योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने ब्रम्हनिर्वाण की दशा को बताने के उपरांत यह बताया कि इस दशा को पाता
कौन है । ब्रम्हनिर्वाण की दशा । दशा जिसमें मनुष्य समस्त खुशियाँ अपने ही अंत:करण
में निहित पाता है । दशा जिसमें समस्त खुशियों के श्रोत को मनुष्य अपने ही अंत:करण
में निहित पाता है । दशा जिसमें मनुष्य अज्ञान अर्थात प्रकृतीय मोंह के अंधकार को
ज्ञान अर्थात् आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा का बोध करके नष्ट कर आनंदित रहने की दशा
प्राप्त करता है । ऐसे मनुष्य के लिये बताया कि ब्रम्ह के साथ एकीकरण हो जाता है ।
ब्रम्हनिर्वाण की दशा को प्राप्त होता है । परंतु यह दशा हर मनुष्य को तो नहीं मिल
जाती है । फिर किसे मिलती है यह दशा । तो योगेश्वर कृपापूर्वक बताते हैं कि यह दशा
उन मनुष्यों को प्राप्त होती है जो अपने समस्त पापों को नष्ट कर पवित्र हो चुके
हैं । पाप क्या होते हैं । इच्छाजनित कार्यों को करना पाप होता है । जो मनुष्य
इच्छाजनित कार्यों को करता ही नहीं है । फिर करता कौन से कर्म है । प्रकृति द्वारा
आदेशित । प्रकृति द्वारा अपेक्षित । ऐसा मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है जो
इच्छाजनित कार्यों को करता ही नहीं है । इच्छाजनित कार्यों को कौन नहीं करता है ।
जो मनुष्य योग की मस्तिष्क की दशा में अपने समस्त कार्य करता है । योगी । योगी जिसके
समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं । जो प्रकृति द्वारा अपेक्षित तथा प्रकृति द्वारा
आदेशित कार्यों को ही करता है । ऐसा मनुष्य योग्य पात्र बन जाता है । क्या पाने के
लिये । ब्रम्हनिर्वाण की दशा । ब्रम्ह के साथ एकीकरण की दशा । ब्रम्ह को अपने अंत:करण
में आत्मा के स्वरूप में प्रकाश स्तम्भ के रूप में पाना । जीवनकी सर्वाधिक उच्चतम
स्थिति । आत्मा का बोध होना । यह दशा पाने का पहला प्रमाण “ पापरहित “ । इच्छाजनित कार्यों को ना करना । पहली अनिवार्य वाँक्षना । दूसरी अनिवार्य
वाँक्षना जो कि पहली वाँक्षना “ पापरहित “ प्राप्त होने पर प्रतिफल के रूप में मिलेगी । सुख दु:ख के
द्वंद से मुक्त । इच्छा की पूर्ति में मिलने वाला फल सुख । इच्छा के अपूर्ण रहने
में मिलने वाला दु:ख । कौन इन सुख और दु:ख के द्वंद से मुक्त होगा । जो इच्छाजनित कार्यों
को करेगा ही नहीं । योगी । इसप्रकार योगी सुपात्र होता है ब्रम्हनिर्वाण की दशा
पाने के लिये । इस ब्रम्हनिर्वाण की दशा पाने का फल क्या होगा । वह योगी समूचे जगत
के हित के लिये कार्य करने में आनंदित रहने लगेगा । इस स्थल पर यह अंकन विषय के
अनुकूल होगा कि हित भौतिक सुख पहुँचाने वाली स्थितियों को पाने के लिये सहायता
करने में नहीं निहित होता अपितु आत्मा का बोध कराने जिससे समस्त सुख दु:ख का द्वंद
उत्पन्न करने वाला अज्ञान का अंधकार नष्ट होता है को कराने में हित होता है ।
ब्रम्हनिर्वाण की स्थितप्राप्त योगी ही समाज का सच्चा हितैषी होता है ।
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