सोमवार, 31 मार्च 2014

भेद विज्ञान

मनुष्य को जैसे जैसे प्रकृति की व्यापक शक्ति, अथवा प्रकृति की क्षणभंगुरता, अथवा अपने भ्रामक अहंकार का बोध होता है वैसे वैसे वह विनयशील होता जाता है । यह बात उसी प्रकार की है जिस प्रकार मोमबत्ती जलाने पर अंधकार की व्यापकता का बोध होता है । उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके अज्ञान का विस्तार उसके ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है । यही अनुभूति भक्ति के रूप में प्रगट होती है । भक्ति का जन्म ही होता है जब मनुष्य को यह अनुभूति व्याप्त होती है कि उसकी सक्षमता कहीं ज्यादा तुच्छ है तुलना में उसके आराध्य की शक्ति की अपेक्षा । उसके भ्रामक अहंकार का मर्दन होता है 

वास्तविक भेद होता है ब्रम्ह और प्रकृति के मध्य । प्रकृति का अस्तित्व काल की सीमा से परिभाषित होता है । इसीलिये भ्रामक होता है । इसके विपरीत ब्रम्ह का स्वरूप चिर होता है दिव्य होता है । यही भेद जब सत्य रूप में ग्राह्य हो जाता है तभी उसे भ्रामक अहंकार की अनुभूति होती है । विविधता प्रकृतीय स्वरूपों में होती है । मूल ब्रम्ह तो प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में एक ही उभयनिष्ठ स्वरूप में विद्यमान होता है । जिस मनुष्य को यह भेद का विज्ञान स्पष्ट रूप में विदित हो जाता है उसे प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में एक अविनाशी ब्रम्ह के रूप का दर्शन होने लगता है । ऐसा मनुष्य ही समदर्शी होता है । मूल ब्रम्ह का दर्शन प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में । प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में प्रगट होने वाला भेद प्रकृतीय रचना के क्षेत्र का होता है । मूल ब्रम्ह का स्वरूप प्रत्येक प्रकृतीय रूप में एक ही होता है । यह विदित होना ज्ञान है । 

रविवार, 30 मार्च 2014

साधना विधि

ज्ञान (आत्मा का स्वरूप बोध) जिसे कि अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के आवरण में ढका हुआ बताया गया है । ज्ञान जिसे कि प्रकृतीय संसाधनों (इंद्रियों, बुद्धि, और विवेक) की सीमा से परे बताया गया है । ऐसे ज्ञान को पाने के जिज्ञासु प्रयत्नशील साधक द्वारा प्रयत्न किये जाने पर कंचिद काल उसे कुछ झलक मिलती है । परंतु अनादि काल से मोंह के आवरण का जो अभ्यास उसकी आत्मा को आच्छादित किये हुये है वह उसे पुन: उसी अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) की ओर फिर से वापस घसीट लेता है । इस विकट परिस्थिति के ऊपर विजय पाने के लिये योगेश्वर श्री कृष्ण उपाय बताते हैं कि
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा:  ।
गच्छंत्यपुनरावृतिं ज्ञाननिर्धूर्तकल्मषा:      ।  
सतत् लगातार उसी ज्ञान (आत्मा स्वरूप) को मस्तिष्क में विचार करते हुये, अपनी समस्त विवेक शक्ति को उसी ज्ञान में पिरोये हुये, उसी ज्ञान को पाना ही अपने मस्तिष्क का लक्ष्य बनाये हुये, उसी ज्ञान (आत्मा स्वरूप) को पाना ही अपने समस्त समर्पण का उद्देष्य निर्धारित किये हुये, जो जिज्ञासु साधक प्रयत्न करेगा उसे एक स्थिति ऐसी मिलेगी जहाँ पहुँच कर फिर से अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में लौटने का भय समाप्त हो जावेगा ।
योगेश्वर के उपरोक्त कथन से बिना कहे यह पूर्णरूप से स्पष्ट सत्य प्रगट होता है कि यह एक कठिन रस्सा कशी चलती है । ज्ञान पाने के प्रयत्नों में और पुन: अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में वापस खिंच जाने में । इसी स्थिति को विजय करने का उपाय योगेश्वर बताते हैं कि (1) लगातार प्रयत्न, (2) मस्तिष्क में व्याप्त विचार, (3) समस्त विवेक शक्ति को प्रयोग करते हुये, (4) उसी ज्ञान (आत्मस्वरूप का बोध) को पाना अपना लक्ष्य बनाये हुए, (5) उसी ज्ञान (आत्मस्वरूप के बोध) को ही अपने को अर्पित किये हुये, इन समस्त पाँच को एका साथ प्रयोग करते हुये जो साधक प्रयत्न करेगा वह एक स्थिति ऐसी हासिल करेगा कि जहाँ से उसे वापस अज्ञान (प्रकृतीय मोंह) के दलदल में फिर से लौटना नहीं होगा ।

तर्क द्वारा भी योगेश्वर की उपरोक्त व्याख्या समझने योग्य है । जो व्याधि अनादि काल से ग्रसित किये हुये है वह इतनी सरलता से तो छोडती नहीं । उसे विजय करने के लिये कठिन साधना तो अपेक्षित होगी ही । जितना व्याधि की साख होगी उतना ही दवा की मात्रा भी तो चाहेगी । परंतु योगेश्वर बताते हैं कि एक ऐसी स्थिति आती है कि प्रयत्न करने वाले साधक के समस्त पिछले पाप स्वयँ उसके अपने प्रयत्नों के बल से धुल जाते हैं और वह दलदल से बाहर निकलनेमें सफल हो जाता है ।  

शनिवार, 29 मार्च 2014

मुक्त आत्मा

जिस मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा का बोध उसके प्रकृतीय मोंह के ऊपर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त कर लेता है । उस मनुष्य को आत्म ज्ञान का बोध एक चमकते हुये सूर्य की भाँति अज्ञान के अंधकार को पूर्णतया समाप्त करने में सफल होता है । ऐसे मनुष्य को ब्रम्ह का साक्षात दर्शन प्रतिपल होता रहता है । ऐसे मनुष्य की आत्मा कर्तापन के अहंकार से पूर्णतया मुक्त होती है । ऐसी अहंकार मुक्त आत्मा किसी भी पाप कर्म अथवा पुण्य कर्म की कर्ता नहीं होती है । अपितु ऐसे मनुष्य की आत्मा प्रकृति दारा किये जा रहे प्रत्येक पाप कर्म या पुण्य कर्म की मात्र दृष्टा होती है । ऐसे मनुष्य की आत्मा मात्र प्रकृति द्वारा प्रेरित किये जा रहे प्रत्येक पाप कर्म अथवा पुण्य कर्म की साक्षी रहती है । ऐसी मुक्त आत्मा का धारक व्यक्ति ब्रम्ह में निवास करता है । ऐसा मनुष्य ही ब्रम्ह का जीवन जीता है ।  

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

अज्ञान का आवरण

ब्रम्ह का अंश आत्मा । ब्रम्ह की रचना प्रकृति । ब्रम्ह चिर दिव्य शांत आनंद । प्रकृति क्षणभंगुर भ्रामक विनाशी । ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय । ब्रम्ह को जानना ही ज्ञान । आत्मा की अनुभूति का होना ज्ञान है । आत्मा ना ही पाप में सम्मलित होती है और ना ही गुणों को धारण करती है । परंतु जैसा कि रचना है आत्मा भ्रामक प्रकृति के आवरण में ढकी हुई है । यही प्रकृति का भ्रामक आवरण ही अज्ञान है । इसी अज्ञान के प्रभाव से जीव समस्त दु:खो को भोग रहा है । ज्ञान पाने के लिये भ्रामक अज्ञानके आवरण को हटाना होगा । ज्ञान का प्रकाश व्याप्त हो जाने पर अज्ञान का अंधकार विलीन हो समाप्त हो जावेगा । ज्ञान पाने के लिये केवल अज्ञान के आवरण को हटाना है । प्रकृतीय मोंह को त्यागना है । 

