शुक्रवार, 7 मार्च 2014

आत्मस्वरूप

प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । यह बहु स्तरीय है । प्रत्येक स्तर पर नियंत्रण है । प्रत्येक स्तर भिन्न होते हुये भी अन्य स्तर को प्रभावित करने वाले होते हैं । यह एक ऐसी अद्भुद वैज्ञानिक रचना है कि स्वयँ अपने रचनाकार को अपने वश में करने में सफल होती है । साकार ब्रम्ह प्रकृति की कृपा के अवलम्ब पर ही कोई भी अध्ययन व क्रियांवन सम्भव हो सकता है । इन्ही कारणों से मस्तिष्क की योग की अवस्था के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप को आत्मसात करना परम् आवश्यक होता है ।
आत्मा प्रकृति के मध्य प्रकृति के प्रयोजन को पूरा करने के लिये स्थापित है । बलशाली प्रकृति आत्मा को मोंह के जाल में बाँध कर रखती है । मोह ग्रसित आत्मा अपने कर्तव्य पथ से च्युत होता है । यह प्रक्रिया अनादि काल से चलती आयी है । इससे उबरने के लिये सज्ञान पूर्वक सचेत प्रयत्नों की आवश्यकता होती है । सचेत प्रयत्न अर्थात योग की अवस्था में कर्मों को करने का अभ्यास ।
मस्तिष्क ही वह स्थल है जहाँ पथ से विचलित होने का सृजन होता है । मस्तिष्क से ही भूली हुई आत्मा को अपने मूल स्वरूप को वापस पहुँचने का मार्ग भी मिलता है । सकल विकृति और सकल सुधार का एक मात्र स्थल मस्तिष्क होता है । जो व्यक्ति जितना ही सचेत हो इस मस्तिष्क को काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता के उन्मादों से सुरक्षित करते हुये इसे शांत दशा में कार्य में प्रवृत्त कर सकेगा उतना ही त्रुटिरहित कर्म को कर सकेगा ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण योग का ज्ञान बताते हुये सदैव इसी तत्य को महत्वपूर्ण बताये हैं कि मस्तिष्क सदैव आत्मा के ब्रम्ह स्वरूप का स्मरण स्थिर रखते हुये कार्य में संलग्न होने की दशा में ही त्रुटिरहित कर्म सम्भव होगा । ब्रम्ह अपनी रचना प्रकृति से पूर्णतया अछूता रहता है । तद्नुसार आत्मा को पूर्णतया प्रकृतीय मोंह से च्युत रहना मुक्त रहना अपेक्षित होता है। यही स्थिति पाने के लिये मस्तिष्क में आत्मा का स्वरूप स्थिर रहना आवश्यक कहा गया । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें