योगेश्वर
श्रीकृष्ण बताये कि –
जो व्यक्ति
मुक्ति के लिये कटिबद्ध होकर प्रयत्नशील होता है उसे मुक्ति अवश्य मिलती है । प्रकृतीय
मोंह में आसक्त होना बंधन होता है । यह मोंह की वृद्धि करता है । प्रकृतीय मोंह से
मुक्त होना मोक्षहोता है । मोक्ष का उपाय बताते हुये कहते हैं –
जो व्यक्ति अपने
दोनों आँखों की दृष्टि को दोनों भौंहों के मध्य केंद्रित कर, दोनों नाँकों में प्रवाहित होने वाली अंदर जाने वाली
तथा बाहर निकलने वाली श्वासों को सम कर, अपनी सकल इंद्रीय वासनाओं को नियंत्रित कर, अपने मस्तिष्क पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुये, इच्छाओं और क्रोध पर विजय करके प्रयत्नशील होता है
उसे निर्वाण अवश्य मिलता है ।
वास्तविकता में
हर प्रत्येक में सद् विचार के द्योतक देव तथा दुर्विचार के सूचक दानव दोनों ही
विद्यमानरहते हैं । कौन किन विचारों अर्थात देव व दानव किसे विकसित करने के लिये
वातावरण प्रदान करता है । यह अवसर उसके किये जाने वाले कर्मों द्वारा उत्पन्न होते
हैं । किये जाने वाले कर्मों की प्रेरणा ग्रहण करने वाले श्रोत से पैदा होते हैं ।
जो व्यक्ति इन समस्त तथ्यों को जानते हुये, इन्हे अपने वश में रखते हुये प्रयत्न करेगा उसे सफलता
अवश्य मिलेगी ।
बंधन ही दु:खों
को प्रशस्थ करता है । मुक्ति ही आनंद को प्रशस्थ करता है । जैसा कर्म करेगें वैसा
फल पायेंगे । कर्म करने की विधा को विस्तार से वर्णन किया गया । इन्हे अपनाना या
त्यागना प्रत्येक की अपनी रूचि है ।
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