ज्ञान (ब्रम्ह) का अंश आत्मा को
अज्ञान (प्रकृति) के आवरण (शरीर) में रखा गया है । उद्देष्य होता है प्रकृति के
प्रयोजनों की पूर्ति । प्रकृतीय गुणों के मोंहवश आत्मा अपने उद्देष्य के प्रति
अचेत हो जाता है । यही मोंह उसका बंधन है । इसी बंधन के अधीन वह दु:ख भोगते इस
शरीर उस शरीर की यात्रा करता है ।
मुक्ति का विचार करने पर दो पथ
सम्मुख होते हैं । जिन्हे आत्मा विश्वास है उनके लिये कर्म पथ । कर्मों को
सज्ञानपूर्वक करते मोंह बंधन से मुक्ति पाँवें । जिन्हे आत्मविश्वास नहीं है उनके
लिये भक्ति पथ । प्रकृति की कृपा पर आश्रित होकर मुक्ति पाँवें ।
प्रकृति ही बंधन का कारण भी है ।
उसे ही मुक्ति का साधन बनावें । उसकी कृपा का पात्र बनकर । यदि प्रकृति आत्मा को
किसी कारण मोंह बंधन में बाँधती भी है तो प्रकृति ही किसी परिस्थिति विषेस में
आत्मा को मुक्ति भी देती है । प्रकृति ही बंधन का निमित्त भी है और प्रकृति ही
मुक्ति का साधन भी है ।
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