इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
कर्म उत्पत्ति होती है आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा । आत्मा ब्रम्ह
का अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । संरचना की दृष्टिकोण से आत्मा विषय है और
प्रकृति वस्तु है । कर्म संविधान के अनुसार प्रकृति कर्ता है । संरचना के विचार से
आत्मा नित्य कर्ता है । कर्म सम्पादन काल में आत्मा अपने विषय स्वरूप को त्याग अपने
को वस्तु स्वरूप में पर्णित नहीं कर पाता है । परिणामत: त्रुटिपूर्ण कर्म प्रेरित होते
है । त्रुटि निवारण के प्रयत्नों के रूप में भक्ति को सरलतम बताया गया । निर्गुण द्वारा
सगुण की सेवाभाव । परंतु वही संरचना अनुसार आत्मा का विषय स्वरूप बाधा बनकर उपस्थित
होता है । प्रयत्नों को और सरल साध्य बनाने के दृष्टिकोण से कुछ त्याज्य और ग्राह्य
कर्म प्रतिपादित किये गये । त्याज्य कर्मों का वृतांत प्रस्तुत करते हुये गत लेख में
प्रथम त्याज्य के रूप में बताया गया था कि प्रकृति के कर्म प्रेरण में हस्तक्षेप न
करे, गतिरोध न करे । त्याज्य कर्मों की चर्चा सतत् रखते हुये –
द्वितीय त्याज्य कर्म बताया गया कि किसी भी प्राणी से द्वेष न करें । द्वेष ईर्ष्या
का व्यापक स्वरूप में प्रस्तुतिकरण है । द्वेष - किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा से, द्वेष किसी की पद प्रतिष्ठा
से, द्वेष
किसी की भौतिक उपलब्धियों से, द्वेष किसी की कर्म सम्पादन क्षमता से द्वेष सभी प्रकार से वर्जित बताये गये ।
इस निषेध का तार्किक आधार है कर्म संविधान । कर्ता प्रकृति को बताया गया । प्रकृति
का न्याय आदर्श है । न्याय का आधार कर्म है । जिसका कर्म सम्पादन जितना ही संविधान
के अनुकूल होता है उसे प्रकृति उतना ही उत्कर्ष प्रदान करती है । इसलिये यदि किसी की
उपलब्धियाँ अधिक है तो वह उसके उत्तम संविधानानुकूल कर्म का फल स्वरूप उसे प्रकृति
ने प्रदान किया है । इसका प्रतिकूल भी सत्य होता है । त्रुटिपूर्ण कर्म अर्थात कर्म
संविधान के प्रतिकूल कर्म दण्डनीय बताये गये । फलत: निकृष्टि परिणाम अर्थात दलित स्थिति
का जीवन रोगी शरीर आदि कष्ट भोग की स्थितियाँ । इसप्रकार किसी की उत्कृष्ट उपलब्धियों
से द्वेष ना करें यह दूसरा त्याज्य बताया गया । यदि कोई आप की मंशा के विपरीत कर्म
कर रहा है अथवा आपको क्षति पहुँचाने वाला कर्म कर रहा है तो भी उस प्राणी का दोष नहीं
है क्योंकि कर्ता तो प्रकृति है । इसलिये उससे द्वेष न करें । लक्ष्य हर रूप में एक
ही होता है । प्रकृति को कर्ता रूप में स्वीकारना ।
उपरोक्त द्वितीय त्याज्य कर्म को श्रीमद् भागवद् गीता में निम्नवत् लिखा गया –
अद्वेष्टा
सर्वभूतानाम्
सतत अगले अंक में –
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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