परम् ब्रम की
दिव्य शांति की अनुभूति इसी वर्तमान शरीर में जीवन यापन करते हुये अनुभव की जा
सकती है । इसके लिये मात्र अंकुश करना होगा मस्तिष्क में उठने वाले इच्छाओं और
क्रोध के आवेग को । जो मनुष्य अपनी इच्छाओं और क्रोध के ऊपर पूर्ण नियंत्रण कर
सकेगा वह इसी जीवन में दिव्य शांति को प्राप्त कर सकेगा ।
शक्नोतीहैव य:
सोढुं प्राक्शरीर्विमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं सा युक्त: स सुखी नर: ॥
जो मनुष्य इस
जीवन के रहते अपने अंदर उठने वाले इच्छाओं और क्रोध के आवेग को विजय कर सकेगा वही
योगी है वही सुखी इंसान है ।
समस्त दु:खों का
कारण इच्छायें होती हैं । इच्छा की पूर्ति ना होने की दशा में क्रोध होता है । यह
दोनों ही अशांति के मूल हैं । इसीलिये इन अशांति उत्पन्न करने वाले इच्छा और क्रोध
पर विजय करने वाला परम् शांति को प्राप्त होगा ।
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