इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
विद्या
ददाति विनयम्
अविद्या है प्रकृतीय गुणों मे आसक्ति और प्रकृतीय घटको के प्रति मोह । इस अविद्या से मुक्ति है विद्या । विद्या है ब्रम्ह
के कर्म संविधान की जानकारी तथा उसके अनुकूल आचरण का अभ्यास । कर्म संविधान व्यक्त
करता है कि समस्त कर्मो की कर्ता प्रकृति है । प्रत्यक्ष रूप से नित्य कर्ता आत्मा
है । आत्मा यदि प्रकृति को कर्ता रूप में स्वीकार ले तो उसने विद्या ग्रहण कर लिया
।
प्रचलित सांसारिक प्रचलनों में आत्मा अहंकारी रूप में प्रगट होता है । विद्या के
प्रभाव से आत्मा का अहंकार शांत हो जावेगा । वह प्रकृति की सत्ता को स्वीकार कर लेगा
। उसके प्रति सेवा भाव से अपनी सेवा अर्पित करने को तत्पर हो जावेगा । वह विनम्र हो
जावेगा । विनयशील हो जावेगा ।
विद्या ग्रहण तथा प्रकृति की प्रभुता को स्वीकारना एक दूसरे के पर्याय है । इस
लोक में कर्मशील बन जीवन प्रशस्थ करना सुगम हो जावेगा । प्रकृति के अनुकूल आचरण शांत
दिब्य ज्योति पर्यंत यात्रा प्रशस्थ करेगा । अविद्या से मुक्ति प्रकृति की कृपा द्वारा
ही सम्भव होगी । प्रकृति के प्रति समर्पण द्वारा ही सम्भव होगी । यही समर्पण आचरण काल
में भक्ति कहा जावेगा । यही समर्पित आचरण जब सतत अभ्यास बन जावेगा तो प्रेम कहा जावेघा
। प्रेम भक्ति ही अभीष्ठ होता है । अविद्या से मुक्ति के लिये । मुक्त आत्मा प्रकृति
के प्रति विनम्र हो जावेगी । विनयशील हो जावेगी । इसके लिये अलग से कोई प्रयत्न नहीं
करना होगा । यह होगा चरित्र का उत्थान । यह विषेस प्रयत्न से उपलब्ध होगा । प्रकृति
का सामान्य स्वरूप होता है पतन । उत्थान प्रयत्न द्वारा सम्भव होता है । कौन किसे अंगीकार
करता है यह उसका अपना व्यक्तिगत विवेक जाने ।
ज्ञानी मुनि ने भगवान के सम्मुख विनय किया –
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन
काम ।
प्रेम भगति अनपायनी देहुँ हमहि
श्रीराम ॥
ज्ञानियों ने जो पथ दिखाया है यदि हम उसे स्वीकारते हैं तो मानो हमने बिना तपस्या
ही तप का लाभ पाया ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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