योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने पार्थ को बताया कि जो मनुष्य कार्य करते कार्य के परिणाम की चिंता ना
कर कार्य में अपनी आत्मा की सही भागीदारी के प्रति सचेत रहता है उसकी आत्मा दोषों
से मुक्त हो स्वस्थ कर्मों को करने वाली बनती है । इस संसार में कोई भी मनुष्य
पूर्ण रूप से सही नहीं है । परंतु जो मनुष्य अपनी आत्मा की त्रुटि सुधार के लिये
सत्यनिष्ठा से प्रयत्नशील होता है वह इन्ही प्रयत्नों को करते करते दिव्य आनंदमय
चिर शांति को प्राप्त होता है ।
आत्मा में
व्याप्त त्रुटियाँ व उनके सुधार का ज्ञान मस्तिष्क की दशा के परीक्षण से सम्भव
होता है । यदि मस्तिष्क में काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता की स्थिति पायी जाय तो
निष्चय ही आत्मा रोगों से ग्रसित है । यदि मस्तिष्क अनुकूल कर्म फलों से हर्षित ना
हो और विपरीत कर्म फलों से दु:खी ना हो तो आत्मा विकारों से रोगों से मुक्त हो गयी
जानी जाय । ऐसी रोगा मुक्त आत्मा अपने स्वरूप में ब्रम्ह की गरिमा का बोध करती है
। ऐसी आत्मा ही ब्रम्ह की सत्य अभिव्यक्ति होती है । ब्रम्ह अपने को ऐसी आत्माओं
के माध्यम से ही प्रगट करता है । ऐसा व्यक्ति ही ब्रम्ह में जीवन जीता है ।
मस्तिष्क की दशा
के उपरोक्तानुसार लक्षण से अपने को परीक्षित करते हुये अपने सुधार का प्रयत्न करना
फलदायी होता है । प्रयत्नों द्वारा ही सफलता मिलती है ।
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