाँक्षा किये करने में सफल हो सकता है वही शांतिपूर्ण आनंद का जीवन यापन कर सकता है ।

उपरोक्त वर्णित जीवन ही आदर्श जीवन होगा । आत्मा प्रकृतीय संसर्ग में रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते अपने मूल स्वरूप को दागी बना लेता है । जबकि होना यह चाहिये कि जिस मालिक नें अपना अंग ही प्रकृति को दिया वह मूल स्वरूप में ही कायम रहना चाहिये । इस वाँक्षना की पूर्ति तभी सम्भव हो सकती है जब प्रकृति को नियंत्रित संयमित रखा जा सके । 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

मोंह तथा मोक्ष

वह मनुष्य जिसने अपनी आत्मा का बोध कर आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा के अनुरूप आचरण में प्रवृत्त करते हुये कार्य के फल के प्रति विरक्ति रखते हुये अपने कार्यों को करता है वह प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर शांत आनंदमय जीवन का भोग करता है । इसके विपरीत जो मनुष्य आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा के प्रति अचेत रहते हुये कार्य में प्रवृत्त करता है वह इच्छाओं के वेग से ग्रसित होकर फल की कामना से कार्यों को करने को प्रवृत्त होता है । परिणामत: वह प्रकृतीय मोंह में बँधता है ।

वस्तुत: मोक्ष अथवा बंधन यह दोनो ही दशाये कार्य में प्रवृत्त होने के निमित्त से और कार्य सम्पादन काल में मस्तिष्क की स्थिति से सम्बंधित होती हैं । कार्य में प्रवृत्त होने का निमित्त यदि इच्छाओं की पूर्ति करना है तो निश्चय ही प्रकृतीय मोंह में वृद्धि होगी । इसके विपरीत यदि कार्य में प्रवृत्त होने का निमित्त प्रकृतीय आदेशों की पूर्ति और आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा का निर्वाह है तो मोह से मुक्ति मिलेगी । कार्य के फल की इच्छा ही बंधन होता है । यह उसी दशा में समाप्त हो सकता है जब कि कार्य करने का निमित्त आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा की मर्यादानुसार निर्धारित किया जाय ।  

सोमवार, 24 मार्च 2014

मस्तिष्क

मनुष्य का मस्तिष्क जो कि एक प्रकृतीय रचना है और समस्त इंद्रियों के कार्य संचालन नियंत्रण का केंद्र है । यह मस्तिष्क अपनी कार्य प्रणाली के विज्ञान द्वारा मनुष्य को अच्छे बुरे कार्यों में प्रवृत्त करता है । इन्ही कारणों से योग की मस्तिष्क की अवस्था का जो भी वृतांत प्रस्तुत किया गया है उसमें समस्त सुझाव इसी मस्तिष्क के मर्यादित व नियंत्रित प्रयोग के लिये सारी अनुशंसाये की गई हैं । मनुष्य के कर्म को यथा वाँक्षित से विचलित पर्यंत जो भी भटकाव उत्पन्न होते हैं उनके कारणों का शोध करने पर यह पाया गया कि मस्तिष्क में व्याप्त फल की इच्छायें और कर्तापन का अहंकार ये दो अवयव सर्वाधिक निमित्त प्रमाणित होते है । इन्ही कारणों से त्रुटिपूर्ण कर्मों के सुधार के विचार में जो भी अनुशंसाये की गई हैं वह इच्छाओं के शमन और कर्तापन के अहंकार के मर्दन को लक्ष्य करके ही की गई है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मनुष्य अपने कर्म में सम्मलित होने वाले समस्त अंगों यथा इंद्रियाँ मस्तिष्क हृदय को यंत्रवत् प्रयोग कर सके अर्थात किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से रहित वह मनुष्य जो भी कर्म करेगा वह पाप रहित होगा । इच्छाये पूर्वाग्रह के रूप में ही विद्यमान रहती हैं । इसी लक्ष्य को पाने के लिये योग की अवस्था में कार्य का अभ्यास । इन समस्त प्रयत्नों का फल होता है आत्मा का शुद्धिकरण । कर्म सुधार । 

