आत्मा अपने
मौलिक स्वरूप में ब्रम्ह की चिर दिव्य शांति से युक्त होता है । आत्मा की यह चिर
दिव्य शांति प्रकृतीय मोंह के विकार से बाधित होती है । परिणामत: अशांति प्रगट
होती है । इसलिये जो भी मनुष्य अपने को प्रकृतीय मोंह से सुरक्षित करने में सफल
होगा वह अपनी आत्मा के मौलिक चिर दिव्य शांति का अनुभव कर सकेगा । ब्रम्ह के शांत
स्वरूप का भोग कर सकेगा । समस्त कलह विकार पराजित होंगे । समस्त अशांति का श्रोत
प्रकृतीय संसर्ग के माध्यम इंद्रीय गुणभोग होती है । इसलिये जो मनुष्य अपनी
इंद्रीय गुणों के भोग की आसक्ति को विजय करने में सफल होता हैं वह आत्मा में
विद्यमान चिर दिव्य शांति के रस का भोग करेगा । ब्रम्ह हमारे आपके अंदर विद्यमान
है । मात्र वह व्याधियों से आच्छादित है । उस ब्रम्ह को पाने के लिये हमें कुछ भी
अन्य नहीं करना है बल्कि मात्र जो व्याधियाँ उसे ढके हुये हैं उन्हे नोचकर हटा
देना है । व्याधियों को हटजाने पर भोक्ता आत्मा अपने चिर दिव्य शांति का रसभोग
स्वयं करेगी । यह ऐसा रस है जो कि इसी रसमें ही मिलेगा कहीं अन्यत्र नहीं । जो
आत्मा अपने ही आनंद रस का भोग करेगी वह फिर प्रकृतीय मोंह की ओर प्रवृत्त नहीं
होगी । ज्ञान अज्ञान के आवरण से ढका हुआ है । अज्ञान के अंधकार को ज्ञान का प्रकाश
ही पराजित करेगा ।
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