गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मुक्ति का साधन

ज्ञान (ब्रम्ह) का अंश आत्मा को अज्ञान (प्रकृति) के आवरण (शरीर) में रखा गया है । उद्देष्य होता है प्रकृति के प्रयोजनों की पूर्ति । प्रकृतीय गुणों के मोंहवश आत्मा अपने उद्देष्य के प्रति अचेत हो जाता है । यही मोंह उसका बंधन है । इसी बंधन के अधीन वह दु:ख भोगते इस शरीर उस शरीर की यात्रा करता है ।
मुक्ति का विचार करने पर दो पथ सम्मुख होते हैं । जिन्हे आत्मा विश्वास है उनके लिये कर्म पथ । कर्मों को सज्ञानपूर्वक करते मोंह बंधन से मुक्ति पाँवें । जिन्हे आत्मविश्वास नहीं है उनके लिये भक्ति पथ । प्रकृति की कृपा पर आश्रित होकर मुक्ति पाँवें ।

प्रकृति ही बंधन का कारण भी है । उसे ही मुक्ति का साधन बनावें । उसकी कृपा का पात्र बनकर । यदि प्रकृति आत्मा को किसी कारण मोंह बंधन में बाँधती भी है तो प्रकृति ही किसी परिस्थिति विषेस में आत्मा को मुक्ति भी देती है । प्रकृति ही बंधन का निमित्त भी है और प्रकृति ही मुक्ति का साधन भी है ।  

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

लक्ष्य करें मुक्ति

इस जीवन मृत्यु के चक्र में यात्रा करती आत्मा की इस चक्र से मुक्ति । यह तभी मिल सकेगी जब आत्मा अपने ऊपर आच्छादित प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो सकेगा । क्योंकि आत्मा उस चिर दिव्य परमात्मा में विलय के लिये उसी दशा में योग्य पात्र बनेगा जब वह अपने परमात्मा से विलगाव के समय की मौलिक स्वरूप अर्थात प्रकृतीय मोंह से मुक्त को प्राप्त कर लेगा । इस सत्य को कोई दूसरा सत्य पदस्थापित नहीं कर सकता ।
मुक्ति के लिये पथ का प्रश्न विचाराधीन होने पर गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि जिन्हे आत्मविश्वास है अपने कर्म पर नियंत्रण है उन्हे अपनाना होगा कर्म पथ । कर्म पर नियंत्रण अर्थात इच्छाजनित कर्मों का पूर्ण रूप से त्याग । परंतु यह पथ है किये जाने वाले कर्मों में कर्म फल की लिप्सा के त्याग का । सन्यास का । इसे दृढप्रतिज्ञ ही निर्वाह कर सकेगा । यह प्रवृत्ति है । कर्म करते हुये मुक्ति । इसके विपरीत निर्वृत्ति । ब्रम्ह के प्रगटस्वरूप प्रकृति सगुण ब्रम्ह की कृपा द्वारा मुक्ति । भक्ति पथ ।

दोनों ही पथों कर्म द्वारा अथवा भक्ति द्वारा एक ही लक्ष्य मुक्ति की यात्रा । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । यह लक्ष्य पर्याय है आत्मा की जन्म मृत्यु के दौर से मुक्ति । यह लक्ष्य पर्याय है चिर दिव्य ब्रम्ह के चिर आनंद में समाहित होने का । इस लक्ष्य को लक्षित करना ही जीवन का योग्य उपयोग है ।  

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

विक्षेप से मुक्त

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस मनुष्य की आत्मा समस्त प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाती है वह आवा-गवन अर्थात जन्म-मृत्य के इस समुद्र से मुक्त करदी जाती है और परम् ब्रम्ह के स्वरूप में विलीन हो जाती है ।
आत्मा जो कि परम् ब्रम्ह का ही अंश होती है । उसे प्रकृति के मध्य रखने का प्रयोजन होता है । प्रकृति के प्रयोजनों की पूर्ति ही लक्ष्य होता है । इस लक्ष्य को प्राप्त करना आदर्श आचरण होता है । आत्मा प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होकर इस लक्ष्य को पाने से च्युत होती है । यह विक्षेप ही उसको इस शरीर उस शरीर की यात्रा का निमित्त बनता है । इसलिये जो आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त होगी उसे आवागवन से मुक्ति मिलेगी । परम् ब्रम्ह के शाश्वत् पद में स्थान मिलेगा । वह चिर दिव्य शांति का भोग करेगा ।

समस्त अशांति का मूल विक्षेप है । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होना है । स्मरणीय है कि मूल स्वरूप में आत्मा ब्रम्ह की गरिमा से युक्त होता है । विक्षेप उसकी विकृति है । विकार से मुक्ति ही उसे पुन: श्रीपद में स्थान दिलाने वाला है । कर्म साधन है । 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

आराधना ध्यान समर्पण

निर्गुण ब्रम्ह का स्वरूप जाना नही जा सकता । उसके स्वरूप की कोई कल्पना नहीं की जा सकती । क्योंकि वह पूर्ण रूप से अलौकिक स्वत: अस्तित्व है । उसे जानने के समस्त उपलब्ध साधन लौकिक जगत के हैं । ऐसे में जब निर्गुण ब्रम्ह की आराधना करने का या ध्यान करने का अथवा उसके प्रति समर्पित होने का लक्ष्य मस्तिष्क में धारण कर कोई प्रयत्नशील होता है तो उसके सामने सबसे पहली और ज़टिल समस्या यह उपस्थित होती है कि वह कौन सा रूप मस्तिष्क में धारण करके उसकी आराधना करे या उसका ध्यान करे अथवा उसके प्रति समर्पित होवे । आम अभ्यास यह होता है कि किसी की आराधना करने या ध्यान करने अथवा उसके प्रति समर्पित होने के लिये उसके रूप की कोई छवि मस्तिष्क में होनी चाहिये ।

उपरोक्त के विपरीत निर्गुण ब्रम्ह के प्रकृतीय स्वरूप अर्थात सगुण ब्रम्ह की आराधना या ध्यान अथवा उसके प्रति अपने को समर्पित करने की दशा में साधक के सम्मुख मस्तिष्क में धारण करने के लिये एक निष्चित स्वरूप की छवि उपलब्ध होती है । इसलिये तुलनात्मक रूप से यह सुगम होता है । सगुण ब्रम्ह को जीव के प्रति करुणामय, दयामय, वात्सल्य भाव, रक्षक भाव के विभिन्न स्वरूपों में बताया जाता है । तद्नुसार उसकी अनेको छवियाँ प्रचलित की गई हैं । इसलिये साधक को सगुण ब्रम्ह की आराधना या ध्यान अथवा उसके प्रति समर्पित होना आसान लक्ष्य होता है ।  

रविवार, 13 अप्रैल 2014

निर्गुण सगुण

ब्रम्ह चिर दिव्य शांत स्वत: अस्तित्व है जो कि पूर्णतया अलौकिक है । इसे लौकिक जगत के ज्ञेय मानको से जाना नहीं जा सकता है ।
प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति है । रचना है । यह गुणों से युक्त है । ज्ञान के लिये सुलभ है । यही मनुष्य के लिये ज्ञेय सीमा भी है ।
योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य करने का सुझाव । कर्मयोग । यह सगुण प्रकृति की सेवा का ही सुझाव है ।
इसी प्रकृति को ही ब्रम्ह का साकार रूप मान ब्रम्ह की ही सेवा का भाव संजो कार्य में तत्पर होना ही सगुण उपासना है ।

चारो वेद इसी सगुण ब्रम्ह की अस्तूति गाते हैं । 

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

प्रकृति देव

गुरू योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुये बताते हैं
जो मनुष्य मेरे प्रकृति स्वरूप को ईश्वर के समान सम्मान मस्तिष्क में धारण कर पूर्ण समर्पण की भावना से अपने समस्त कर्मों को सेवा भाव से करता है उसे कर्मयोग की उपलब्धि होती है ।

परम् ब्रम्ह पूर्णतया अलौकिक स्वत: स्तित्व है उसका प्रगट ज्ञेय स्वरूप प्रकृति है प्रकृति भी ईश्वर तुल्य है इसमें सृजन क्षमता है, पालन क्षमता है, संहार क्षमता है वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति अपनी समस्त संतानो  जीवों को प्यार करती है उनकी हर सम्भव सहायता करती है । उन्हे अपने समस्त सुधार के प्रयत्नों में उनको सफलता प्रदान करती है । 

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

प्रकृति विज्ञान

परम् ब्रम्ह ने प्रकृति के रूप में अपने विज्ञान को प्रगट किया है । इस विज्ञान की महिमा कि यह मानों निर्गुण निर्विकार ब्रम्ह को जैसे प्रगट करता है । इस विज्ञान की महिमा कि जैसे यह कर्ता ब्रम्ह की कर्ता क्षमता को मानो प्रगट करता है । इस विज्ञान की महिमा की यह प्रकृति सृजन क्षमता, पालन क्षमता, तथा संहार की क्षमता से युक्त है । इस विज्ञान की अद्भुद क्षमता कि यह प्रकृति अपने अंदर संजोये हुये है वह क्षमता कि यह समस्त भोगों की स्वयँ भोक्ता भी है, समस्त आहुँतियों की ग्रहणकर्ता भी है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस मनुष्य को परम् ब्रम्ह के उप्रोक्त वर्णित प्रकृत विज्ञान का स्वच्छ स्वरूप दर्शन हो जाता है वह फिर अपने कर्तापन के अहंकार को मिटा ब्रम्ह की अनुभूति में ब्रम्ह की गरिमा में विलीन हो जाता है ।
इस सृष्टि में जो कुछ भी कर्म हो रहा है वह समस्त ब्रम्ह स्वयं अपने ही कर रहा है । यह प्रकृति के रूप में फैला हुआ उसका अद्बुद विज्ञान कर रहा है । ब्रम्ह ने इस विस्तृत प्रकृति की व्यापक विज्ञान क्षमता को प्रगट करने के लिये ही अपने ही अंश आत्मा को इस प्रकृति के मध्य भ्रमित होते व्यक्त किया है । जो आत्माधारक इस सत्य को अनुभव कर अपने को इस प्रकृति की कृपा के लिये प्रकृति को अर्पित कर देता है उसे प्रकृति विषेस कृपा स्वीकृत करते हुये उसके मित्र के रूप में, उसके गुरू के रूप में, उसके माता-पिता के रूप में, उसके हितैषी के रूप में उसे रक्षा कवच भी प्रदान करती है । परंतु यह समस्त कृपा उसे एक ही दशा में प्रकृति प्रदान करती है जब वह अपने प्रकृतीय मोंह रूपी व्याधि से मुक्त होने के लिये सचेष्ट होने में प्रकृति से याचना करता है । याचना भी पूर्णसमर्पण द्वारा ।

इस व्यापक प्रकृति में ब्रम्ह का व्यापक विज्ञान पिरोया है । यह दोष सृजन भी करती है । दोष का निवारण भी करती है । यह मोंहमें नचाती भी है । उबारती भी है । इससे संघर्ष करके कोई पार नहीं पा सकता । इससे पार पाने का एक ही उपाय है इसकी कृपा । जो महात्मा इसकी कृपा का पात्र बनजाता है उसे इसकी कृपा के प्रभाव से उपरोक्त विज्ञान भी विदित हो जाता है और प्रकृतीय मोंह की व्याधि से मुक्ति भी पाता है । परिणामत: वह ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति का भोग करता है । यह व्यापक प्रकृति समस्त सृष्टि की शासक है । धारक है । नियंत्रक है । मित्र भी है । गुरू भी है । माता-पिता भी है । शत्रु भी है । कृपालु होने पर सहायक भी है । यह समस्त रूप ब्रम्ह के विज्ञान की महिमा के प्रभाव से उसमें हैं । ब्रम्ह के इस व्यापक विज्ञान के कृपापात्र बन इसकी कृपा के माध्यम से ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति का भोग करें । यह योग्य मत है ।