इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
भक्ति के सम्बंध में भगवान श्रीराम ने अपनी प्रजा को जो कुछ भी बताया उसे कवि
श्री तुलसी दास जी ने निम्नवत् लिखा –
कहहुँ भगति पथ कवन प्रयासा । योग न जप-तप मख उपवासा ॥
सरल स्वभाव न
मन कुटिलाई । यथा लाभ
संतोष सदाई ॥
उपरोक्त उद्घृत वृतांत के प्रथम भाग में कुछ नकारात्मक क्रियाओं को बताया गया
है । सर्व प्रथम बताया कि भक्ति पथ में अलग से किसी विषेस क्रियाँओं की अपेक्षा
नहीं होती है अपितु जो कुछ भी कर्म
सम्पादन आप अपने किसी निश्चित कर्म को करने में कर रहे है उसी में मात्र अपनी
मानसिक स्थिति को संतुलित रखने से सम्भव हो जावेगा । इस कथन को समझने में सरल
बनाने के लिये व्यक्त किया गया कि उदाहरण के तौर पर ‘योग’ जिसमें किसी विषेस मानसिक परिवेष की अपेक्षा
होती है परंतु भक्ति में ऐसा अपेक्षित नहीं होता है । द्वितीय उदाहरण के रूप में
कहा गया कि ‘जप’ भगवान के नाम को जपना के पथ से भगवान की स्मृति
मस्तिष्क में स्थिर करने के पथ में जो मस्तिष्क को भगवान के ध्यान में केंद्रित
रखने की अपेक्षा होती है वह भी भक्ति पथ में वाँक्षित नहीं होती है । तृतीय उदाहरण
के रूप में ‘तप’ तपस्या किसी प्रयत्न
की क्रिया पद्धति को अपने अभ्यास मं आम सम्पादन पद्धति बनाने के लिये जो प्रयत्न
अपेक्षित होते हैं वह भी भक्ति मार्ग से कर्म सम्पादन में अपेक्षित नहीं होते है ।
इस तप के उदाहरण से यह व्यक्त किया गया है कि भक्ति मार्ग से अपने कर्म सम्पादन को
ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुकूल बनाने के प्रयत्न में उद्यमी को अलग से अभ्यास
कर्मों का पथ नहीं चलना होगा अपितु अपने आम दायित्व को निर्वाह करने में किये जाने
वाली क्रियाँओं को मात्र क्रिया सम्पादन काल में अपने मानसिक स्थिति को संयमित
रखने से सम्भव हो जावेगा । चौथे उदाहरण ले रूप में ‘ब्रत’ को लिया गया । ‘ब्रत’ अर्थात
मानसिक संकल्प । भक्ति मार्ग में किसी विशेस प्रकार के मानसिक संकल्प की अपेक्षा
नहीं होती है । कोई किसी दिन विषेस यह मानसिक संकल्प करता है कि आज किसी निमित्त
से हम दिन भर भोजन नहीं करेंगे अर्थात ब्रत रखेंगे । यह एक मानसिक संकल्प है ।
मनुष्य निष्चय करता है । फिर उस निष्चय को अमल करता है । ब्रत करता है । यह भी
भक्ति पथ से अपने त्रुटिपूर्ण कर्मों को सुधार कर न्रम्ह के संविधान के अनुकूल
बनाने के लिये प्रयत्नशील होने में अपेक्षित नहीं होता है ।
उपरोक्त नकारात्मक उदाहरणों को बताने के उपरांत भगवान श्रीराम बताते है
सकारात्मक अपेक्षाओं को । यह विरोधाभास की स्थितियों का मार्ग प्रभु श्रीराम ने
विषय को समझना सरल बनाने के उद्देष्य से अपनाये होंगे । अंधकार के कुप्रभाव से
त्रस्त प्रकाश की महिमा को सरलता से महसूस करेगा । इसी प्रकार अविद्या के प्रभाव
से त्रस्त मनुष्य विद्या अर्थात सही कर्म बोध होने की दशा ज्यादा सुगमता से ग्रहण
करेगा । सही कर्म सम्पादन अर्थात ब्रम्ह के कर्म संविधान जिसके प्रविधान के अनुसार
समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है की अपेक्षानुसार कर्म सम्पादन हेतु भक्ति मार्गी
साधक के लिये पहली अनिवार्य वाँक्षना बतायी ‘सरल स्वभाव’ । अलिखित परंतु स्पष्ट कि यह अपेक्षा कर्म सम्पादन काल के लिये है । स्वभाव
अर्थात आत्मा की यथास्थिति status । स्मरणीय है कि आत्मा जो
कि ब्रम्ह का अंश होता है । ब्रम्ह उपलब्ध प्रकृति निर्मित ज्ञानेंद्रियों के लिये
अज्ञेय है । इसलिये आत्मा भी अज्ञेय है । इसप्रकार एक अज्ञेय की यथास्थिति status । इस
यथास्थिति की गुणवत्ता होनी चाहिये ‘सरल’ ।
समस्या उपस्थित होती है कि अज्ञेय की यथास्थिति को सरल कैसे बनाया जाय क्योंकि
जिसे सरल बनाना है उस अस्तित्व का ही ज्ञान नहीं है । समस्या उचित है । समाधान भी
सरल है । आत्मा की पहचान सदैव उसके कर्म सम्पादन से सम्भव है । कर्म सम्पादन की
गुणवत्ता के परीक्षण द्वारा आत्मा की यथास्थिति को परीक्षित किया जाय । आत्मा की
उपस्थिति व उसकी यथास्थिति स्पष्ट विदित होती रहेगी । प्रतिपल । सजग होकर अपना
परीक्षण स्वयँ करने से होगा । यहाँ एक नकारात्मक उपाय अपनाने का सुझाव भी दिया
प्रभु श्रीराम ने कि \न मन कुटिलाई’
अर्थात मस्तिष्क में किसी प्रकार का बुरा विचार उपस्थित न हो । अन्यथा आत्मा का
कर्म प्रेरण उसी इच्छा जनित बुरे विचार को सम्पादित करने को उन्मुख हो जावेगा ।
अच्छा विचार अर्थात ब्रम्ह के कर्म सम्पादन के अनुकूल । बुरा विचार अर्थात इच्छा
जनित विचार । फिर प्रभु श्रीराम एक अपेक्षा को बताते है ‘यथा लाभ संतोष:’
अर्थात प्रकृति की व्यवस्था से संतुष्ट । प्रकृति कर्ता है । एक व्यक्ति विषेस
मात्र एक व्यापक व्यवस्था प्रकृति का एक सूक्ष्म घटक है । प्रकृति व्यवस्था एक घटक
से एक कोई छोटा सा कार्य कराती है । प्रत्युत्तर में व्यवस्था उसे कुछ देती है । धन, पद, प्रतिष्ठा, सामाजिक ख्याति । प्रकृति के दिये हुये से संतुष्ट आत्मा ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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