मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
प्रकृति के व्यापक विस्तार, उसकी सृजनात्मक क्षमता, उसकी पालन क्षमता, व उसकी संहार क्षमता का जितना ही मूल्याँकन जो भी मनुष्य जितना कर सकेगा उतना ही वह उसके प्रति प्रेम जागृत कर सकेगा । इस मूल्याँकन को ग्रहण करने में भी मनुष्य का अहँकार ही आडे आता है । मनुष्य की सहज़ प्रवृत्ति ही अपने कर्ता शक्ति को प्रधान मानने की होती है । यह शरीर के रचना में पिरोया हुआ भ्रांति भाव है । इसमें किसी मनुष्य को दोष नहीं है । यह अवश्य है कि जब मनुष्य प्रकृति के स्वरूप व शक्ति को कंचिद किसी परिस्थिति में महसूस कर लेता है तो उसे अपनी सीमित क्षमता का मूल्याँकन हो जाता है । फिर वह प्रयत्नशील हो जाता है अपने अहँकार के निवारण के लिये । प्रकृति जो ब्रम्ह की रचना है वह युक्त है अद्भुद विज्ञान से जिसके द्वारा वह ब्रम्ह के समस्त कर्म दायित्व को समपन्न करती है और इसी दायित्व निर्वाह में समस्त मनुष्य समुदाय की सेवाओं का प्रयोग करती है । इन्ही कारणों से धर्म दर्शन में विद्वान महात्माओं ने यह प्राविधान किये है कि प्रकृति की सेवा ही धर्म है । प्रकृति के विपरीत कर्म चेष्टा श्रम नष्ट करना है । परंतु अविद्या के प्रभाव से मनुष्य नित्य प्रतिदिन अपनी आसक्ति जनित इच्छाओं और अहंकार को ही पोषित करता है । मानो समस्त उपलब्धियाँ उनमें ही निहित हैं । यह भी प्रकृति की ही महिमा है । उसे तो मनुष्य को अपना गुलाम बना कर रखने में ही उसकी सफलता है । उसे उन्ही गुलामों से ही अपना कर्म सम्पादन समपन्न कराना भी है । प्रकृतीय विस्तार समस्त यथावत जैसे है वैसे ही बने रह जाते है मात्र मनुष्य जन्म लेता है उन प्रकृतीय घटकों को पाने की कामना करता है और यही कामना पूरी करने की चेष्टा करते एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । प्रकृतीय घटक वैसे के वैसे कायम रह्ते है । प्रकृति का यह करिष्मा अनंत काल से ऐसे ही चलता आया है और चलता ही जा रहा है और चलता ही जावेगा । मनुष्य की सामान्य प्रवृत्तियाँ और चेष्टायें कर्म संविधान के उलंघन की ही होती है । सही रूप में कर्म संविधान के अनुकूल कर्म करने के लिये सज्ञानपूर्वक प्रयत्नों की आवश्यकता होती है । कर्म संविधान के अनुकूल कर्म द्वारा ही चिर आनंद की प्राप्ति की स्थिति मिल सकेगी ।

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें