इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
गत अंक की चर्चा मुनि सनकादि की प्रभु श्रीराम से की गई
वंदना को सतत् रखते हुये । मुनिश्रेष्ठ प्रभु से विनय करते हैं कि हे प्रभु मुझे
प्रेम भक्ति का वरदान दीजिये । यही दुर्लभ उपलब्धि है इसे ही मनुष्य अपने
प्रयत्नों से उपलब्ध नहीं कर पाता है । इसलिये प्रभु मुझपर प्रसन्न हो मुझे यही
वरदान दीजिये । स्मरणीय है कि मुनि की उपलब्धियाँ । ब्रम्हानंद में मग्न रहने वाले
मुनि श्रेष्ठ यह विनय करते है कि प्रेम भक्ति ही अति दुर्लभ साधना है । इसे हम
अपने प्रयत्नो से नहीं हासिल कर पा रहे हैं । जो मुनि श्रेष्ठ आत्मा की अनुभूति का
प्रतिपल बोध कायम रखते हुये जीवन यापन करने वाले और समस्त वेदों के ज्ञाता वह इस
प्रकार की असमर्थता को व्यक्त करते है । निष्चय ही यह प्रकृति की प्रबल क्षमता का
ज्ञोतक माना जाना चाहिये जिसके प्रभाव से आत्मा प्रकृति के कर्तापन को नहीं
स्वीकार करता । यही है प्रबल माया । प्रकृति अपने इसी प्रचण्ड माया शक्ति से
मनुष्य को गुलाम बना उनकी सेवाओं को प्रयोग करती है । कर्म संविधान का विचलन भी
प्रकृति ही प्रवित्त करती है । विचलित होने पर दण्डित भी प्रकृति ही करती है । इन्ही
कारणों से ज्ञानी मुनि प्रेम भक्ति अर्थात प्रकृति के अपेक्षानुसार कर्म सम्पादन
का सतत अभ्यास का वरदान माँगते हैं । हे सगुण प्रभु मेरे ऊपर कृपा करिये मुझे
विषेस अनुकम्पा के अधीन सतत सेवा अर्पित करने के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान
कीजिये ।
उपरोक्तानुसार विनय के उपरांत मुनिश्रेष्ठ अपनी विनय का
निमित्त भी प्रगट करते है । कवि निमित्त को व्यक्त करते लिखा –
देहुँ भगति रघुपति अति पावन । त्रिविधि ताप भव दाप नसावन ॥
त्रिविध ताप – दैहिक, दैविक, भौतिक ।
शरीर मे उत्पन्न होने वाले कष्ट । रोग, ब्याधियाँ जो शरीर के विभिन्न अंगों मे उत्पन्न होने वाली
बाधाये और उनसे प्रवित्त कष्ट । इनकी कारक प्रकृति ही होती है । दैविक – भाग्य जनित । पूर्व जन्मों के कर्मों के परिणाम स्वरूप आरोपित
त्रास । इन त्रासो का वर्तमान जन्म से कंचिद कोई सम्बंध नहीं प्रमाणित होता । इन
त्रासो की भी प्रेरक प्रकृति ही होती है । प्रकृतीय प्रकोप । तूफान, बाढ, भूकम्प, आदि
प्रकृतीय आपदाओं से जनित संताप । इनकी कर्ता भी प्रकृति ही होती है । मुनिश्रेष्ठ
विनय का निमित्त बयान करते हुये कहते हैं कि आपके प्रसन्न होने से प्रभु मैं
उपरोक्त वर्णित समस्त कष्टो से मुक्त हो आपकी सेवा कर सकूँगा प्रभू । इस संसार की
समस्त क्लिष्ट बिपत्तियों से उत्पन्न भय से मुक्त आपकी सेवा में तत्पर हो सकूँगा
प्रभू । आपकी कृपा अति पवित्र है प्रभू । मुझे अपनी कृपा प्रदान कीजिये प्रभु ।
कंचिद मुनि श्रेष्ठ की उपरोक्त वंदना और
विनय की निमित्त का समर्थन भगवान शंकर भी करते है । कवि निम्नवत् ब्यक्त करता है –
ज्ञानी मूढ
न कोय ।
जेहिं जब
रघुपति करहिं जब सो तस तेहि क्षण होय ।
सगुण ब्रम्ह स्वरूप श्रीराम – प्रकृति - जिस समय जिसको जो परिस्थिति प्रदान करती है – उसी अनुरूप वह प्रगट होता है । कोई स्थायी स्वरूप नहीं ग्रहण
कर पाता । न ही ज्ञानी स्वरूप न ही अज्ञानी मूर्ख स्वरूप । यह प्रकृति की महिमा है
कि किसको कब क्या स्वरूप प्रदान करती है । प्रकृति की कृपा का आकाँक्षी होना श्रेष्ट
सुझाव है ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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