गुरू योगेश्वर
श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुये बताते हैं –
जो मनुष्य मेरे
प्रकृति स्वरूप को ईश्वर के समान सम्मान मस्तिष्क में धारण कर पूर्ण समर्पण की
भावना से अपने समस्त कर्मों को सेवा भाव से करता है उसे कर्मयोग की उपलब्धि होती
है ।
परम् ब्रम्ह पूर्णतया अलौकिक स्वत: स्तित्व है । उसका प्रगट ज्ञेय स्वरूप प्रकृति है । प्रकृति भी ईश्वर तुल्य है । इसमें सृजन क्षमता है, पालन क्षमता है, संहार क्षमता है । वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति अपनी समस्त संतानो जीवों को प्यार करती है उनकी हर सम्भव सहायता
करती है । उन्हे अपने समस्त सुधार के प्रयत्नों में उनको सफलता प्रदान करती है ।
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