रविवार, 23 मार्च 2014

मोंह से मुक्ति

जो मनुष्य प्रकृतीय मोंह से पूर्णतया मुक्त होकर अपने कर्मों को प्रकृति को समर्पित कर करता है उससे कोई पाप नहीं होता है । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति के लिये कार्यों को योग की दशा में करने का अभ्यास । मोंह से मुक्ति पाकर किये जाने वाले कर्म सन्यास की स्थिति को प्राप्त कराते है । मोहासक्त आत्मा को मोंह से मुक्त कराना ही अभीष्ट होता है । मोक्ष ही शांति की आनंदमय स्थिति की प्राप्ति है । इस प्रकार मोहासक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति कराने के लिये योग । योग को पाने के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप की ग्राह्यता । यह सभी परस्पर सम्बद्ध स्थितियाँ हैं । सभी का सम्बंध मस्तिष्क की यथास्थिति से है । कार्यों को करते हुये अपने को उन्नति के पथ पर बढाने के लिये कार्यों को सही ढंग से करने का अभ्यास । कार्यों को करने के लिये प्रेरणा ग्रहण करने का श्रोत का सही चयन । कार्यों को करने के निमित्त का निर्धारण स्थल । इन तीनो के सही चयन और क्रियांवन द्वारा मिलेगी मुक्ति । आसक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति । 

शनिवार, 22 मार्च 2014

अहंकार

ज्ञानीजन जिन्हे कि अपनी आत्मा का अनुभव हो गया है और जो आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा और मर्यादा को चरितार्थ करते हुये जीवन जीते हैं वह अपने को कंचिद छोटे से छोटे कार्य यथा सांस लेना, सूघना, सुनना, स्वाद का अनुभव करना आदि के लिये भी अपने को कर्ता नहीं मानते हैं । ऐसे ज्ञानीजन ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप प्रकृति को कर्ता मानते हुये अपने को सेवक के रूप में समस्त कर्मों को करते हैं । उनका मानना होता है कि प्रत्येक इंद्रिय अपने वस्तु के द्वारा पूर्णरूप से वश में की हुई है ।

उपरोक्त के विपरीत अहंकारी व्यक्ति अपने को समस्त कर्मों का कर्ता मानते हैं । जबकि उनके अहंकार का आधार पूर्णरूप से प्रकृति निर्मित क्षणभंगुर पल पल बदलने वाले अवयवों पर लम्बित होता है । इसलिये पूर्णरूप से भ्रामक होता है । अहंकार के बाह्य स्वरूप अथवा उसके परम् अंत:करण में भी कोई स्थायी अंश नहीं होता है । इसके बावज़ूद अहंकारी व्यक्ति सर्वथा कर्तापन के भ्रम से ओतप्रोत रहता है ।     

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

दागी कर्म

कर्म जिन्हे करते हुये मस्तिष्क में किसी फल विषेस की कामना विद्यमान रहे वे कर्म आत्मा को प्रकृतीय मोंह की ओर प्रवृत्त करने वाले होते हैं । ऐसे कर्म सत्कर्म नहीं कहे जावेंगे । इन्हे करने से आसक्ति की वृद्धि होती है । सच्चा कर्म वह होता है जिसे करते हुये मस्तिष्क में कर्म के फल के प्रति लिप्सा ना विद्यमान रहे । योगावस्था में किये जाने वाले कर्मों के विचार में भी सत्कर्म का चयन आवश्यक होता है । सत्कर्म मुक्ति प्रवृत्त करते हैं । दागी कर्म मोंह प्रवृत्त करने वाले होते है । सन्यास कर्मों का त्याग नहीं होता । कर्म करते हुये कर्मके फल की कामना ना करना सन्यास होता है । प्रकृति द्वारा आरोपित कर्म सत्कर्म होते है । इच्छा की पुष्टि में किया जानेवाला कर्म दागी होता है । योगावस्था में सत्कर्मों को करना आत्मा को जानने के तुल्य होता है । 