गुरुवार, 27 मार्च 2014

कर्ता प्रकृति

आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में ना ही स्वयं किसी कार्य की कर्ता होती है और ना ही वह किसी अन्य के कार्य का माध्यम बनती है और ना ही वह कर्म के फल तथा कर्म में किसी प्रकार का सम्बंध ही जोडती है । उपरोक्त अभिव्यक्ति में प्रयुक्त अन्य के कार्य का माध्यम के व्याख्या की आवश्यकता है । अन्य कई बार मनुष्य कोई ऐसा कार्य भी करता है जिसे कि कहा जाता है कि वह किसी परवशता में कर रहा है । परवसता एक ऐसी दशा जिसका सही निरूपण अग्रेजी भाषा के शब्द hypnotism  द्वारा व्यक्त होता है । एक ऐसी दशा जो उसके वश में नहीं है परंतु वह उस दशा के अनुसार उसे पालन करने को बाध्य है । इसी स्थिति को उपरोक्त कथन में अन्य के कार्य का माध्यम द्वारा व्यक्त किया गया है । आत्मा ना ही स्वयं अपने सज्ञान में किसी कार्य की कर्ता बनती है और ना ही किसी परवसता की दशा में भी किसी कार्य की कर्ता बनती है और ना ही कार्य के परिणाम की कार्य से सम्बंध ही जोडती है । अत्मा का मौलिक स्वरूप अर्थात वह स्वरूप जिसमें वह ब्रम्ह से विलग हो प्रकृति के मध्य आत्मा के रूप में स्थापित की गई । प्रकृतीय मोंह से अछूती आत्मा । यह स्थिति आसक्त आत्मा के सुधार द्वारा भी उत्पन्न हो सकती है और मौलिक स्वरूप में तो होती ही है । प्रकृतीय मोंह से अछूती आत्मा उपरोक्तानुसार आचरण क्यों करती है क्यों कि उपरोक्त समस्त की कर्ता प्रकृति होती है । 

बुधवार, 26 मार्च 2014

नियंत्रित प्रकृति

आत्मा और प्रकृति । इन दोनो की परस्पर क्रिया द्वारा उत्पन्न होने वाला कर्म । इनमें से आत्मा ब्रम्ह का अंश । प्रकृति ब्रम्ह की रचना । आत्मा प्रकृतीय शरीर के सभी अंगों की ज्ञान सीमा से परे । जो कुछ भी नियंत्रण संयम सम्भव हो सकता है वह प्रकृतीय क्षेत्र में ही हो सकता है । प्रकृतीय अंगों में सर्वाधिक सक्षम मस्तिष्क । इसलिये जो मनुष्य अपने मस्तिष्क को नियंत्रित व संयमित रख कार्य को बिना फल की आकाँक्षा किये करने में सफल हो सकता है वही शांतिपूर्ण आनंद का जीवन यापन कर सकता है ।

उपरोक्त वर्णित जीवन ही आदर्श जीवन होगा । आत्मा प्रकृतीय संसर्ग में रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते अपने मूल स्वरूप को दागी बना लेता है । जबकि होना यह चाहिये कि जिस मालिक नें अपना अंग ही प्रकृति को दिया वह मूल स्वरूप में ही कायम रहना चाहिये । इस वाँक्षना की पूर्ति तभी सम्भव हो सकती है जब प्रकृति को नियंत्रित संयमित रखा जा सके । 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

मोंह तथा मोक्ष

वह मनुष्य जिसने अपनी आत्मा का बोध कर आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा के अनुरूप आचरण में प्रवृत्त करते हुये कार्य के फल के प्रति विरक्ति रखते हुये अपने कार्यों को करता है वह प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर शांत आनंदमय जीवन का भोग करता है । इसके विपरीत जो मनुष्य आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा के प्रति अचेत रहते हुये कार्य में प्रवृत्त करता है वह इच्छाओं के वेग से ग्रसित होकर फल की कामना से कार्यों को करने को प्रवृत्त होता है । परिणामत: वह प्रकृतीय मोंह में बँधता है ।

वस्तुत: मोक्ष अथवा बंधन यह दोनो ही दशाये कार्य में प्रवृत्त होने के निमित्त से और कार्य सम्पादन काल में मस्तिष्क की स्थिति से सम्बंधित होती हैं । कार्य में प्रवृत्त होने का निमित्त यदि इच्छाओं की पूर्ति करना है तो निश्चय ही प्रकृतीय मोंह में वृद्धि होगी । इसके विपरीत यदि कार्य में प्रवृत्त होने का निमित्त प्रकृतीय आदेशों की पूर्ति और आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा का निर्वाह है तो मोह से मुक्ति मिलेगी । कार्य के फल की इच्छा ही बंधन होता है । यह उसी दशा में समाप्त हो सकता है जब कि कार्य करने का निमित्त आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा की मर्यादानुसार निर्धारित किया जाय ।  

सोमवार, 24 मार्च 2014

मस्तिष्क

मनुष्य का मस्तिष्क जो कि एक प्रकृतीय रचना है और समस्त इंद्रियों के कार्य संचालन नियंत्रण का केंद्र है । यह मस्तिष्क अपनी कार्य प्रणाली के विज्ञान द्वारा मनुष्य को अच्छे बुरे कार्यों में प्रवृत्त करता है । इन्ही कारणों से योग की मस्तिष्क की अवस्था का जो भी वृतांत प्रस्तुत किया गया है उसमें समस्त सुझाव इसी मस्तिष्क के मर्यादित व नियंत्रित प्रयोग के लिये सारी अनुशंसाये की गई हैं । मनुष्य के कर्म को यथा वाँक्षित से विचलित पर्यंत जो भी भटकाव उत्पन्न होते हैं उनके कारणों का शोध करने पर यह पाया गया कि मस्तिष्क में व्याप्त फल की इच्छायें और कर्तापन का अहंकार ये दो अवयव सर्वाधिक निमित्त प्रमाणित होते है । इन्ही कारणों से त्रुटिपूर्ण कर्मों के सुधार के विचार में जो भी अनुशंसाये की गई हैं वह इच्छाओं के शमन और कर्तापन के अहंकार के मर्दन को लक्ष्य करके ही की गई है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मनुष्य अपने कर्म में सम्मलित होने वाले समस्त अंगों यथा इंद्रियाँ मस्तिष्क हृदय को यंत्रवत् प्रयोग कर सके अर्थात किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से रहित वह मनुष्य जो भी कर्म करेगा वह पाप रहित होगा । इच्छाये पूर्वाग्रह के रूप में ही विद्यमान रहती हैं । इसी लक्ष्य को पाने के लिये योग की अवस्था में कार्य का अभ्यास । इन समस्त प्रयत्नों का फल होता है आत्मा का शुद्धिकरण । कर्म सुधार । 

