बुधवार, 5 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

साकार ब्रम्ह की कल्पना प्रकृति के ही साकार स्वरूप की कल्पना है । मनुष्य शरीर की प्रकृति जो कि ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कर्म सम्पादन सम्पन्न करने में सक्षम हो वही साकार ब्रम्ह है । ब्रम्ह का अंश आत्मा जिस प्रकृतीय शरीर में अपने ब्रम्ह स्वरूप को सतत कायम रख सके वही साकार ब्रम्ह है । आचरण से ब्रम्ह । आत्मा को प्रकृतीय शरीर में रखा गया है प्रकृति के कर्मों को साकार रूप प्रदान करने के लिये । जिस प्रकृतीय शरीर में निहित आत्मा अपने मूल स्वरूप ब्रम्ह को कायम रख प्रकृतीय मोंह से अछूता रहते हुये कर्म प्रेरित करता है वही साकार ब्रम्ह है । ब्रम्ह का स्वरूप उसी शरीर में प्रगट होता है जिसमें आत्मा प्रकृति से निर्लिप्त रहती है । आत्मा का प्रकृतीय गुणों में मोंह आत्मा के लिये प्रदूषण है । प्रदूषण ब्रम्ह के स्वरूप को आच्छादित कर देता है ।
उपरोक्त कथन को तर्क द्वारा परीक्षित करने पर पाया जाता है कि यह प्रकृति ही आत्मा के विचलन का श्रोत भी है, निमित्त भी है और प्रकृति ही इसकी कर्ता भी है । इसलिये प्रकृति की कृपा होने पर ही कोई भी प्रयत्न फलीभूत होता है । साकार ब्रम्ह का प्रादुर्भाव भी प्रकृति की ही महिमा द्वारा सम्भव होता है । धर्म दर्शन बताता है कि जब मनुष्य समुदाय ब्रम्ह के संविधान के उलंघन को प्रवित्त होने लगता है । जब ब्रम्ह के संविधान का अतिक्रमण करने वालों की सँख्या अधिक हो जाती है । तब प्रकृति एक ऐसे मनुष्य को जन्म देती है जो कि ब्रम्ह के संविधान को सत प्रतिशत आचरण में व्यवहृत कर एक आदर्श मनुष्य का स्वरूप समस्त संसार को दिखाता है । फिर उसी आदर्श मनुष्य साकार ब्रम्ह का अनुसरण कर आम जन मानस अपने कर्मों को सुधारता है । आम मनुष्य की मोंह से आच्छादित आत्मा स्वस्थ्य निर्विकार स्वतंत्र स्वरूप को पाने को अग्रसर होती है ।

अवतार पुरुष साकार ब्रम्ह योगेश्वर श्रीकृष्ण नें जिस योग को बताया है वह मोंह से आच्छादित आत्मा की प्रकृतीय मोंह से मुक्ति का पथ प्रशस्थ करने वाला है । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति ही मोक्ष है ।  

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