गुरुवार, 20 मार्च 2014

कर्ता प्रकृति

कर्मफल की इच्छा ना रखते हुये कर्म करना सन्यास है । यद्यपि कि इसे कर्मयोग के समान ही फलप्रद बताया गया है । परंतु सन्यास बिना सफल कर्मयोगी बने हासिल नहीं किया जा सकता । इसा प्रकार प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को मोंह से मुक्त कराने के प्रयत्नों में योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास मूल वाँक्षना है । योग की मस्तिष्क की दशा सतत् उपलब्ध रहे इसके लिये मस्तिष्क और विवेक में प्रकृति के कर्ता स्वरूप का स्वक्ष चित्र उपस्थित रहे और इस स्वरूप के प्रति पूर्ण निष्ठा विद्यमान रहे । यह क्रम है जिसमें आत्मा के उत्थान अर्थात प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को ग्रसित करने वाली व्याधि मोंह से मुक्त कराने के प्रयत्नों को करने से सफलता मिलेगी । आत्मा को मोंह से मुक्त कराने का परिणाम होगा दिव्य शांति आनंद की उपलब्धि । 

बुधवार, 19 मार्च 2014

योगी सन्यासी

सच्चा सन्यासी वह है जो हर प्रत्येक कार्य को बिना फल की आकाँक्षा के करता है । सच्चा कर्म वह है जिसमें कर्म करने की आसक्ति ना होवे ।
योग की अवस्था में कार्य को करने का अभ्यास व सन्यासी दोनों ही एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये दो रास्ते है । दोनों ही मस्तिष्क की एक विषेस दशा है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य के परिणाम से कोई प्रभाव ना पडे योग है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य को करते हुये कार्य के परिणाम की कोई आकाँक्षा ना रहे सन्यास है । एक ही कार्य को एक मूर्ख और एक ज्ञानी दोनों करते हैं । बाह्य शरीर के अंगों की कार्य में भागीदारी दोनों ही की एक समान होती है । अंतर दोनों के मस्तिष्क की दशा का होता है । ज्ञानी उसी कार्य को कार्य है कार्य करने के लिये हमारा जन्म हुआ है इसलिये कार्य करेगा । मूर्ख उसी कार्य को अपने मस्तिष्क में विद्यमान किसी इच्छा की पूर्ति के लिये करेगा ।

कार्य की कर्ता प्रकृति होती है । परंतु बिना आत्मा के सम्मलित हुये कोई कार्य सम्भव ही नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा नित्य कर्ता है । यह चित्र जितना ही स्वच्छ रूप से मस्तिष्क में जो धारण कर सकेगा वही धारक योगी होगा वही धारक सन्यासी होगा । योगी अथवा सन्यासी यह संज्ञाये एक निष्ठावान चरित्रवान शिष्ट आचरण वाले मनुष्य के लिये है । एक कर्मनिष्ठ को प्रदान की जाने वाली उपाधियाँ हैं । 

मंगलवार, 18 मार्च 2014

सन्यास

कार्य करते हुये कार्य के परिणाम से लिप्सा ना रखना सन्यास । कार्य को योग की अवस्था में मस्तिष्क को रखते हुये करना कर्मयोग । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को मोंह से मुक्ति दिला उसे अपने ब्रम्ह स्वरूप में वापस स्थापित करने के प्रयत्नों में । यह दोनो ही एक ही समान फल पैदा करते हैं । आत्मा जो कि ब्रम्ह का अंश होता है । प्रकृतीय संसर्ग में रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते वह प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । कर्म की उत्पत्ति आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा होती है । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा द्वारा सृजित कर्म दोषपूर्ण हो जाते हैं । कर्म दोष के निवारण के विचार में कर्मों को करते हुये कर्मदोष का निवारण पथ कर्मयोग सन्यास ।