कर्म
प्रधान संसार में कर्म ही आधार होता है सकल मूल्याँकन हेतु । कर्म की उत्पत्ति
होती है आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा । आत्मा ब्रम्ह का अंश है
प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । कर्म का निश्चित संविधान है । संविधान के प्रतिकूल
कार्य वर्जित बताये गये । फिर भी होते हैं
। संविधान का ज्ञान न होना भी कारण बनता है । परंतु ज्ञान होने पर भी कोई परवशता
भी कारण बनती है । परवशता बाह्य भी हो सकती है परंतु अधिकतर आंतरिक कारणों से होती
है । आंतरिक कारणों में व्यक्ति विषेस की शरीर में निहित आत्मा और उसकी शरीर की
प्रकृति के मध्य अनियंत्रित प्रतिक्रिया का फल होती है । इस अनियंत्रित स्थिति को
सुधारने के लिये सुधार उपाय के रूप में सर्व प्रथम सरल मार्ग भक्ति सुझाया गया
जिसके विषय में पर्याप्त चर्चा गत अंकों में की गई । अब त्रुटि सुधार के लिये
द्वितीय पथ नामत: कर्म पथ की विवेचना की जावेगी ।
भक्ति पथ में त्रुटि के जनित होने के
माध्यम प्रकृति के प्रति समर्पण का पथ सुझाया गया था । परंतु कर्म पथ में कर्म
द्वारा कर्म त्रुटि का सुधार सुझाया गया है । कर्म द्वारा कर्म सुधार के पथ में
कंचिद एक कर्म त्रुटि को सुधारने के लिये कोई अन्य अलग सुधारक कर्म नहीं अपेक्षित
होता अपितु किये जाने वाले कर्म जिसके करने में त्रुटि हुई है अथवा हो रही है अथवा
त्रुटि सम्भावित है की सम्पादन गुणवत्ता सुधारने की अपेक्षा है । कर्म सम्पादन
गुणवत्ता विचाराधीन होने की दशा में इस गुणवत्ता के अंग स्वरूप कर्म जनित होने के
निमित्त कर्म सम्पादन काल में कर्ता की मन:दशा कर्म सम्पादन की प्रेरणाश्रोत भी
महत्वपूर्ण योगदान के रूप में चर्चा तथा जानने योग्य तथ्य होंगे । इस प्रकार इस
परिचयात्मक उल्लेख से यह स्पष्ट सम्मुख है कि कर्म मार्ग में सज्ञान पूर्वक
नियंत्रित कर्म सम्पादन अपेक्षित है । इस नियंत्रित कर्म सम्पादन की अपेक्षा को
तभी पूर्ण किया जा सकता है जबकि साधक व्यक्ति का आचरण संयमित और निष्ठापूर्ण हो ।
आचरण अर्थात समस्त कर्म अभ्यास । संयमित अर्थात करने वाले के अपने नियंत्रण में ।
निष्ठापूर्ण अर्थात कार्य सम्पादन को वाँक्षनानुसार नियंत्रित ढंग से करने के लिये
दृढ संकल्प के साथ । भक्ति को सरल इसीलिये बताया जाता है कि उसमें उपरोक्त सभी
अपेक्षाये साधक अपने करने के बजाय प्रकृति पर छोड देता है । प्रकृति की कृपा पर
छोड देता है । इसी कारण भक्ति में प्रकृति की कृपा पर विश्वास महत्वपूर्ण होता है
। परंतु उपरोक्त के विपरीत कर्म पथ में ना ही प्रकृति के ऊपर छोडना है ना ही
प्रकृति पर विश्वास करना है इस पथ में तो साधक को अपने को सुधारना है अपने विषय
में जनने द्वारा अपने कर्मों को जानने द्वारा अपने कर्मों की उत्पत्ति जानने
द्वारा अपने कर्मों की प्रेरणा श्रोत को जानने द्वारा । इस प्रकार कर्म पथ से
त्रुटि सुधार की अपेक्षाये हैं नियंत्रित व्यक्तित्व संयमित कार्य संचालन अभ्यास ।
आत्मा पूर्ण रूप से अलौकिक स्वत:
अस्तित्व है । कार्य संचालक है । कार्य की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति के गुणों की
महिमा त्रुटि पैदा होने का मूल होता है । आत्मा मौलिक स्वरूप में निरंकार अर्थात प्रकृति
से निर्लिप्त होता है । प्रकृतीय संसर्ग में वह प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर
त्रूतिपूर्ण कर्म सम्पादन प्रेरित करता है । कर्म पथ द्व्रारा त्रुटि सुधार पथ में
यह स्वच्छ चित्र मस्तिष्क में प्रतिपल विद्यमान रहना दूसरी अपेक्षा है ।
कर्म पथ से कर्म त्रुटि सुधार सबसे अच्छा
पथ है अपने कर्म की त्रुटि सुधारने के लिये । पहला कारण कि कर्म प्रतिपल कर रहे है
। इसलिये सुधारने के लिये प्रयत्नशील होने पर सबसे अधिक सुधार अभ्यास मिलेगा । इतना
सुधार अभ्यास किसी अन्य पथ में नहीं मिलता । जितना ही अभ्यास होगा उतना ही साधक दक्ष
हो जावेगा । दूसरा कारण है कि इस पथ में आप किसी अन्य व्यक्ति या व्यवस्था पर आश्रित
नहीं हैं अपने कर्म सुधार के लिये । इसमें सुधार स्वयँ आपको करना है । अपनी त्रुटियों
का सुधार करना है । इसलिये यह आपकी अपनी उपलब्धि होगी । आत्म विश्वास जाग्रित होगा
। आप अपनी शक्ति को पहचानेगे । कार्य की क्षवि आपको सुखद अनुभव के रूप में आनदित रहने
का माध्यम बनेगी । जीवन वही रहेगा । आप आनंद से ओत प्रोत हो जावेगे ।
कर्म संविधान के अनुरूप कर्म सम्पादन अमृत
समान है । एक बार इसका कंचिद स्वाद जिसे अनुभव मिल जावेगा निष्चय है कि फिर वह इसे
किसी मूल्य पर नहीं त्यागेगा । ब्रम्ह का दिव्य चिर आनंद । मनुष्य जो कि अपने विवेक
के कारण वर्गीकरण के विज्ञान श्रेणी में जन्मा है यदि अपने कर्मों द्वारा उन्नत श्रेणी
आनंद में पदोन्न्ति हासिल कर लेता है तो कंचिद यह महानतम उपलब्धि होगी । प्रयत्न प्रारम्भ
कर स्वयम अनुभव करे ।
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