इस जीवन मृत्यु के चक्र में यात्रा
करती आत्मा की इस चक्र से मुक्ति । यह तभी मिल सकेगी जब आत्मा अपने ऊपर आच्छादित
प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो सकेगा । क्योंकि आत्मा उस चिर दिव्य परमात्मा में विलय
के लिये उसी दशा में योग्य पात्र बनेगा जब वह अपने परमात्मा से विलगाव के समय की
मौलिक स्वरूप अर्थात प्रकृतीय मोंह से मुक्त को प्राप्त कर लेगा । इस सत्य को कोई
दूसरा सत्य पदस्थापित नहीं कर सकता ।
मुक्ति के लिये पथ का प्रश्न
विचाराधीन होने पर गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि जिन्हे आत्मविश्वास है
अपने कर्म पर नियंत्रण है उन्हे अपनाना होगा कर्म पथ । कर्म पर नियंत्रण अर्थात
इच्छाजनित कर्मों का पूर्ण रूप से त्याग । परंतु यह पथ है किये जाने वाले कर्मों
में कर्म फल की लिप्सा के त्याग का । सन्यास का । इसे दृढप्रतिज्ञ ही निर्वाह कर
सकेगा । यह प्रवृत्ति है । कर्म करते हुये मुक्ति । इसके विपरीत निर्वृत्ति ।
ब्रम्ह के प्रगटस्वरूप प्रकृति सगुण ब्रम्ह की कृपा द्वारा मुक्ति । भक्ति पथ ।
दोनों ही पथों कर्म द्वारा अथवा
भक्ति द्वारा एक ही लक्ष्य मुक्ति की यात्रा । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । यह
लक्ष्य पर्याय है आत्मा की जन्म मृत्यु के दौर से मुक्ति । यह लक्ष्य पर्याय है
चिर दिव्य ब्रम्ह के चिर आनंद में समाहित होने का । इस लक्ष्य को लक्षित करना ही
जीवन का योग्य उपयोग है ।
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