प्रकृति के मध्य
में ब्रम्ह का अंश आत्मा । प्रकृति और आत्मा की परस्पर क्रिया से समस्त गतिविधि ।
विचारणीय हो जाता है कि मनुष्य के अस्तित्व का परिचायक किसे माना जाय ? उसकी आत्मा को अथवा उसकी प्रकृति को । उत्तर है
आत्मा को । आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृतीय शरीर से ज्ञेय नहीं है । ऐसे
में उत्कृष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण के लिये आत्मा को कैसे उत्कृष्ठ बनाया जाय ।
आत्मा का क्या स्वरूप होगा जब इसे उत्कृष्ठ कहा जावेगा । आत्मा के आदर्श स्वरूप को
श्रीमदभागवद गीता में निम्नवत बताया गया –
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: ।
न कर्मफलसंयोगं
स्वभावस्तु प्रवर्तते ।।
आत्मा ना ही
किसी कर्म में कर्ता का बोध करे, ना ही अन्य के लिये कार्य के लिये
प्रतिस्थापित कर्ता के रूप में कार्य करे, ना ही कार्य को कार्य के फल के साथ सँयुक्त करे, और कर्म को करने वाले के स्वभाव के रूप में ग्रहण
करे ।
आत्मा के आदर्श
स्वरूप का स्वच्छ निरूपण । सर्व प्रथम वाँक्षित गुण कहा गया कि कर्म में सम्मलित
हो परंतु कर्म का कर्ता ना बने । कर्तापन का अहंकार ना व्याप्त होवे । कर्ता भिन्न
है मैं आत्मा तो मात्र अपना कर्तब्य निर्वाह कर रहे हैं कार्य में सम्मलित हो ।
द्वितीय वाँक्षना कही गयी कि किसी अन्य के लिये agent प्रतिस्थापित कर्ता के रूप में कार्य में सम्मलित ना
होवे । अन्य कौन हुआ ? प्रकृतीय शरीर की इंद्रियाँ ।
तृतीय वाँक्षना बतायी गयी कि कार्य का कार्य के परिणाम से सम्बंध ना जोडे । जो
कार्य प्रकृति की प्रेरणा से प्रकृतीय शरीर के किसी भाग द्वारा प्रवृत्त हो रहे
हैं मात्र उसी में सम्मलित हो जाय । अपने किसी निमित्त के लिये प्रकृतीय शरीर के
किसी अंग को कार्य में प्रवृत्त होने के लिये चेष्टा ना करे । इन समस्त अपेक्षाओं का
कारण भी स्पष्ट किया कि प्रकृतीय शरीर के प्रयेक अवयव में प्रकृति ने कार्य करने
की स्वाभाविक क्षमता प्रदान की है ।
उपरोक्त विवरण
में आत्मा का कार्य में सम्मलित होने में क्या स्वरूप होना चाहिये बताया गया । तीन
वाँक्षनाये बतायी गई । दो उसके कार्य में सम्मलित होने के स्वरूप से सम्बंधित । एक
उसके कार्य में सम्मलित होने के निमित्त से सम्बंधित । कार्य में सम्मलित होने का
स्वरूप जो कि कर्तापन से पूर्णतया अछूता । निमित्त अपेक्षा मात्र कर्तव्य ।
आत्मा का
उपरोक्त आदर्श स्वरूप बने कैसे ? एक मात्र उपाय योग ।
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