रविवार, 23 मार्च 2014

मोंह से मुक्ति

जो मनुष्य प्रकृतीय मोंह से पूर्णतया मुक्त होकर अपने कर्मों को प्रकृति को समर्पित कर करता है उससे कोई पाप नहीं होता है । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति के लिये कार्यों को योग की दशा में करने का अभ्यास । मोंह से मुक्ति पाकर किये जाने वाले कर्म सन्यास की स्थिति को प्राप्त कराते है । मोहासक्त आत्मा को मोंह से मुक्त कराना ही अभीष्ट होता है । मोक्ष ही शांति की आनंदमय स्थिति की प्राप्ति है । इस प्रकार मोहासक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति कराने के लिये योग । योग को पाने के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप की ग्राह्यता । यह सभी परस्पर सम्बद्ध स्थितियाँ हैं । सभी का सम्बंध मस्तिष्क की यथास्थिति से है । कार्यों को करते हुये अपने को उन्नति के पथ पर बढाने के लिये कार्यों को सही ढंग से करने का अभ्यास । कार्यों को करने के लिये प्रेरणा ग्रहण करने का श्रोत का सही चयन । कार्यों को करने के निमित्त का निर्धारण स्थल । इन तीनो के सही चयन और क्रियांवन द्वारा मिलेगी मुक्ति । आसक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति । 

शनिवार, 22 मार्च 2014

अहंकार

ज्ञानीजन जिन्हे कि अपनी आत्मा का अनुभव हो गया है और जो आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा और मर्यादा को चरितार्थ करते हुये जीवन जीते हैं वह अपने को कंचिद छोटे से छोटे कार्य यथा सांस लेना, सूघना, सुनना, स्वाद का अनुभव करना आदि के लिये भी अपने को कर्ता नहीं मानते हैं । ऐसे ज्ञानीजन ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप प्रकृति को कर्ता मानते हुये अपने को सेवक के रूप में समस्त कर्मों को करते हैं । उनका मानना होता है कि प्रत्येक इंद्रिय अपने वस्तु के द्वारा पूर्णरूप से वश में की हुई है ।

उपरोक्त के विपरीत अहंकारी व्यक्ति अपने को समस्त कर्मों का कर्ता मानते हैं । जबकि उनके अहंकार का आधार पूर्णरूप से प्रकृति निर्मित क्षणभंगुर पल पल बदलने वाले अवयवों पर लम्बित होता है । इसलिये पूर्णरूप से भ्रामक होता है । अहंकार के बाह्य स्वरूप अथवा उसके परम् अंत:करण में भी कोई स्थायी अंश नहीं होता है । इसके बावज़ूद अहंकारी व्यक्ति सर्वथा कर्तापन के भ्रम से ओतप्रोत रहता है ।     

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

दागी कर्म

कर्म जिन्हे करते हुये मस्तिष्क में किसी फल विषेस की कामना विद्यमान रहे वे कर्म आत्मा को प्रकृतीय मोंह की ओर प्रवृत्त करने वाले होते हैं । ऐसे कर्म सत्कर्म नहीं कहे जावेंगे । इन्हे करने से आसक्ति की वृद्धि होती है । सच्चा कर्म वह होता है जिसे करते हुये मस्तिष्क में कर्म के फल के प्रति लिप्सा ना विद्यमान रहे । योगावस्था में किये जाने वाले कर्मों के विचार में भी सत्कर्म का चयन आवश्यक होता है । सत्कर्म मुक्ति प्रवृत्त करते हैं । दागी कर्म मोंह प्रवृत्त करने वाले होते है । सन्यास कर्मों का त्याग नहीं होता । कर्म करते हुये कर्मके फल की कामना ना करना सन्यास होता है । प्रकृति द्वारा आरोपित कर्म सत्कर्म होते है । इच्छा की पुष्टि में किया जानेवाला कर्म दागी होता है । योगावस्था में सत्कर्मों को करना आत्मा को जानने के तुल्य होता है । 

गुरुवार, 20 मार्च 2014

कर्ता प्रकृति

कर्मफल की इच्छा ना रखते हुये कर्म करना सन्यास है । यद्यपि कि इसे कर्मयोग के समान ही फलप्रद बताया गया है । परंतु सन्यास बिना सफल कर्मयोगी बने हासिल नहीं किया जा सकता । इसा प्रकार प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को मोंह से मुक्त कराने के प्रयत्नों में योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास मूल वाँक्षना है । योग की मस्तिष्क की दशा सतत् उपलब्ध रहे इसके लिये मस्तिष्क और विवेक में प्रकृति के कर्ता स्वरूप का स्वक्ष चित्र उपस्थित रहे और इस स्वरूप के प्रति पूर्ण निष्ठा विद्यमान रहे । यह क्रम है जिसमें आत्मा के उत्थान अर्थात प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को ग्रसित करने वाली व्याधि मोंह से मुक्त कराने के प्रयत्नों को करने से सफलता मिलेगी । आत्मा को मोंह से मुक्त कराने का परिणाम होगा दिव्य शांति आनंद की उपलब्धि । 

बुधवार, 19 मार्च 2014

योगी सन्यासी

सच्चा सन्यासी वह है जो हर प्रत्येक कार्य को बिना फल की आकाँक्षा के करता है । सच्चा कर्म वह है जिसमें कर्म करने की आसक्ति ना होवे ।
योग की अवस्था में कार्य को करने का अभ्यास व सन्यासी दोनों ही एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये दो रास्ते है । दोनों ही मस्तिष्क की एक विषेस दशा है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य के परिणाम से कोई प्रभाव ना पडे योग है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य को करते हुये कार्य के परिणाम की कोई आकाँक्षा ना रहे सन्यास है । एक ही कार्य को एक मूर्ख और एक ज्ञानी दोनों करते हैं । बाह्य शरीर के अंगों की कार्य में भागीदारी दोनों ही की एक समान होती है । अंतर दोनों के मस्तिष्क की दशा का होता है । ज्ञानी उसी कार्य को कार्य है कार्य करने के लिये हमारा जन्म हुआ है इसलिये कार्य करेगा । मूर्ख उसी कार्य को अपने मस्तिष्क में विद्यमान किसी इच्छा की पूर्ति के लिये करेगा ।

कार्य की कर्ता प्रकृति होती है । परंतु बिना आत्मा के सम्मलित हुये कोई कार्य सम्भव ही नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा नित्य कर्ता है । यह चित्र जितना ही स्वच्छ रूप से मस्तिष्क में जो धारण कर सकेगा वही धारक योगी होगा वही धारक सन्यासी होगा । योगी अथवा सन्यासी यह संज्ञाये एक निष्ठावान चरित्रवान शिष्ट आचरण वाले मनुष्य के लिये है । एक कर्मनिष्ठ को प्रदान की जाने वाली उपाधियाँ हैं । 

मंगलवार, 18 मार्च 2014

सन्यास

कार्य करते हुये कार्य के परिणाम से लिप्सा ना रखना सन्यास । कार्य को योग की अवस्था में मस्तिष्क को रखते हुये करना कर्मयोग । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को मोंह से मुक्ति दिला उसे अपने ब्रम्ह स्वरूप में वापस स्थापित करने के प्रयत्नों में । यह दोनो ही एक ही समान फल पैदा करते हैं । आत्मा जो कि ब्रम्ह का अंश होता है । प्रकृतीय संसर्ग में रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते वह प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । कर्म की उत्पत्ति आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा होती है । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा द्वारा सृजित कर्म दोषपूर्ण हो जाते हैं । कर्म दोष के निवारण के विचार में कर्मों को करते हुये कर्मदोष का निवारण पथ कर्मयोग सन्यास । 

