आत्मा और
प्रकृति । इन दोनो की परस्पर क्रिया द्वारा उत्पन्न होने वाला कर्म । इनमें से
आत्मा ब्रम्ह का अंश । प्रकृति ब्रम्ह की रचना । आत्मा प्रकृतीय शरीर के सभी अंगों
की ज्ञान सीमा से परे । जो कुछ भी नियंत्रण संयम सम्भव हो सकता है वह प्रकृतीय क्षेत्र
में ही हो सकता है । प्रकृतीय अंगों में सर्वाधिक सक्षम मस्तिष्क । इसलिये जो
मनुष्य अपने मस्तिष्क को नियंत्रित व संयमित रख कार्य को बिना फल की आकाँक्षा किये
करने में सफल हो सकता है वही शांतिपूर्ण आनंद का जीवन यापन कर सकता है ।
उपरोक्त वर्णित
जीवन ही आदर्श जीवन होगा । आत्मा प्रकृतीय संसर्ग में रहते और प्रकृतीय गुणों का
भोग करते अपने मूल स्वरूप को दागी बना लेता है । जबकि होना यह चाहिये कि जिस मालिक
नें अपना अंग ही प्रकृति को दिया वह मूल स्वरूप में ही कायम रहना चाहिये । इस
वाँक्षना की पूर्ति तभी सम्भव हो सकती है जब प्रकृति को नियंत्रित संयमित रखा जा
सके ।
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