गत अंक की चर्चा
को सतत् रखते हुये –
द्वैत और द्वैत
के विज्ञान को मस्तिष्क में धारण किये हुये प्रत्येक प्राणी में विराजमान आत्मा को
प्रधान अस्तित्व मानते हुये प्रत्येक प्राणी को सम भाव से देखना । यह सतपुरुषों का
आचरण होता है । उपरोक्त आचरण के परिणाम स्वरूप उन सतपुरुषों की उपलब्धि होती है ।
प्रकृति पर विजय । विजय अर्थात आत्मा के वर्चस्व का जीवन । आसक्त आत्मा प्रकृति के
पराधीन रहती है । पराधीन प्रकृति के गुणों के भोग के लिये । पराधीन प्रकृतीय घटकों
के स्वामित्व के लिये । स्वतंत्र आत्मा । जो आत्मा प्रकृतीय गुणों के भोग की इच्छा
से मुक्त हो । जो आत्मा प्रकृतीय घटकों के स्वामित्व की कामना से मुक्त हो । वह
स्वतंत्र आत्मा है । स्वतंत्र आत्मा कर्म संविधान के प्रति निष्ठावान होगी । वह
व्यक्ति योग की अवस्था में कार्य करने को तत्पर होगा । योग की अवस्था में कार्य
करने से उसके कर्म त्रुटिपूर्ण नहीं होंगे । जिस व्यक्ति के कर्मदोष निवारण हो
जावेंगे वह प्रगति करेगा । आत्मा आसक्त होती है प्रकृतीय गुणों के माध्यम से ।
आत्मा में विक्षेप उत्पन्न होता है प्रकृतीय गुणों द्वारा । आत्मा का प्रकृति पर
विजय । प्रकृतीय गुणों की आसक्ति से आत्मा ना बँधे तो आत्मा द्वारा प्रकृति पर
विजय है ।
इस कर्म प्रधान
संसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कर्मों की गुणवत्ता । कर्मों का उदय होता है
आत्मा और प्रकृति के परस्पर द्वारा । स्वाभाविक है कि आत्मा और प्रकृति दो अलग
अस्तित्व एक दूसरे के साथ संलग्न होते हैं । परस्पर में दोनो की व्यक्तिगत
यथास्थिति जैसी होगी वैसा ही उसका योगदान होगा । प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति होते
हुये भी अत्यधिक बलशाली है । आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के नाते होता तो है पूर्ण
समर्थ परंतु अपनी आसक्ति नामक रोग के कारण वह अपनी प्रतिभा गवाँ देता है । इसी खोई
हुई क्षमता को फिर से प्राप्त करने के लिये समस्त प्रयत्न करने होते हैं ।
प्रयत्न जो भी
किये जाने है वह प्रकृतीय शरीर के माध्यम से ही होगे । शरीर में भी सबसे ज्यादा
योगदान सम्भव होगा मस्तिष्क द्वारा । इसीलिये समस्त सुधारात्मक प्रयत्नों में
मस्तिष्क को अपनाने के लिये संस्तुतियाँ की गई हैं । वर्तमान विचाराधीन संस्तुति
है कि प्रत्येक जीव में स्थिति आत्मा उसी एक निर्विकार ब्रम्ह का अंश है इसलिये
प्रत्येक प्राणी को एक समभाव से देखा जाय । यदि शेर का स्वभाव क्रूर है तो यह
प्रकृति के योगदान से है ना कि शेर में निहित आत्मा के कारण । यदि एक मनुष्य का
शत्रु दूसरा मनुष्य उसे क्षति पहुँचा रहा है तो यह दूसरे मनुष्य की प्रकृति है जो
उससे ऐसा करा रही है । यह विभेद जितना ही मस्तिष्क में स्पष्ट होगा और जितना ही
प्रत्येक प्राणी में विद्यमान आत्मा को मान्यता मस्तिष्क प्रदान कर सकेगा उतना ही
समदृष्टि आयेगी उसमें । उपलब्धि होगी प्रकृति पर विजय
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