सोमवार, 17 मार्च 2014

प्रकृतीय मोंह

जैसा कि कर्म मार्ग के वर्णन में अंकित किया जाता रहा है कि कर्म दोष उत्पन्न करने का श्रोत होता है मस्तिष्क में व्याप्त इच्छायें । कर्तापन का अहंकार । प्रकृति के प्रति मोंह । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । अत: कर्म मार्ग से कर्मों को सुधारने के प्रयत्नों की चर्चा में प्रत्येक स्तर पर यह अंकित किया गया कि उपरोक्त दोष उत्पन्न करने वाले प्रकृतीय मोंह को त्यागना होगा । इसी उपलब्धि के लिये योग का पथ बताया गया । योगावस्था में कार्य करने का पथ । योगावस्था जिसमें मस्तिष्क के ऊपर कार्य के फल का मस्तिष्क पर प्रभाव ना पडे । कार्य को करने का निमित्त कार्य ही हो । कार्य को करने वाली प्रकृति है इसका बोध मस्तिष्क को सदैव प्रतिपल स्मरण रहे । परंतु विडम्बना यह है कि अनादि काल से शरीरों की यात्रा करते चली आयी आत्मा को इच्छा के अधीन कार्य करने का अभ्यास इस प्रकार उसका स्वभाव बन गया है कि उसे त्यागना उसे लगता है कि जैसे जीवन को ही त्यागना है । इसलिये कुल ज्ञान सुनने अथवा पढने के बाद जब उसे करने की पारी आती है तो उसे लगता है कि जैसे फिर जीवन में बचेगा क्या । इसलिये वह यही निर्णय करता है कि ढीक है सब ज्ञान परंतु जीवन यही अच्छा है जो जी रहे हैं । इच्छाओं का पीछा करते । दु:ख भोगते । इसमें फिर ज्ञान का क्या कार्य । प्रकृतीय मोंह इतना प्रबल होता है । प्रकृति की महिमा इतनी व्यापक होती है कि इससे उबरने के लिये असाधारण दृढता की आवश्यकता होती है । 

रविवार, 16 मार्च 2014

आत्मज्ञान

 कर्म ही बंधनकारी भी हैं । कर्म ही मोक्षदायक भी हैं । कर्म किये कैसे जाते हैं । कर्म करने की प्रेरणा कहाँ से ग्रहण की जाती है । कर्म करने का निमित्त क्या है । निर्धारित करते हैं कि वह कर्म बंधनकारी होगा कि मोक्षदायक होगा । योग की अवस्था में कर्म करना अभ्यास करना है मुक्ति का । इस प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । मन की इच्छाओं की पूर्ति में कर्म करने से मुक्ति । दु:खों से मुक्ति । शांति की प्राप्ति के लिये । आनंद का सुख पाने के लिये । संसार कर्म द्वारा ही है । संसार में जन्म कर्म करने के लिये ही है । प्रकृति की विस्तृत क्षवि में मोंह ग्रसित होकर वासनाओं की पूर्ति के भ्रम में कर्म करना बंधनकारी पथ है और प्रकृति की अपेक्षानुसार प्रकृति के कर्ता स्वरूप की मर्यादानुसार प्रकृति की सेवा भाव से कर्म मोक्षदायक है मुक्ति का पथ है ।

आदि महात्मा शंकर नें तो योगावस्था में कर्म करना आत्मज्ञान होना कहा है । आत्मा को प्रकृति के मध्य प्रकृति के प्रयोजनों की पूर्ति के लिये ही रखा है । भ्रमवश आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । उसे इस मोंह से मुक्ति दिलाना हम प्रत्येक का धर्म है । इस धर्म के निर्वाह के लिये योग योग्य पथ है । योग की अवस्था में कार्य करना आत्मज्ञान है ।  

शनिवार, 15 मार्च 2014

आत्मसुख

आत्मा द्वारा आत्मसुख का बोध । गुणों की भोक्ता आत्मा । यह गुणों की भोक्ता आत्मा जब अपने ही गुणों का भोग करती है । यह स्थिति कब उत्पन्न होगी । जब आत्मा शुद्ध रूप में उपलब्ध हो । आत्मा शुद्ध रूप में कब उपलब्ध होगी । जब उसमें कोई विकार ना हो । विकार आत्मा के क्या है । प्रकृतीय मोंह । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । इस प्रकार यदि आत्मा में प्रकृतीय मोंह ना हो तो आत्मा एकाकी शुद्ध रूप में है । ऐसी स्थिति की आत्मा अपने भोक्ता धर्म द्वारा अपने ही एकाकी शुद्ध स्वरूप का सुख जब अनुभव कर पाता है तब उसे फिर अन्य कोई दूसरे सुख की कामना नही रह जाती । कारण । यह सुख इतना पावन निर्मल शाश्वत होता है कि कोई दूसरा अर्थात प्रकृतीय सुख इसके तुलना में फीका हो जाता है । जब अधिक अच्छा मिलेगा तो कोई भी कम अच्छा क्यों लेगा ।

जो योगी प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर एक बार अपनी आत्मा के दिव्य शांत स्वरूप का सुख भोग कर लेता है वह सदा ब्रम्ह के दिव्य शांत चिर आनंद में लीन जीवन को जीता है । आत्मा में व्याप्त प्रकृतीय मोंह ही समस्त अशांति का श्रोत होता है । इस मोंह से मुक्ति पाना ही मोक्ष है । मोक्ष के बाद जो स्थिति शेस बचती है वह चिर दिव्य शांत आनंद है । 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

आत्मा का सुधार

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पार्थ को बताया कि जो मनुष्य कार्य करते कार्य के परिणाम की चिंता ना कर कार्य में अपनी आत्मा की सही भागीदारी के प्रति सचेत रहता है उसकी आत्मा दोषों से मुक्त हो स्वस्थ कर्मों को करने वाली बनती है । इस संसार में कोई भी मनुष्य पूर्ण रूप से सही नहीं है । परंतु जो मनुष्य अपनी आत्मा की त्रुटि सुधार के लिये सत्यनिष्ठा से प्रयत्नशील होता है वह इन्ही प्रयत्नों को करते करते दिव्य आनंदमय चिर शांति को प्राप्त होता है ।
आत्मा में व्याप्त त्रुटियाँ व उनके सुधार का ज्ञान मस्तिष्क की दशा के परीक्षण से सम्भव होता है । यदि मस्तिष्क में काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता की स्थिति पायी जाय तो निष्चय ही आत्मा रोगों से ग्रसित है । यदि मस्तिष्क अनुकूल कर्म फलों से हर्षित ना हो और विपरीत कर्म फलों से दु:खी ना हो तो आत्मा विकारों से रोगों से मुक्त हो गयी जानी जाय । ऐसी रोगा मुक्त आत्मा अपने स्वरूप में ब्रम्ह की गरिमा का बोध करती है । ऐसी आत्मा ही ब्रम्ह की सत्य अभिव्यक्ति होती है । ब्रम्ह अपने को ऐसी आत्माओं के माध्यम से ही प्रगट करता है । ऐसा व्यक्ति ही ब्रम्ह में जीवन जीता है ।

मस्तिष्क की दशा के उपरोक्तानुसार लक्षण से अपने को परीक्षित करते हुये अपने सुधार का प्रयत्न करना फलदायी होता है । प्रयत्नों द्वारा ही सफलता मिलती है ।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

