शनिवार, 1 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

योग की चर्चा की अवधि में यह सतत वर्णन किया गया कि कर्म की गुणवत्ता सीधे रूप से प्रभावित होती है मस्तिष्क की यथा स्थिति द्वारा । मस्तिष्क में संचित पूर्व की स्मृतियाँ मस्तिष्क में व्याप्त पूर्वाग्रह मस्तिष्क में व्याप्त इच्छायें यह सभी कार्य की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं । गत अंक के लेख में परिभाषित किया गया था पाप और पुण्य । यह श्रेणियाँ थी कर्म की । एक वर्गीकरण था कार्य की गुणवत्ता का । आज की चर्चा है कार्य करने के लिये मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले कारणों के सम्बंध में । कारण जो कार्य करने के लिये उद्देष्य बनते हैं । कार्य करने का कारण बनते हैं ।
इन कारणों का वर्गीकरण किया जाता है इनके पृष्ठभूमि में निहित उद्देष्य के आधार पर । उद्देष्य स्वयँ अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु । उद्देष्य अपने स्वयँ से भिन्न व्यक्ति अथवा समुदाय के हित के लिये । उद्देष्य सृजनात्मक गतिविधियों के लिये । उद्देष्य विध्वंसक गतिविधियों के लिये । वर्गीकरण में सात्विक उन उद्देष्यों को कहा गया जिनका निमित्त अपने से भिन्न व्यक्ति या समुदाय के लिये सृजनात्मक कार्यों के लिये होंवे । तामसिक उन उद्देष्यों को कहा गया जो असंवैधानिक कार्यों को प्रचलित सामाजिक नियमों का उलंघन करते हुये करने को लक्षित होंवे । राजसिक उन उद्देष्यों को कहा गया जो उपरोक्त दोनों नामत: सात्विक व तामसिक का मिश्रित स्वरूप वाले होंवे ।
सामाजिक विचारों से सात्विक को श्रेष्ठ कहा जावेगा । तामसिक को त्याज्य कहा जावेगा । राजसिक एक औसत पथ । आम प्रचलित । बुराइयाँ सात्विक में भी होतीं हैं । तामसिक बुरा होते हुये भी कतिपय गुणों से युक्त होता है । अच्छा या बुरा जो भी है वह समीक्षा योग्य होता है । इन्ही कारणों से योग की मस्तिष्क की अवस्था के लिये बताया गया था कि कार्य ही कार्य का निमित्त होवे । कोई भी अन्य निमित्त समीक्षा के दायरे में आयेगा । चाहे वह इच्छा की पूर्ति के कारणों से प्रेरित होवे । अथवा परमार्थ के निमित्त से प्रेरित होवें । अथवा अन्य तामसिक उद्देष्यों से प्रेरित होवें । सभी समीक्षा के दायरे में आयेगें ।
कार्य करने का कारण जितना ही सही होगा उतना ही गुणवत्ता पूर्ण कार्य होगा । सर्वोत्तम किसी भी समीक्षा से परे होगा । योग द्वारा सुझाया गया कारण । कार्य ही कार्य करने का कारण होवे ।

यह एक प्रचलित तरीका बना हुआ है कि किसी कार्य को करने का कोई कारण होवे । इन कारणों के विचार आने पर सबसे सरल विकल्प आता है इच्छा की पूर्ति । इस विकल्प की समीक्षा होने की दशा में व्यक्ति वही इच्छा पूर्ति परमार्थ का आवरण बना कर करना लक्षित करता है । यह पथ भी समाज में आम प्रचलित पथ है । तामसिक तो फिर ताम,असिक ही है । इन सबके विपरीत योगी के कार्य करने का कारण होता है स्वयँ वह कार्य । प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य । बिना कार्य के परिणाम की कामना के कार्य । एक आम नागरिक कार्य को उद्यत होता है किसी कारण के उपस्थित होने पर । एक योगी कार्य को उद्यत होता है कार्य के उपस्थित होने पर । योगी कार्य करने की प्रेरणा ग्रहण करता है कार्य से ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें