आत्मा द्वारा
आत्मसुख का बोध । गुणों की भोक्ता आत्मा । यह गुणों की भोक्ता आत्मा जब अपने ही
गुणों का भोग करती है । यह स्थिति कब उत्पन्न होगी । जब आत्मा शुद्ध रूप में
उपलब्ध हो । आत्मा शुद्ध रूप में कब उपलब्ध होगी । जब उसमें कोई विकार ना हो ।
विकार आत्मा के क्या है । प्रकृतीय मोंह । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । इस प्रकार
यदि आत्मा में प्रकृतीय मोंह ना हो तो आत्मा एकाकी शुद्ध रूप में है । ऐसी स्थिति
की आत्मा अपने भोक्ता धर्म द्वारा अपने ही एकाकी शुद्ध स्वरूप का सुख जब अनुभव कर
पाता है तब उसे फिर अन्य कोई दूसरे सुख की कामना नही रह जाती । कारण । यह सुख इतना
पावन निर्मल शाश्वत होता है कि कोई दूसरा अर्थात प्रकृतीय सुख इसके तुलना में फीका
हो जाता है । जब अधिक अच्छा मिलेगा तो कोई भी कम अच्छा क्यों लेगा ।
जो योगी
प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर एक बार अपनी आत्मा के दिव्य शांत स्वरूप का सुख भोग
कर लेता है वह सदा ब्रम्ह के दिव्य शांत चिर आनंद में लीन जीवन को जीता है । आत्मा
में व्याप्त प्रकृतीय मोंह ही समस्त अशांति का श्रोत होता है । इस मोंह से मुक्ति
पाना ही मोक्ष है । मोक्ष के बाद जो स्थिति शेस बचती है वह चिर दिव्य शांत आनंद है
।
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