प्रकृति पर विजय

गत अंक की चर्चा को सतत् रखते हुये
द्वैत और द्वैत के विज्ञान को मस्तिष्क में धारण किये हुये प्रत्येक प्राणी में विराजमान आत्मा को प्रधान अस्तित्व मानते हुये प्रत्येक प्राणी को सम भाव से देखना । यह सतपुरुषों का आचरण होता है । उपरोक्त आचरण के परिणाम स्वरूप उन सतपुरुषों की उपलब्धि होती है । प्रकृति पर विजय । विजय अर्थात आत्मा के वर्चस्व का जीवन । आसक्त आत्मा प्रकृति के पराधीन रहती है । पराधीन प्रकृति के गुणों के भोग के लिये । पराधीन प्रकृतीय घटकों के स्वामित्व के लिये । स्वतंत्र आत्मा । जो आत्मा प्रकृतीय गुणों के भोग की इच्छा से मुक्त हो । जो आत्मा प्रकृतीय घटकों के स्वामित्व की कामना से मुक्त हो । वह स्वतंत्र आत्मा है । स्वतंत्र आत्मा कर्म संविधान के प्रति निष्ठावान होगी । वह व्यक्ति योग की अवस्था में कार्य करने को तत्पर होगा । योग की अवस्था में कार्य करने से उसके कर्म त्रुटिपूर्ण नहीं होंगे । जिस व्यक्ति के कर्मदोष निवारण हो जावेंगे वह प्रगति करेगा । आत्मा आसक्त होती है प्रकृतीय गुणों के माध्यम से । आत्मा में विक्षेप उत्पन्न होता है प्रकृतीय गुणों द्वारा । आत्मा का प्रकृति पर विजय । प्रकृतीय गुणों की आसक्ति से आत्मा ना बँधे तो आत्मा द्वारा प्रकृति पर विजय है ।
इस कर्म प्रधान संसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कर्मों की गुणवत्ता । कर्मों का उदय होता है आत्मा और प्रकृति के परस्पर द्वारा । स्वाभाविक है कि आत्मा और प्रकृति दो अलग अस्तित्व एक दूसरे के साथ संलग्न होते हैं । परस्पर में दोनो की व्यक्तिगत यथास्थिति जैसी होगी वैसा ही उसका योगदान होगा । प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति होते हुये भी अत्यधिक बलशाली है । आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के नाते होता तो है पूर्ण समर्थ परंतु अपनी आसक्ति नामक रोग के कारण वह अपनी प्रतिभा गवाँ देता है । इसी खोई हुई क्षमता को फिर से प्राप्त करने के लिये समस्त प्रयत्न करने होते हैं ।

प्रयत्न जो भी किये जाने है वह प्रकृतीय शरीर के माध्यम से ही होगे । शरीर में भी सबसे ज्यादा योगदान सम्भव होगा मस्तिष्क द्वारा । इसीलिये समस्त सुधारात्मक प्रयत्नों में मस्तिष्क को अपनाने के लिये संस्तुतियाँ की गई हैं । वर्तमान विचाराधीन संस्तुति है कि प्रत्येक जीव में स्थिति आत्मा उसी एक निर्विकार ब्रम्ह का अंश है इसलिये प्रत्येक प्राणी को एक समभाव से देखा जाय । यदि शेर का स्वभाव क्रूर है तो यह प्रकृति के योगदान से है ना कि शेर में निहित आत्मा के कारण । यदि एक मनुष्य का शत्रु दूसरा मनुष्य उसे क्षति पहुँचा रहा है तो यह दूसरे मनुष्य की प्रकृति है जो उससे ऐसा करा रही है । यह विभेद जितना ही मस्तिष्क में स्पष्ट होगा और जितना ही प्रत्येक प्राणी में विद्यमान आत्मा को मान्यता मस्तिष्क प्रदान कर सकेगा उतना ही समदृष्टि आयेगी उसमें । उपलब्धि होगी प्रकृति पर विजय

बुधवार, 12 मार्च 2014

द्वैत

द्वैत आत्मा और प्रकृति में होता है । विषय और वस्तु का भेद है । आत्मा और शरीर में कोई द्वैत नहीं होता । शरीर कोई भी होवे । मनुष्य की, बंदर की, पक्षी की, जलचर जीव की, ज्ञानी पुरुष की अथवा हीन वर्ण के पतित मनुष्य की । प्रत्येक शरीर में प्रेरक आत्मा अभिन्न है । आत्मा और प्रकृति के भेद को जानना ही विज्ञान है । मनुष्य का ज्ञान उसके अज्ञान की तुलना में अति अल्प है । जब कुछ प्रारम्भिक ज्ञान होता है तब अज्ञान के विषाल स्वरूप का भान होता है । थोडा ज्ञान होने पर हठधर्मिता जन्म लेती है । थोडा अधिक ज्ञान होने पर प्रश्नों का जन्म होता है । और अधिक ज्ञान के प्रयत्न करते हुये जब वह अनुभव करता है कि पाने को ज्ञान बहुत है पर सामर्थ्य समाप्त हो रहा है । तब जन्म होता है प्रार्थना विनय का । यह स्वाभाविक क्रम है ।

द्वैत का ज्ञान मस्तिष्क में धारण किये हुये जो संत पुरुष ब्रम्हके अविभाजित स्वरूप को हर प्रत्येक प्राणी में देखता है उसे सम दृष्टि कहते हैं । सिद्ध योगी की स्थिति प्राप्त मनुष्य ही सम दृष्टि होता है । उसे प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह का स्वरूप दीखता है ।    

मंगलवार, 11 मार्च 2014

आदर्श आत्मस्वरूप

प्रकृति के मध्य में ब्रम्ह का अंश आत्मा । प्रकृति और आत्मा की परस्पर क्रिया से समस्त गतिविधि । विचारणीय हो जाता है कि मनुष्य के अस्तित्व का परिचायक किसे माना जाय ? उसकी आत्मा को अथवा उसकी प्रकृति को । उत्तर है आत्मा को । आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृतीय शरीर से ज्ञेय नहीं है । ऐसे में उत्कृष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण के लिये आत्मा को कैसे उत्कृष्ठ बनाया जाय । आत्मा का क्या स्वरूप होगा जब इसे उत्कृष्ठ कहा जावेगा । आत्मा के आदर्श स्वरूप को श्रीमदभागवद गीता में निम्नवत बताया गया
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: ।
न  कर्मफलसंयोगं   स्वभावस्तु   प्रवर्तते ।। 
आत्मा ना ही किसी कर्म में कर्ता का बोध करे, ना ही अन्य के लिये कार्य के लिये प्रतिस्थापित कर्ता के रूप में कार्य करे, ना ही कार्य को कार्य के फल के साथ सँयुक्त करे, और कर्म को करने वाले के स्वभाव के रूप में ग्रहण करे ।
आत्मा के आदर्श स्वरूप का स्वच्छ निरूपण । सर्व प्रथम वाँक्षित गुण कहा गया कि कर्म में सम्मलित हो परंतु कर्म का कर्ता ना बने । कर्तापन का अहंकार ना व्याप्त होवे । कर्ता भिन्न है मैं आत्मा तो मात्र अपना कर्तब्य निर्वाह कर रहे हैं कार्य में सम्मलित हो । द्वितीय वाँक्षना कही गयी कि किसी अन्य के लिये agent प्रतिस्थापित कर्ता के रूप में कार्य में सम्मलित ना होवे । अन्य कौन हुआ ? प्रकृतीय शरीर की इंद्रियाँ । तृतीय वाँक्षना बतायी गयी कि कार्य का कार्य के परिणाम से सम्बंध ना जोडे । जो कार्य प्रकृति की प्रेरणा से प्रकृतीय शरीर के किसी भाग द्वारा प्रवृत्त हो रहे हैं मात्र उसी में सम्मलित हो जाय । अपने किसी निमित्त के लिये प्रकृतीय शरीर के किसी अंग को कार्य में प्रवृत्त होने के लिये चेष्टा ना करे । इन समस्त अपेक्षाओं का कारण भी स्पष्ट किया कि प्रकृतीय शरीर के प्रयेक अवयव में प्रकृति ने कार्य करने की स्वाभाविक क्षमता प्रदान की है ।
उपरोक्त विवरण में आत्मा का कार्य में सम्मलित होने में क्या स्वरूप होना चाहिये बताया गया । तीन वाँक्षनाये बतायी गई । दो उसके कार्य में सम्मलित होने के स्वरूप से सम्बंधित । एक उसके कार्य में सम्मलित होने के निमित्त से सम्बंधित । कार्य में सम्मलित होने का स्वरूप जो कि कर्तापन से पूर्णतया अछूता । निमित्त अपेक्षा मात्र कर्तव्य ।

