ज्ञानीजन जिन्हे
कि अपनी आत्मा का अनुभव हो गया है और जो आत्मा में ब्रम्ह की गरिमा और मर्यादा को
चरितार्थ करते हुये जीवन जीते हैं वह अपने को कंचिद छोटे से छोटे कार्य यथा सांस
लेना, सूघना, सुनना, स्वाद का अनुभव करना आदि के लिये
भी अपने को कर्ता नहीं मानते हैं । ऐसे ज्ञानीजन ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप
प्रकृति को कर्ता मानते हुये अपने को सेवक के रूप में समस्त कर्मों को करते हैं ।
उनका मानना होता है कि प्रत्येक इंद्रिय अपने वस्तु के द्वारा पूर्णरूप से वश में
की हुई है ।
उपरोक्त के
विपरीत अहंकारी व्यक्ति अपने को समस्त कर्मों का कर्ता मानते हैं । जबकि उनके
अहंकार का आधार पूर्णरूप से प्रकृति निर्मित क्षणभंगुर पल पल बदलने वाले अवयवों पर
लम्बित होता है । इसलिये पूर्णरूप से भ्रामक होता है । अहंकार के बाह्य स्वरूप
अथवा उसके परम् अंत:करण में भी कोई स्थायी अंश नहीं होता है । इसके बावज़ूद अहंकारी
व्यक्ति सर्वथा कर्तापन के भ्रम से ओतप्रोत रहता है ।
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