जैसा कि कर्म
मार्ग के वर्णन में अंकित किया जाता रहा है कि कर्म दोष उत्पन्न करने का श्रोत
होता है मस्तिष्क में व्याप्त इच्छायें । कर्तापन का अहंकार । प्रकृति के प्रति
मोंह । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । अत: कर्म मार्ग से कर्मों को सुधारने के
प्रयत्नों की चर्चा में प्रत्येक स्तर पर यह अंकित किया गया कि उपरोक्त दोष
उत्पन्न करने वाले प्रकृतीय मोंह को त्यागना होगा । इसी उपलब्धि के लिये योग का पथ
बताया गया । योगावस्था में कार्य करने का पथ । योगावस्था जिसमें मस्तिष्क के ऊपर
कार्य के फल का मस्तिष्क पर प्रभाव ना पडे । कार्य को करने का निमित्त कार्य ही हो
। कार्य को करने वाली प्रकृति है इसका बोध मस्तिष्क को सदैव प्रतिपल स्मरण रहे ।
परंतु विडम्बना यह है कि अनादि काल से शरीरों की यात्रा करते चली आयी आत्मा को
इच्छा के अधीन कार्य करने का अभ्यास इस प्रकार उसका स्वभाव बन गया है कि उसे
त्यागना उसे लगता है कि जैसे जीवन को ही त्यागना है । इसलिये कुल ज्ञान सुनने अथवा
पढने के बाद जब उसे करने की पारी आती है तो उसे लगता है कि जैसे फिर जीवन में बचेगा
क्या । इसलिये वह यही निर्णय करता है कि ढीक है सब ज्ञान परंतु जीवन यही अच्छा है
जो जी रहे हैं । इच्छाओं का पीछा करते । दु:ख भोगते । इसमें फिर ज्ञान का क्या
कार्य । प्रकृतीय मोंह इतना प्रबल होता है । प्रकृति की महिमा इतनी व्यापक होती है
कि इससे उबरने के लिये असाधारण दृढता की आवश्यकता होती है ।
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