योगेश्वर श्रीकृष्ण
कहते हैं
निर्मान मोंहा जितसंग़्दोषा ।
आध्यात्मनित्या
विनिवृत्तकामा: ।
द्वंदैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै ।
गर्च्छंत्यमूढा: पदमव्ययं
तत् ।
जो लोग अभिमान
और प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो गये हैं, जिन्होने इंद्रियों के विषयभोग की आसक्तियों को जीत लिया है, जिनकी सभी इच्छायें शांत हो गई हैं, जो अपने अंदर विद्यमान आत्मा में निहित ब्रम्ह की
गरिमा में प्रतिपल लीन रहते हैं, जो बिना फल की आसक्ति के कर्म
करने के अभ्यासी होते हैं, जो लोग सुख और दु:ख के द्वैत से
मुक्त हो गये हैं, वे शाश्वत् पद दशा को प्राप्त
होते हैं ।
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