वह मनुष्य जिसने
अपनी आत्मा का बोध कर आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा के अनुरूप आचरण में प्रवृत्त करते
हुये कार्य के फल के प्रति विरक्ति रखते हुये अपने कार्यों को करता है वह प्रकृतीय
मोंह से मुक्त होकर शांत आनंदमय जीवन का भोग करता है । इसके विपरीत जो मनुष्य
आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा के प्रति अचेत रहते हुये कार्य में प्रवृत्त करता है वह
इच्छाओं के वेग से ग्रसित होकर फल की कामना से कार्यों को करने को प्रवृत्त होता
है । परिणामत: वह प्रकृतीय मोंह में बँधता है ।
वस्तुत: मोक्ष
अथवा बंधन यह दोनो ही दशाये कार्य में प्रवृत्त होने के निमित्त से और कार्य सम्पादन
काल में मस्तिष्क की स्थिति से सम्बंधित होती हैं । कार्य में प्रवृत्त होने का
निमित्त यदि इच्छाओं की पूर्ति करना है तो निश्चय ही प्रकृतीय मोंह में वृद्धि
होगी । इसके विपरीत यदि कार्य में प्रवृत्त होने का निमित्त प्रकृतीय आदेशों की
पूर्ति और आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा का निर्वाह है तो मोह से मुक्ति मिलेगी । कार्य
के फल की इच्छा ही बंधन होता है । यह उसी दशा में समाप्त हो सकता है जब कि कार्य
करने का निमित्त आत्मा की ब्रम्हीय गरिमा की मर्यादानुसार निर्धारित किया जाय ।
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