आत्मा का उपरोक्त आदर्श स्वरूप बने कैसे ? एक मात्र उपाय योग । 

सोमवार, 10 मार्च 2014

दिव्य शांति

परम् ब्रम की दिव्य शांति की अनुभूति इसी वर्तमान शरीर में जीवन यापन करते हुये अनुभव की जा सकती है । इसके लिये मात्र अंकुश करना होगा मस्तिष्क में उठने वाले इच्छाओं और क्रोध के आवेग को । जो मनुष्य अपनी इच्छाओं और क्रोध के ऊपर पूर्ण नियंत्रण कर सकेगा वह इसी जीवन में दिव्य शांति को प्राप्त कर सकेगा ।
शक्नोतीहैव  य: सोढुं  प्राक्शरीर्विमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं सा युक्त: स सुखी नर: ॥
जो मनुष्य इस जीवन के रहते अपने अंदर उठने वाले इच्छाओं और क्रोध के आवेग को विजय कर सकेगा वही योगी है वही सुखी इंसान है ।

समस्त दु:खों का कारण इच्छायें होती हैं । इच्छा की पूर्ति ना होने की दशा में क्रोध होता है । यह दोनों ही अशांति के मूल हैं । इसीलिये इन अशांति उत्पन्न करने वाले इच्छा और क्रोध पर विजय करने वाला परम् शांति को प्राप्त होगा । 

रविवार, 9 मार्च 2014

मोक्ष

जो मनुष्य अपने अंदर विद्यमान आत्मा की अनुभूति में हर्षित रहता है । ऐसा योगी परम् ब्रम्ह की दिव्य शांति की स्थिति को प्राप्त होता है ।
आत्मा जो समस्त कर्मों का प्रेरक होता है । आत्मा जो कि समस्त प्रकृतीय गुणों का भोक्ता होता है । आत्मा जो कि प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित करता है । आत्मा जो कि प्रकृतीय मोंह जनित करता है । ऐसी आत्मा की अनुभूति अपने अंत:करण में करना । आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानना है । आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानना उसके अवाँक्षित चरित्र से उसे उबारना है । यह समस्त अनुभव किया जा सकता है । इन समस्त को भौतिक स्वरूप में जाना नहीं जा सकता । विदित है कि उपरोक्त कथन प्रत्यक्ष रूप से चिंतनशील जीवन शैली की अनुशंसा है । चिंन्तनशील पर्याय है विवेक पर आधारित जीवन यापन का । अप्रत्यक्षरूप से यह कहना है कि जो व्यक्ति प्रकृतीय मोह और आसक्ति से परे विवेक पर आधारित उचित और अनुचित का भेद मस्तिष्क में धारण किये हुये उचित कर्मों को प्रेरित करते हुये जीवन यापन करता है वह परम् ब्रम्ह की चिर शांत स्थिति को पाता है ।

उपरोक्त समस्त कथन नकारात्मक निर्देश है प्रकृतीय मोंह के प्रति । शांति जो कि द्योतक होती है विवेक पूर्ण कर्मों को करने हेतु । सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी । इस उपलब्धि को वह मनुष्य अर्जित कर सकेगा जो अपनेअंदर विद्यमान आत्मा की अनुभूति प्रतिपल करते हुये उसी आत्मा की अनुभूति में हर्षित रहेगा । उसके कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेगें । मुक्त आत्मा से प्रेरित कर्म मोक्षदायक होते है । मोक्ष आत्मा की आसक्ति से मुक्ति है मोक्ष । मोक्ष ही दिव्य शांति है । 

शनिवार, 8 मार्च 2014

आचरण

जो मनुष्य पापों पर विजय कर चुका है और जिसका जीवन सुख और दु:ख के द्वैत से मुक्त हो चुका है वह ब्रम्ह की शांति का अनुभव पाता है । इच्छाजनित कार्यों को करना पाप की श्रेणी का होता है । कर्तापन का अहंकार करना पाप की श्रेणी का होता है । जो मनुष्य इन दोनों से मुक्त हो जाता है वह शांति की अनुभूति करता है । ऐसा मनुष्य ही समस्त जीव श्रेणी को ईश्वर के प्रतिनिधि रूप में देखता है । ऐसा मनुष्य ही दुराचरणी एवं अपराधी को भी सहानुभूति पूर्वक देखता है ।

धर्म व्यक्तिगत एक मनुष्य के उत्थान के स्वाथ साथ सामाजिक उत्थान के लिये भी मार्ग प्रशस्थ करता है । उपरोक्त वर्णित पाप से रहित मनुष्य के लिये बताया जाता है कि वह सामाजिक उत्थान के लिये सेवा करता है । किसी अन्य के उत्थान के विचार में आवश्यक नहीं कि उसके जीवन स्तर को उठाने के लिये प्रयत्न किये जांय । अगले को आत्मा और उसकी प्रकृति का ज्ञान कराना बोध कराना उसका उत्थान करने के समान होता है । इससे उसे शांति मिलती है और सामाजिक सद्भाव में वृद्धि होती है । 

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

आत्मस्वरूप

प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । यह बहु स्तरीय है । प्रत्येक स्तर पर नियंत्रण है । प्रत्येक स्तर भिन्न होते हुये भी अन्य स्तर को प्रभावित करने वाले होते हैं । यह एक ऐसी अद्भुद वैज्ञानिक रचना है कि स्वयँ अपने रचनाकार को अपने वश में करने में सफल होती है । साकार ब्रम्ह प्रकृति की कृपा के अवलम्ब पर ही कोई भी अध्ययन व क्रियांवन सम्भव हो सकता है । इन्ही कारणों से मस्तिष्क की योग की अवस्था के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप को आत्मसात करना परम् आवश्यक होता है ।
आत्मा प्रकृति के मध्य प्रकृति के प्रयोजन को पूरा करने के लिये स्थापित है । बलशाली प्रकृति आत्मा को मोंह के जाल में बाँध कर रखती है । मोह ग्रसित आत्मा अपने कर्तव्य पथ से च्युत होता है । यह प्रक्रिया अनादि काल से चलती आयी है । इससे उबरने के लिये सज्ञान पूर्वक सचेत प्रयत्नों की आवश्यकता होती है । सचेत प्रयत्न अर्थात योग की अवस्था में कर्मों को करने का अभ्यास ।
मस्तिष्क ही वह स्थल है जहाँ पथ से विचलित होने का सृजन होता है । मस्तिष्क से ही भूली हुई आत्मा को अपने मूल स्वरूप को वापस पहुँचने का मार्ग भी मिलता है । सकल विकृति और सकल सुधार का एक मात्र स्थल मस्तिष्क होता है । जो व्यक्ति जितना ही सचेत हो इस मस्तिष्क को काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता के उन्मादों से सुरक्षित करते हुये इसे शांत दशा में कार्य में प्रवृत्त कर सकेगा उतना ही त्रुटिरहित कर्म को कर सकेगा ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण योग का ज्ञान बताते हुये सदैव इसी तत्य को महत्वपूर्ण बताये हैं कि मस्तिष्क सदैव आत्मा के ब्रम्ह स्वरूप का स्मरण स्थिर रखते हुये कार्य में संलग्न होने की दशा में ही त्रुटिरहित कर्म सम्भव होगा । ब्रम्ह अपनी रचना प्रकृति से पूर्णतया अछूता रहता है । तद्नुसार आत्मा को पूर्णतया प्रकृतीय मोंह से च्युत रहना मुक्त रहना अपेक्षित होता है। यही स्थिति पाने के लिये मस्तिष्क में आत्मा का स्वरूप स्थिर रहना आवश्यक कहा गया । 

