कर्म पथ से कर्म दोष का निवारण
वास्तविकता में आत्म शोध द्वारा कर्म नियंत्रण का पथ है । इसमें साधक को अपने
स्वयं को पूर्ण सयंम में संतुलित रखते हुये जीवन यापन अर्थात अपने समस्त कार्य
दायित्व निर्वाह करने का पथ है । त्रुटि कोई भी हो निवारण सदैव त्रुटि के कारण को
निर्मूल करने से ही होता है । कर्म सृजन होता है प्रकृति और आत्मा की परस्पर
क्रिया से । प्रकृति और आत्मा किस प्रकार किस परिस्थिति में किस निमित्त से एक
दोसरे से वर्ताव करते है वही गुणवत्ता कर्म में प्रतिबिम्बित होती है । प्रकृति के
गुणों के मोह से आत्मा किस स्तर तक ग्रसित है अथवा उससे अपने को विरक्त रखती है
इसी का प्रगट स्वरूप होता है कर्म की गुणवत्ता । उत्तम परिणाम मात्र इच्छा से तो
प्रगट नहीं होंगे । संयमित एवं नियंत्रित कार्य शैली अर्थात प्रकृति और आत्मा की संयमित
और नियंत्रित परस्पर क्रिया का संचालन करने से सम्भव होगा । यही अभ्यास बन जाने की
दशा में सत्य उपलब्धि होगी । यही कर्म मार्ग का लक्ष्य होता है । इसे पाने के लिये
ही अपनी प्रकृतीय शरीर को भली भाँति जानना आवश्यक है । मात्र जानना ही नही अपितु
उसे नियंत्रित उपयोग करने की विधा भी जानना अनिवार्य है । मनुष्य के मस्तिष्क की
रचना व कार्य शैली की चर्चा को गत अंक के क्रम को सतत रखते हुये –
मस्तिष्क का तीसरा भाग । इस भाग में
समस्त निर्णय लिये जाते है । कर्म के चुनाव का निर्णय कर्म सम्पादन विधा का निर्णय
कर्म प्रेरणा का निमित्त चुनाव का निर्णय । इन्ही निर्णयों से उन्न्ति और पतन
प्रशस्थ होते है । निर्णय के प्रभाव से कर्म दोष भी पैदा होता है । निर्णय के
प्रभाव से ही दोष निवारण भी होता है । कर्म सम्पादन तभी प्रवित्त होता है जब
मस्तिष्क कर्म करने का निर्णय लेता है । मस्तिष्क कर्म करने का निर्णय तभी लेता है
जब निमित्त सम्मुख होता है । इस प्रकार उपरोक्त सभी परस्पर सम्बंधित होते हैं ।
कर्म की गुणवत्ता उपरोक्त सभी से प्रभावित होती है । संयम वर्तना होगा निमित्त के
निर्धारण में । संयम रखना होगा आत्मा के प्रकृतीय गुणों के मोंह से । नियंत्रण
रखना होगा प्रकृति और आत्मा के परस्पर पर । कर्म गुणवत्ता निखर जावेगी । अन्यथा
स्थिति कर्म दोष । कर्म का निमित्त जब तक इच्छा पर लम्बित होगा कर्म दोष निवारण
असम्भव । निमित्त शोधित कर जब इच्छा से प्रकृति के आदेश में पर्णित हो जावेगी तो
कर्म दोष लुप्त हो जावेगा । यह उपलब्धि मस्तिष्क के इसी तीसरे भाग के सही
नियंत्रित उपयोग द्वारा सम्भव होगी ।
प्रकृति ने मस्तिष्क की रचना में अद्भुद
विज्ञान को पिरोया है कि प्रतिपल यह यंत्र अनेको परस्पर विरोधी विकल्प प्रस्तुत
करता रहता है । चाहे निमित्त निर्धारण का अवसर है अथवा कर्म सम्पादन सम्पन्न करने
का निर्णय है अनेको विकल्प मस्तिष्क सम्मुख करता ही रहेगा । यही वह स्थल है जहाँ
इच्छायें गुप्त रहते हुये निर्णय को प्रभावित करती है । कार्य का निमित्त इच्छाओं
से प्रदूषित होने की दशा में कर्म दोष अपरिहार्य होगा ।
मस्तिष्क के इसी तीसरे भाग के निर्णय को
सदैव विवेक द्वारा परिक्षित कर उपयोग करने से ही कर्म दोष सुधार सम्भव होगा । निर्णय
सामान्य तौर पर स्मृति के उदाहरणों द्वारा लिये जाते है । आदर्श निर्णय होगा प्रकृति
के आदेशानुसार लिया गया निर्णय । इच्छाओं के रहते प्रकृति के आदेश जानना कठिन होता
है । इस मस्तिष्क का संचालन तथा नियंत्रण के लिये कोई दूसरा अंग नहीं है । इसलिये मस्तिष्क
का नियंत्रण मस्तिष्क ही करेगा साथ ही शेस दस इंद्रियों को भी नियंत्रित करेगा । स्वयँ
अपना नियंत्रण । शरीर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सक्षम अंग है मस्तिष्क । इसी का कुशल
संचालन कार्य की गुणवत्ता है ।
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