इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
प्रभु श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्षमण को जीवन जीने की
नीति बताई जिसे कि कवि ने निम्नवत् व्यक्त किया –
लक्षमण देखत काम अनीका । रहहिं धीर तिन्हकर जग लीका ॥
काम अर्थात प्रकृति का वह स्वरूप अथवा अभिव्यक्ति जिसके
माध्यम से मनुष्य की आत्मा कर्म संविधान को भुला इच्छा जनित कर्म प्रेरण की ओर
प्रवृत्त होता है । यह शब्द पाँचों ज्ञान इंद्रियों के विषयों को आच्छादित करता है
। सुंदर गंध, सुंदर मन-मोहक
दृष्य, सुन्दरवाद्य
धुने अथवा गीत, सुरम्य
वातावरण, स्वादिष्ट
व्यंजन । यह सभी आसक्ति सृजित करते हैं । प्रकृति प्रस्तुत करती है । आत्मा को
अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना अपेक्षित होता है इनके उपस्थित होने पर । प्रभु
बताते हैं कि उचित प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिये । धीर अर्थात सजग नियंत्रित ।
होता क्या है कि किन्ही परिस्थितियों में मनुष्य का मस्तिष्क बडी ही त्वरित गति से
ढेरों विकल्प उपस्थित करता है उस परिस्थिति के परिणाम के रूप में अथवा सम्भावित
उपलब्धि के रूप में । सामान्यतया मनुष्य उन्हीं उपस्थित किये गये विकल्पो में से
चुनाव शुरू कर देता है अपनाने के लिये । यही आसक्ति का प्रवेष द्वार है । यहीं से
गाडी अपने रेल से उतरती है । भगवान आगाह करते हैं – रहहिं धीर – सावधान यह प्रकृति का व्यापक फैला मनमोहक सुंदर स्वरूप देख
जो इसमें आसक्त नहीं होता – धैर्यवान रहता है – अपने मस्तिष्क में उठ रहे अनेकानेक प्रकार के उन्मादों के आगोश में नहीं
उलझता – धीर रहता
है । फिर उसके धीर रहने का फल उसे क्या मिलता है – तिन्हकर जग लीका – उन्हे ही संसार में श्रीमान उपाधि मिलती है – संसार में वह एक उदाहरण के रूप में बताये जाते है । उन्ही
का कर्म त्रुटिपूर्ण नहीं होता । ऐसे ही धैर्यवान व्यक्ति ब्रम्ह के कर्म संविधान
के अनुरूप कार्य करते श्रीमान बनते हैं ।
पुन: गत अंक के प्रसंग – ज्ञानी मुनियों द्वारा सगुण ब्रम्ह प्रकृति से क्या वरदान
मागा गया – को सतत
रखते हुये – ज्ञानी
मुनि सनकादि द्वारा माँगा गया वरदान । मुनि सनकादि के व्यक्तित्व को बताते हुये कवि
लिखता है –
ब्रम्हानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥
अपनी आत्मा की प्रतिपल जिसे अनुभूति बनी रहेगी वह सदैव
ब्रम्ह की अनुभूति करते में आनंदित विभोर रहेगा – उसे कहा जावेगा – ब्रम्हानंद सदा लयलीना । प्रकृति के काम विस्तार से सदैव
सतर्क । निरंकार । प्रकृति के मोह बंधन से प्रतिपल मुक्त । ऐसे व्यक्ति का
व्यक्तित्व सदैव स्फूर्ति उर्जा से भरपूर । नवयुवक । प्रकृति के सेवा हेतु प्रतिपल
तत्पर ।
रूप धरे जनु चारिहुँ वेदा । समदरसी मुनि विगत विभेदा ॥
जो मनुष्य प्रकृति की आसक्ति से बचा रहेगा उसे हर मनुष्य
में विद्यमान ब्रम्ह का अंश आत्मा के रूप में साक्षात ब्रम्ह दिखाई पडता रहेगा – उसे कोई बडा कोई छोटा – कोई सुंदर कोई असुंदर – कोई श्रेयमान कोई तिरस्कृत नहीं प्रतीत होगा । वह समदरसी
हो जावेगा । चारो वेद – प्रकृति का पूर्ण ज्ञाता । क्या उपलब्धि बची । मुनि जिसने हर सम्भव उपलब्धि हासिल
कर ली थी । आनंद की स्थिति भोग कर रहे थे । ब्रम्हानंद स्थिति ।
ऐसे मुनि श्रेष्ठ ने भी प्रभु श्रीराम से
वरदान माँगा –
द्वंद बिपति भव फंद विभंजय । हृद बस काम क्रोध मद गंजय ॥
हे प्रभु आप मेरे हृदय concept में सदैव निवास करिये और मेरे हृदय में प्रकृतीय आसक्ति व इच्छाओं
तथा इच्छा पूर्ति न होने की दशा में उभरने वाले क्रोध व कर्तापन के अहंकार को नष्ट
कर दीजिये प्रभो ।
परमानंद कृपायतन मनपरिपूरन काम ।
प्रेम भगति अनपायनी देहुँ हमहि श्रीराम ॥
भगति – ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कार्य सम्पादन । प्रेम – प्रति पल का अभ्यास
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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