गुरुवार, 6 मार्च 2014

फल की लिप्सा

फल की अभिलाषा से किया जाने वाला कर्म । योग की अनुशंसा का उलंघन । दु:खों को निमंत्रण देने के समान होता है । फल की कामना जनित ही होगी यदि कंचिद कार्य इच्छा के क्षेत्र से है । योग की अनुशंसा के अनुसार कार्य प्रकृति द्वारा आदेशित एवँ अपेक्षित होना चाहिये । यह लक्षण के रूप में बताया गया । लक्षण जो कि दूर से ही दीख जाने वाला होता है । मूल तलाश होती है इच्छा की । कार्य इच्छा की पूर्ति में किया जा रहा है अथवा प्रकृति द्वारा आदेशित है । इस परीक्षण के काल में दूर से ही लक्षण प्रगट होता है । कार्य करने वाले कर्ता को फल के लिये काफी व्यग्र देखा जा रहा है । तलाश पूर्ण हुई । निर्विवादित रूप से कार्य इच्छा के क्षेत्र से है ।
धर्म दर्शन में जो भी पथ किसी उपलब्धि के लिये सुझाये गये हैं उन प्रत्येक में उन सुझाओं को अमल करने की विधि भी बतायी गयी है । योग बताया योगेश्वर श्रीकृष्ण ने । फिर उसे व्यवहारिक जीवन में चरितार्थ करने की विधि बतायी । साधना काल में अपने प्रयत्नों का परीक्षण कर उपलब्धि परीक्षित करने के लिये लक्षण बताये । कहा कि साधना काल में यदि मस्तिष्क में कार्य के फल की कामना विद्यमान है तो निष्चय ही कार्य इच्छा के क्षेत्र से है । साधक जब तक अपने प्रयत्नों की गुणवत्ता से भिज्ञ नहीं होगा वह सार्थक उपलब्धि नही कर सकेगा ।

योग के लिये प्रयत्नशील साधक के लिये यह एक सरलतम परीक्षण लक्षण बताया । कार्य काल में कर्ता व्यक्ति के मस्तिष्क में कार्य के फल की लिप्सा । योगाभ्यास के साधक के लिये यह एक लक्ष्य भी है । कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम की अभिलाषा विद्यमान ना होना । जब साधक यह स्थिति उपलब्ध कर ले तो वह योग के सन्निकट है । 

बुधवार, 5 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

साकार ब्रम्ह की कल्पना प्रकृति के ही साकार स्वरूप की कल्पना है । मनुष्य शरीर की प्रकृति जो कि ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कर्म सम्पादन सम्पन्न करने में सक्षम हो वही साकार ब्रम्ह है । ब्रम्ह का अंश आत्मा जिस प्रकृतीय शरीर में अपने ब्रम्ह स्वरूप को सतत कायम रख सके वही साकार ब्रम्ह है । आचरण से ब्रम्ह । आत्मा को प्रकृतीय शरीर में रखा गया है प्रकृति के कर्मों को साकार रूप प्रदान करने के लिये । जिस प्रकृतीय शरीर में निहित आत्मा अपने मूल स्वरूप ब्रम्ह को कायम रख प्रकृतीय मोंह से अछूता रहते हुये कर्म प्रेरित करता है वही साकार ब्रम्ह है । ब्रम्ह का स्वरूप उसी शरीर में प्रगट होता है जिसमें आत्मा प्रकृति से निर्लिप्त रहती है । आत्मा का प्रकृतीय गुणों में मोंह आत्मा के लिये प्रदूषण है । प्रदूषण ब्रम्ह के स्वरूप को आच्छादित कर देता है ।
उपरोक्त कथन को तर्क द्वारा परीक्षित करने पर पाया जाता है कि यह प्रकृति ही आत्मा के विचलन का श्रोत भी है, निमित्त भी है और प्रकृति ही इसकी कर्ता भी है । इसलिये प्रकृति की कृपा होने पर ही कोई भी प्रयत्न फलीभूत होता है । साकार ब्रम्ह का प्रादुर्भाव भी प्रकृति की ही महिमा द्वारा सम्भव होता है । धर्म दर्शन बताता है कि जब मनुष्य समुदाय ब्रम्ह के संविधान के उलंघन को प्रवित्त होने लगता है । जब ब्रम्ह के संविधान का अतिक्रमण करने वालों की सँख्या अधिक हो जाती है । तब प्रकृति एक ऐसे मनुष्य को जन्म देती है जो कि ब्रम्ह के संविधान को सत प्रतिशत आचरण में व्यवहृत कर एक आदर्श मनुष्य का स्वरूप समस्त संसार को दिखाता है । फिर उसी आदर्श मनुष्य साकार ब्रम्ह का अनुसरण कर आम जन मानस अपने कर्मों को सुधारता है । आम मनुष्य की मोंह से आच्छादित आत्मा स्वस्थ्य निर्विकार स्वतंत्र स्वरूप को पाने को अग्रसर होती है ।

अवतार पुरुष साकार ब्रम्ह योगेश्वर श्रीकृष्ण नें जिस योग को बताया है वह मोंह से आच्छादित आत्मा की प्रकृतीय मोंह से मुक्ति का पथ प्रशस्थ करने वाला है । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति ही मोक्ष है ।  

मंगलवार, 4 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

शरीर एक कार्य करने का यंत्र । इस स्वरूप में जो व्यक्ति इस शरीर का प्रयोग कर सकेगा उसके कर्म त्रुटियों से मुक्त होंगे । कार्य करने के यंत्र में अनेक अंग प्रदान किये हैं प्रकृति ने । समस्त अंगों का नियंत्रण निहित किया है मस्तिष्क में । इन कारणों से कार्य की गुणवत्ता में मस्तिष्क की यथा स्थिति सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान प्रदानकरने वाली होती है । योग मस्तिष्क की यथास्थिति को संयमित एवं नियंत्रित करने के उद्देष्य से शोध किया गया है । मस्तिष्क की कार्य दक्षता को सर्वाधिक क्षति पहुँचाने वाला अवयव होता है इच्छायें । प्रकृति के प्रति मोंह । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । जो व्यक्ति इन सत्यों को अपने मस्तिष्क में धारण कर जीवन जीयेगा । जो व्यक्ति इन समस्त सत्यों को सत्य मान अपने कर्म की गुणवत्ता का उत्थान लक्ष्य करेगा । उसे योग की अनुशंसा के अनुसार आचरण करना होगा । प्रयत्नशील व्यक्तियों में भी सभी की उपलब्धियाँ एक समान नहीं होंगी । परंतु प्रयत्न एक ऐसी विधा है जो हर असम्भव को सम्भव बनाती है । निष्ठा होनी चाहिये ।
कार्य के अवयव होते हैं कार्य का लक्ष्य, कार्य करने का साधन, कार्य करने का निमित्त, और कार्य करने वाला व्यक्ति । उपरोक्त चार अवयवों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है कार्य करने वाला व्यक्ति । जिस व्यक्ति की जितना ही सुनियंत्रित, और सुसंयमित व्यक्तित्व होगा वह उतना ही गुणवत्ता युक्त कार्य संचालन प्रदान कर सकेगा । यह समस्त उपलब्धि किसी व्यक्ति विषेस की अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों द्वारा ही मिलती है । ज्यादा से ज्यादा उसे अपने को सही स्वरूप में निर्माण करने के लिये पथ का सुझाव बाह्य माध्यमों से प्राप्त हो सकता है । बाह्य सहायता का मिलना, उस सहायता को ग्रहण करने का विवेक, यह प्रकृति की कृपा पर निर्भर करता है । सुधार अथवा पतन की प्रक्रिया अनेकों जन्मो पर्यंत चलती रहती है । सोया हुआ इंसान जब जाग जाय तभी सबेरा है । अज्ञान का अंधकार समस्त मनुष्य समुदाय को एक समान आच्छादित किये हुये है । ज्ञान के प्रकाश के लिये जो उद्यमी जितनी निष्ठा से प्रयत्नशील होगा उतना ही उत्थान सम्भव होगा । जिन्हे प्रकृतीय मोंह की लिप्सा ही प्रिय होगी उनके लिये यह समस्त चर्चा किसी अर्थ की नहीं होगी ।

