इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
निषिद्ध कर्मों की श्रृंखला में –
(4) निर्ममो (5) निरअहंकार: (6) अनिकेत:
निषिद्ध इसलिये कि इन्हे करने से प्रवृत्ति होती है
ब्रम्ह के कर्म संविधानके उलंघन करने हेतु । प्रकृति के आदेशो के प्रतिकूल कर्म
करने की प्रवित्ति । यह अवाँक्षित होता है । दण्डनीय होता है । प्रकृति कंचिद क्षमा
नहीं करती है । साथही प्रकृति उसके आदेशानुसार कर्म करने वाले को पुरस्कृति भी
करती है । श्रेयमान पद प्रतिष्ठा धन कीर्ति जैसे पुरस्कार प्रदान करती है । यह
समस्त कर्म फल की उपलब्धियाँ हैं ।
निर्ममो – अर्थात प्रकृतीय
स्वरूपों से मोह करना निषिद्ध है । प्रकृतीय स्वरूप में सम्मलित हैं धन, सम्पत्ति, आभूष्ण, विबिन्न साधन, सांसारिक रिश्ते सभी कुछ जो संसार में फैला हुआ है । समझने
की आवश्यकता है । जिस प्रकार एक सार्वजनिक व्यवस्था की रेलगाडी में सफर होता है
वही स्वरूप इस जीवनयात्रा का है । सफर के समय गाडी में व्यवस्थानुसार प्रत्येक को
स्थान मिलता है । सफर समाप्त होने पर गाडी वैसे ही सतत चलती रहती है मात्र यात्री
उतर जाता है । यह व्यापक प्रकृति हर मनुष्य को नियत स्थान प्रदान करती है । नियत
समय तक यात्रा होती है । मनुष्य जीवन अवधि पूरी कर सफर से बाहर हो जाता है । परंतु
प्रकृति की यात्रा अनंत काल से चलती आयी है और चलती ही जा रही है । मनुष्य नहीं
जानता की यह यात्रा कहाँ तक चलती ही जावेगी । इसलिये न ही उस यात्री गाडी से मोह
करिये और न ही उसके यात्री से । सिर्फ यात्रा करिये । एक शिष्ट यात्री की भाँति
यात्रा के नियमों का पालन करिये । पूर्व कर्मों के आधार पर प्रकृति ने किसे कहाँ
जन्म दिया किसे क्या कार्य दायित्व दिया यह मनुष्य के वश का अधिकार का नहीं था
परंतु यह तो पूर्ण रूप से मनुष्य के अधिकार में है कि वह प्रकृति के नियम का पालन
करते हुये प्रकृति की सेवा करे । मोह प्रकृतीय संविधान के उलंघन को प्रशस्थ करता
है । त्याज्य है । चुनाव प्रत्येक मनुष्य का अपना अधिकार है ।
निरअहंकार: - कर्म संविधान की स्पष्ट अनुशंसा है कि
इस सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है । परंतु यह मनुष्य की
आत्मा कंचिद स्वीकार नहीं कर पाती है । कोई कर्म करती है तो इसी विचार को धारण कर कि
मैं कर रहा हूँ । यही कर्तापन का अहंकार प्रशस्थ करता है त्रुटिपूर्ण कर्म ।
त्याज्य है । कर्म दोष को प्रकृति किसी भी परिस्थिति में क्षमा नहीं करती है । प्रकृति
के दण्ड बडे ही क्रूर होते है । एक बार पथ भूल जाने पर फिर त्रुटियाँ बढती ही जाती
हैं । सम्भल पाने की सम्भावना क्षीण होती चली जाती है । त्रुटि को जितना जल्दी
त्यागा जाय और सही कर्म पथ अपनाया जाय उतना ही कल्याण सम्भावित होगा । अज्ञान के
अंधकार में जितनी यात्रा जैसे भी किया परंतु ज्ञान के प्रकाश में जीवन यापन किया
जाय अर्थात ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कर्म किये जाँय और उत्तम से उत्कृष्ठ
उपलब्धियों की ओर अग्रसर हुआ जाय । जितने श्रीमान व्यक्तित्व हैं वह सभी आज
श्रीमान स्थिति का भोग उत्तम कर्मों के फलस्वरूप कर रहें है । हर मनुष्य उस
श्रीमान स्थिति को पा सकता है मात्र सही कर्म की अपेक्षा है ।
अनिकेत: - किसी विद्वान ने इस संसार और उसमें जीवन यापन
को एक नदी के ऊपर बने पुल के दृष्टांत से प्रगट किया । विद्वान कहता है कि इस संसार
रूपी दरिया को पुल से गुज़र पार कर जाओ यही सफलता है । यहाँ वासिंदा बनने की चेष्टा
मित्थ्या प्रयत्न है । इस चेष्टा में कर्म दोष न करें । घोर अशांति मिलेगी । बुद्धिमत्ता
इसमें है कि सही कर्म करते जीवन यात्रा सम्पन्न करें । प्रकृति जैसे रखे उसे शिरोधार्य
कर संतुष्ट रहें।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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