योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने बताया कि जो इंसान अपने जीवनकाल में अपने अंत:करण में उठने वाले
इच्छाओं और क्रोध के तूफान को अंकुश कर इन पर विजय प्राप्त कर सकेगा वही इस संसार
में सुखपूर्वक जीवन जीयेगा । वही इंसान योगी होगा । वही इंसान ब्रम्ह की दिव्य
शांति को पा सकेगा । यह सुखमय जीवन इसी वर्तमान जीवनकाल में ही जीने की कल्पना ही
योग्य विचार है । इन सभी सुझाओं को इसी वर्तमान जीवन की अवधि में ही अपनाकर इसी
वर्तमान जीवन को ही सुखमय बनाने हेतु हैं । यह समस्त सुझाव किसी भविष्य के जीवन
अवधि के लिये नहीं हैं । समस्त अशांति दु:ख का मूल होती हैं मनुष्य की अपनी
इच्छायें । इसलिये इन्ही इच्छाओं को वश में करना ही सबसे अधिक पुरुषार्थ का विषय
है । इन्ही इच्छाओं पर विजय पाना ही योग्यतम प्रयत्न है । क्रोध तो प्रतिफल होता
है । इच्छाओं की पूर्ति ना होने की दशा में उत्पन्न होता है । कंचिद यदि इच्छाओं
को वश में कर लिया जाय तो क्रोध का जन्म ही नही होगा । इन समस्त उपलब्धियों को
पाने के लिये मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास ही योग्यतम
सुझाव है ।
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