जिस मनुष्य को
अपने अंदर विद्यमान आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा का बोध उसके प्रकृतीय मोंह के ऊपर
पूर्ण रूप से विजय प्राप्त कर लेता है । उस मनुष्य को आत्म ज्ञान का बोध एक चमकते
हुये सूर्य की भाँति अज्ञान के अंधकार को पूर्णतया समाप्त करने में सफल होता है । ऐसे
मनुष्य को ब्रम्ह का साक्षात दर्शन प्रतिपल होता रहता है । ऐसे मनुष्य की आत्मा
कर्तापन के अहंकार से पूर्णतया मुक्त होती है । ऐसी अहंकार मुक्त आत्मा किसी भी पाप
कर्म अथवा पुण्य कर्म की कर्ता नहीं होती है । अपितु ऐसे मनुष्य की आत्मा प्रकृति
दारा किये जा रहे प्रत्येक पाप कर्म या पुण्य कर्म की मात्र दृष्टा होती है । ऐसे
मनुष्य की आत्मा मात्र प्रकृति द्वारा प्रेरित किये जा रहे प्रत्येक पाप कर्म अथवा
पुण्य कर्म की साक्षी रहती है । ऐसी मुक्त आत्मा का धारक व्यक्ति ब्रम्ह में निवास
करता है । ऐसा मनुष्य ही ब्रम्ह का जीवन जीता है ।
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