शुक्रवार, 28 मार्च 2014

अज्ञान का आवरण

ब्रम्ह का अंश आत्मा । ब्रम्ह की रचना प्रकृति । ब्रम्ह चिर दिव्य शांत आनंद । प्रकृति क्षणभंगुर भ्रामक विनाशी । ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय । ब्रम्ह को जानना ही ज्ञान । आत्मा की अनुभूति का होना ज्ञान है । आत्मा ना ही पाप में सम्मलित होती है और ना ही गुणों को धारण करती है । परंतु जैसा कि रचना है आत्मा भ्रामक प्रकृति के आवरण में ढकी हुई है । यही प्रकृति का भ्रामक आवरण ही अज्ञान है । इसी अज्ञान के प्रभाव से जीव समस्त दु:खो को भोग रहा है । ज्ञान पाने के लिये भ्रामक अज्ञानके आवरण को हटाना होगा । ज्ञान का प्रकाश व्याप्त हो जाने पर अज्ञान का अंधकार विलीन हो समाप्त हो जावेगा । ज्ञान पाने के लिये केवल अज्ञान के आवरण को हटाना है । प्रकृतीय मोंह को त्यागना है । 

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