शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

कर्म प्रधान सृष्टि में कर्म ही आधार है समस्त प्रगति का । चाहे किसी व्यक्ति विषेस का विचार हो अथवा वर्ग विषेस का विचार हो अथवा संस्था विषेस का विचार हो अथवा शासन तंत्र का विचार हो यह बात समान रूप से लागू होती है । इस विचार से कर्म के माध्यम से कर्म की त्रुटि का निवारण अत्यंत प्रभावी प्रमाणित होती है ।
किसी मनूष्य का जन्म किस वर्ग में हुआ किस माता पिता के मध्य हुआ किस स्तर के सामाजिक स्थिति के परिवार में हुआ निश्चय ही यह मनुष्य के वश में नहीं था । परंतु सही कर्म करते हुये जीवन जीना तो निश्चय ही प्रत्येक मनुष्य के अपने वश में होता है । यह बात तर्क और व्यवहार दोनों ही प्रकार के परीक्षण से सत्य प्रमाणित होती है । सामाजिक मानको से कमजोर वर्ग में और दलित आर्थिक स्थिति के माता पिता से जन्मी संतान भी अपने उत्कृष्ट कर्मों से उच्चतम स्थिति पाते है । इसके विपरीत उच्च सामाजिक स्थिति व धनाड्य परिवारो में जन्मे लोग भी निकृष्ट कर्म के श्राप से दयनीय स्थिति तक पहुँचते हैं । समस्त उपलब्धि कर्म की ही होती है । सही कर्म को जाने । कर्म करने की सही पद्धति को जाने । सही कर्म करना अपना अभ्यास बनावें । यही जीवन की सफलता है ।
कर्म के अध्ययन के प्रकरण में सबसे पहले अपनी शरीर में उपलब्ध कर्म सम्पादन अंगों को अच्छे से जाने । मनुष्य शरीर में दस इंद्रियाँ हैं । इनमें से पाँच केवल कर्म सम्पादन के लिये है । शेस पाँच दो कार्य करने वाली इंद्रियाँ है । पहला कार्य बाह्य संसार का ज्ञान ये इंद्रियाँ अंदर ले आती हैं । दूसरा कार्य कर्म भी करती हैं । दोनो प्रकार की इंद्रियों को अलग प्रकार से चिन्हित करने के लिये बाद में अंकित की गई दो कार्य में सक्षम इंद्रियों को ज्ञानेंद्रियों का नाम दिया जाता है । इन दसो इंद्रियों के अतिरिक्त एक अदद मस्तिष्क होता है मनुष्य के पास । इसकी स्थिति इंद्रियों के ऊपर होती है । यह इंद्रियों का नियंत्रक भी है । यह इंद्रियों का शासक भी है । इंद्रियाँ मस्तिष्क के नियंत्रण में ही कार्य करती है । इस मस्तिष्क से भिन्न एक क्षमता मनुष्य को प्रकृति ने दी है जिसे विवेक कहा जाता है । परंतु इसके स्थिति के लिये किसी विषेस अंग को नहीं बताया जा सकता कि यह विवेक इसी अंग में स्थिति होता है । इसकी कार्य पद्धति और कार्य क्षमता के आधार पर इसे मस्तिष्क में स्थित होने का तर्क किया जा सकता है परंतु यह पुष्ट नहीं है । उपरोक्त के अतिरिक्त और कोई भी अंग नहीं होता मनुष्य शरीर में जो कार्य सम्पादन में सम्मलित होता हो ।
उपरोक्त वर्णित कार्य में प्रयुक्त अंगो की कार्य शैली के सम्बंध में । इंद्रियाँ जो मात्र कार्य सम्पादन में प्रयुक्त होती हैं उनमें मात्र कार्य अभ्यास ही प्रभावी योगदान करने वाला होता है । उत्तम कार्य अभ्यास से उनकी कार्य गुणवत्ता प्रखर होती है । चूँकी ये अंग मस्तिष्क के निर्देश अनुसार कार्य करते हैं इसलिये कार्य के सही चुनाव अथवा गलत चुनाव या कर्म संविधान के अनुरूप कार्य अथवा कार्म संविधान के विपरीत कार्य जैसे विचारों के लिये इन्हे दोषी अथवा श्रेयमान नहीं ठहराया जा सकता । ये निष्ठावान सेवक होते हैं मस्तिष्क के । इनसे भिन्न ज्ञानेंद्रियों की कार्य शैली द्विपक्षीय होने से उनका कार्यकारी एक भाग अर्थात कर्म सम्पादन में तो उपरोक्त कथित कर्म करने वाली अन्य पाँच इंद्रियों के समान ही होता है परंतु दूसरा भाग बाहरी संसार का ज्ञान अंदर लाने वाले दायित्व में आंशिक रूप से मस्तिष्क के नियंत्रण में होती है और आंशिक स्वतंत्र होती हैं । इसलिये यदि कार्य त्रुटिपूर्ण पाया जाता है तो इन इंद्रियों को भी दोष में भागीदार होना सम्भावित होता है । इसलिये इन्हे सतर्कता की सूची में श्रेणीबद्ध किया जाता है ।  
षेस अगले अंक में  

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