सोमवार, 3 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में । तीनों गुण आवरण हैं । इन्ही आवरणों में अपने को ढक कर आत्मा में व्याप्त मोंह प्रगट होता है । मोंह के रहते कर्म त्रुटिपूर्ण होने ही होने हैं । मोंह का त्याग ही विरक्ति है । प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकारना है । यही मोंह का आवरण हमें दूर रखता है अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह की अनुभूति से । हम प्रकृति के रूप और गुण के प्रति इतना संलग्न रहते हैं कि अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह का अनुभव नहीं कर पाते हैं । जिस पल यह मोंह छूटेगा उसी क्षण दिव्य ब्रम्ह की सुखानुभूति का अनुभव मिलेगा । ब्रम्ह ने अपने को प्रकृति के रूप में प्रगट किया है । उसके प्रगट स्वरूप में मोंह कर उस मूल ब्रम्ह की चेतना विस्मृत हो जाती है । इन्ही कारणों से वैराग्य को बताया गया । उस गुणों के आवरण को त्याग मूल प्रकृति की सत्ता को स्वीकरने का परामर्ष । हम परोपकार कर रहे हैं । हम तामसिक प्रवृत्तियों की पूर्ति कर रहे हैं । हम दूसरे के ऊपर वर्चस्व स्थापित कर रहे है । यह सभी हमारे मोंह की अभिव्यक्ति है । मोंह त्याज्य है । इसलिये सतगुण, तमोंगुण, और रजोगुण को त्याग प्रकृति द्वारा आदेशित एवं अपेक्षित कर्म किये जाँय यह योग्य मत है । कर्ता प्रकृति है । प्रकृति की अपेक्षा की पूर्ति हमारा धर्म है ।

आवरण के हटने से ब्रम्ह का दर्शन होगा । आत्मा पर आच्छादित मोंह हमें ब्रम्ह की अनुभूति से दूर किये हुये है । वैराग्य होना शांति की उपलब्धि है । 

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