श्रीमद भागवद गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण
भक्त अर्जुन को धर्म दर्शन का ज्ञान बताते हुये सर्वाधिक महत्व कर्म सम्पादन को देते
है । मनुष्य का कर्म सम्पादन यदि कर्म संविधान के प्राविधानो के अनुकूल है तो निश्चय
ही उत्कृष्ट स्थितियाँ उसे मिलनी ही मिलनी है । इसके विपरीत यदि मनुष्य का कर्म सम्पादन
कर्म संविधान के प्राविधानों के प्रतिकूल है तो उसे पतन की पराकाष्ठाओं को प्राप्त होना है । यह प्रकृति का
न्याय है । यह प्रत्येक मनुष्य पर बिना किसी भेद भाव के प्रभावी होता है । कर्म सम्पादन
की गुणवत्ता मनुष्य को प्राप्त मस्तिष्क की यथास्थिति तथा संचालन व नियंत्रण दक्षता
पर निर्भर करता है । योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते है कि जो मनुष्य अपने मस्तिष्क में उत्पन्न
होने वाले मोह को नियंत्रित कर अपने कर्तव्य दायित्व संचालन का निर्वाह कर सकेगा वह
जीवन में समस्त उत्कृष्ट स्थितियों को प्राप्त करेगा ।
मस्तिष्क की संरचना व उसके कार्य पद्धति का
विज्ञान प्रकृति निर्मित होता है । चूँकी ब्रम्ह ने कार्य का दायित्व प्रकृति को सौंपा
है और मनुष्य जो की प्रकृतीय घटको द्वारा निर्मित रचना है के अंदर अपना अंश आत्मा प्रदान
किया है प्रकृति को सहायता प्रदान करने के उद्देष्य से इसलिये प्रकृति को मनुष्य से
अपने कार्य कराने हैं । यह लक्ष्य हासिल करने के लिये प्रकृति मनुष्य के मस्तिष्क का
सहारा लेती है । मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृति प्रत्येक कार्य के प्रति अनेकानेक
विकल्प प्रस्तुत करती रहती है । मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप विकल्प का चयन कर कार्य
करने का अभ्यासी बन कर्म संविधान का उलंघन करता है । यदि उत्कृष्ट स्थितियाँ हासिल
करनी हैं तो निष्चय ही उपरोक्त स्थिति को समझ अपने कार्य प्रणाली को सुधारना होगा ।
इच्छा जनित कार्यों को नियंत्रित करना होगा ।
समस्त उपलब्धि निर्भर करती है मनुष्य के मस्तिष्क
की कार्य दक्षता पर । मस्तिष्क की संचालन दक्षता पर । मस्तिष्क के नियंत्रण दक्षता
पर । कर्म पथ से कर्म दोष के निवारण की विधा में समस्त निर्देश मस्तिष्क को पुष्ट स्वस्थ्य
संचालन हेतु दक्ष बनाने के लक्ष्य से प्रतिपादित की गई है । इस उपलब्धि को हासिल करने
के लिये कतिपय आचरण संयम भी कहे गये है जो कि उपलब्धि में सहायक के रूप में योगदान
करने वाले है ।
शरीर एक यंत्र के समान है । इस यंत्र का सकल
संचालन नियंत्रण केंद्र मस्तिष्क है । स्वाभाविक रूप से यंत्र द्वारा सम्पन्न सकल कार्य
की गुणवत्ता नियंत्रण केंद्र मस्तिष्क की संचालन गुणवत्ता के अनुरूप होगी । इसलिये
समस्त महत्व का केंद्र मस्तिष्क है । इसी को कुशल दक्ष बनाना प्रत्येक शिक्षा प्रणाली
का लक्ष्य होता है । धर्म दर्शन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सरल आचरण उपाय सुझाता
है जिसे प्रत्येक शिक्षित तथा अशिक्षित व्यक्ति अपना कर लाभ पा सकता है ।