प्रकृति का कर्ता स्वरूप । प्रकृति की नियंत्रण क्षमता । प्रकृति का व्यापक विस्तार । प्रकृति में ब्रम्ह का दर्शन । जो व्यक्ति जितना ही अपनी धारणा में निहित कर सकेगा उतना ही उसका जीवन सरल होगा । अशांति उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ नियंत्रित होंगी । शांत जीवन आनंद का प्रतीक है । यह समस्त स्थितियों योगावस्था में कार्य का अभ्यास करने से सुलभ होती है । प्रत्येक व्यक्ति इसके लिये योग्य पात्र है । 

सोमवार, 3 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में । तीनों गुण आवरण हैं । इन्ही आवरणों में अपने को ढक कर आत्मा में व्याप्त मोंह प्रगट होता है । मोंह के रहते कर्म त्रुटिपूर्ण होने ही होने हैं । मोंह का त्याग ही विरक्ति है । प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकारना है । यही मोंह का आवरण हमें दूर रखता है अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह की अनुभूति से । हम प्रकृति के रूप और गुण के प्रति इतना संलग्न रहते हैं कि अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह का अनुभव नहीं कर पाते हैं । जिस पल यह मोंह छूटेगा उसी क्षण दिव्य ब्रम्ह की सुखानुभूति का अनुभव मिलेगा । ब्रम्ह ने अपने को प्रकृति के रूप में प्रगट किया है । उसके प्रगट स्वरूप में मोंह कर उस मूल ब्रम्ह की चेतना विस्मृत हो जाती है । इन्ही कारणों से वैराग्य को बताया गया । उस गुणों के आवरण को त्याग मूल प्रकृति की सत्ता को स्वीकरने का परामर्ष । हम परोपकार कर रहे हैं । हम तामसिक प्रवृत्तियों की पूर्ति कर रहे हैं । हम दूसरे के ऊपर वर्चस्व स्थापित कर रहे है । यह सभी हमारे मोंह की अभिव्यक्ति है । मोंह त्याज्य है । इसलिये सतगुण, तमोंगुण, और रजोगुण को त्याग प्रकृति द्वारा आदेशित एवं अपेक्षित कर्म किये जाँय यह योग्य मत है । कर्ता प्रकृति है । प्रकृति की अपेक्षा की पूर्ति हमारा धर्म है ।

आवरण के हटने से ब्रम्ह का दर्शन होगा । आत्मा पर आच्छादित मोंह हमें ब्रम्ह की अनुभूति से दूर किये हुये है । वैराग्य होना शांति की उपलब्धि है । 

रविवार, 2 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

 सतगुण, तमोंगुण, और रजोगुण इन तीन गुणों के मार्ग से आत्मा प्रकृति में आसक्त होता है । जो व्यक्ति इन तीनों गुणों को त्याग सके वही सत्य विरागी होगा । वैराग्य इन्ही तीन गुणों से । 

शनिवार, 1 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

योग की चर्चा की अवधि में यह सतत वर्णन किया गया कि कर्म की गुणवत्ता सीधे रूप से प्रभावित होती है मस्तिष्क की यथा स्थिति द्वारा । मस्तिष्क में संचित पूर्व की स्मृतियाँ मस्तिष्क में व्याप्त पूर्वाग्रह मस्तिष्क में व्याप्त इच्छायें यह सभी कार्य की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं । गत अंक के लेख में परिभाषित किया गया था पाप और पुण्य । यह श्रेणियाँ थी कर्म की । एक वर्गीकरण था कार्य की गुणवत्ता का । आज की चर्चा है कार्य करने के लिये मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले कारणों के सम्बंध में । कारण जो कार्य करने के लिये उद्देष्य बनते हैं । कार्य करने का कारण बनते हैं ।
इन कारणों का वर्गीकरण किया जाता है इनके पृष्ठभूमि में निहित उद्देष्य के आधार पर । उद्देष्य स्वयँ अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु । उद्देष्य अपने स्वयँ से भिन्न व्यक्ति अथवा समुदाय के हित के लिये । उद्देष्य सृजनात्मक गतिविधियों के लिये । उद्देष्य विध्वंसक गतिविधियों के लिये । वर्गीकरण में सात्विक उन उद्देष्यों को कहा गया जिनका निमित्त अपने से भिन्न व्यक्ति या समुदाय के लिये सृजनात्मक कार्यों के लिये होंवे । तामसिक उन उद्देष्यों को कहा गया जो असंवैधानिक कार्यों को प्रचलित सामाजिक नियमों का उलंघन करते हुये करने को लक्षित होंवे । राजसिक उन उद्देष्यों को कहा गया जो उपरोक्त दोनों नामत: सात्विक व तामसिक का मिश्रित स्वरूप वाले होंवे ।
सामाजिक विचारों से सात्विक को श्रेष्ठ कहा जावेगा । तामसिक को त्याज्य कहा जावेगा । राजसिक एक औसत पथ । आम प्रचलित । बुराइयाँ सात्विक में भी होतीं हैं । तामसिक बुरा होते हुये भी कतिपय गुणों से युक्त होता है । अच्छा या बुरा जो भी है वह समीक्षा योग्य होता है । इन्ही कारणों से योग की मस्तिष्क की अवस्था के लिये बताया गया था कि कार्य ही कार्य का निमित्त होवे । कोई भी अन्य निमित्त समीक्षा के दायरे में आयेगा । चाहे वह इच्छा की पूर्ति के कारणों से प्रेरित होवे । अथवा परमार्थ के निमित्त से प्रेरित होवें । अथवा अन्य तामसिक उद्देष्यों से प्रेरित होवें । सभी समीक्षा के दायरे में आयेगें ।
कार्य करने का कारण जितना ही सही होगा उतना ही गुणवत्ता पूर्ण कार्य होगा । सर्वोत्तम किसी भी समीक्षा से परे होगा । योग द्वारा सुझाया गया कारण । कार्य ही कार्य करने का कारण होवे ।

यह एक प्रचलित तरीका बना हुआ है कि किसी कार्य को करने का कोई कारण होवे । इन कारणों के विचार आने पर सबसे सरल विकल्प आता है इच्छा की पूर्ति । इस विकल्प की समीक्षा होने की दशा में व्यक्ति वही इच्छा पूर्ति परमार्थ का आवरण बना कर करना लक्षित करता है । यह पथ भी समाज में आम प्रचलित पथ है । तामसिक तो फिर ताम,असिक ही है । इन सबके विपरीत योगी के कार्य करने का कारण होता है स्वयँ वह कार्य । प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य । बिना कार्य के परिणाम की कामना के कार्य । एक आम नागरिक कार्य को उद्यत होता है किसी कारण के उपस्थित होने पर । एक योगी कार्य को उद्यत होता है कार्य के उपस्थित होने पर । योगी कार्य करने की प्रेरणा ग्रहण करता है कार्य से ।